Devshayani ekadashi 2021: जानिए देवशयनी एकादशी का महत्व, कैसे राजा मांधाता को मिला था व्रत से लाभ
नई दिल्ली, 19 जुलाई: हिंदू धर्म में एकादशी के व्रत का अपना बेहद महत्वपूर्ण स्थान है। वैसे तो हर साल चौबीस एकादशियां होती हैं, लेकिन जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। ऐसे में आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही देवशयनी एकादशी कहा जाता है। हालांकि इस तिथि को 'पद्मनाभा' भी बोलते हैं। पौराणिक मान्यता के मुताबिक इस दिन भगवान विष्णु 4 माह के लिए योग निद्रा में यानी निंद में चले जाते हैं। इसलिए इस एकादशी को 'देवशयनी' या 'हरिशयनी' भी कहा जाता है। इस बार 'देवशयनी एकादशी' मंगलवार (20 जुलाई ) को है। जानिए देवशयनी एकादशी का महत्व...

मान्यताओं के अनुसार मंगलवार यानी 20 जुलाई से देवों के सोने के बाद किसी भी तरह का मांगलिक कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जाता। इसी दिन के बाद से चातुर्मास भी आरंभ हो जाएंगे। देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करने से और कथा पाठन से भक्तों के पाप दूर होते हैं और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
देवशयनी एकादशी मुहूर्त
- एकादशी प्रारंभ-19 जुलाई 2021 को रात 09:59 बजे से।
- एकादशी समाप्त -20 जुलाई 2021 को शाम 07:17 बजे तक।
- एकादशी व्रत पारण- 21 जुलाई 2021 को सुबह 05:36 से 08:21 बजे तक।
जानिए देवशयनी एकादशी की पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के मुताबिक राजा मांधाता तीनों लोकों में अति प्रसिद्ध थे। राजा पूरी तरह से अपनी प्रजा के हितों के लिए ममर्पित थे। एक बार उनके राज्य में भीषण अकाल की समस्या आकर खड़ी हो गई, जिसके वजह से स्थिति बेहद चिंताजनकर हो गई। अपनी प्रजा के कष्टों में देखकर राजा विचलित अपनी सेना को साथ वन में गए, जहां उनकी अंगिरा ऋषि से भेंट हुई। राजा मांधाता ने अपनी परेशानी ऋषि अंगिरा के समक्ष रख दी और इसका उपाय मांगा, जिसके बाद ऋषि अंगिरा ने राजा को देवशयनी एकादशी का व्रत करने के लिए कहा और उसका महत्व भी बताया। ऋषि की बात मान राजा ने पूरे विधि विधान के साथ व्रत किया, जिसके फलस्वरूप उनके राज्य में बरसात होने लगी और पूरी प्रजा भयंकर अकाल के बच गई।












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