Dasha mata Puja 2021: दशामाता पूजन आज, जानिए इसकी कथा और महत्व
नई दिल्ली। भगवान विष्णु की पूजा अनेक रूपों में की जाती है। मनुष्य को अपने अलग-अलग उद्देश्यों की पूर्ति के लिए श्रीहरि के अलग-अलग रूपों का पूजन करना चाहिए। चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को भी एक ऐसा व्रत आता है जो आपके बिगड़े ग्रहों की दशा सुधारकर आपको सुख-समृद्धि, सौभाग्य और धन संपत्ति की पूर्ति करवाता है। इस व्रत को दशामाता व्रत कहा जाता है। अपने नाम के अनुरूप यह व्रत-पूजा मनुष्य के परिवार की दशा को सुधार देता है। दशामाता पूजन इस वर्ष 6 अप्रैल 2021 को किया जाएगा। यह व्रत उत्तर भारत के अधिकांश राज्यों में किया जाता है। पश्चिम भारत के गुजरात, महाराष्ट्र आदि राज्यों के भी अनेक भागों में करने की परंपरा है।
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कैसे किया जाता है दशामाता पूजन
दशामाता व्रत के दिन मुख्यत: भगवान विष्णु के स्वरूप पीपल वृक्ष की पूजा की जाती है। इस दिन सौभाग्यवती महिलाएं कच्चे सूत का 10 तार का डोरा बनाकर उसमें 10 गांठ लगाती हैं और पीपल वृक्ष की प्रदक्षिणा करते उसकी पूजा करती हैं। पूजा करने के बाद वृक्ष के नीचे बैठकर नल दमयंती की कथा सुनती हैं। इसके बाद परिवार के सुख-समृद्धि की कामना करते हुए डोरा गले में बांधती हैं। घर आकर द्वार के दोनों हल्दी कुमकुम के छापे लगाती है। इस दिन व्रत रखा जाता है और एक समय भोजन किया जाता है। भोजन में नमक का प्रयोग वर्जित रहता है। इस दिन प्रात: जल्दी उठकर घर की साफ-सफाई करके सारा कचरा बाहर फेंक दिया जाता है। इस दिन किसी को पैसा उधार नहीं देना चाहिए। प्रयास करें किदशामाता पूजा के पूरे दिन बाजार से कोई वस्तु ना खरीदें, जरूरत का सारा सामान एक दिन पूर्व ही लाकर रख लें।
दशामाता व्रत कथा : नल दमयंती की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय राजा नल और रानी दमयंती सुखपूर्वक राज्य करते थे। उनके दो पुत्र थे। एक दिन की बात है। एक ब्राह्मणी राजमहल में आई और रानी से कहा कि दशा माता का डोरा ले लो। दासी बोली- हां महारानी जी, आज के दिन सभी सुहागिन महिलाएं दशा माता की पूजा और व्रत करती है और इस डोरे को गले में बांधती है, जिससे घर में सुख-समृद्धि आती है। रानी ने वह डोरा ले लिया और विधि अनुसार पूजा करके गले में बांध लिया। कुछ दिनों बाद राजा नल ने दमयंती के गले में डोरा बंधा देखा तो पूछा कि इतने आभूषण होने के बाद भी तुमने यह डोरा क्यों बांध रखा है और यह कहते हुए राजा ने डोरा गले से खींचकर निकालकर फेंक दिया। रानी ने डोरा उठाते हुए कहा कि यह दशामाता का डोरा है, आपने उसका अपमान करके अच्छा नहीं किया।
दशामाता एक बुढि़या के रूप में आई
रात्रि में राजा के स्वप्न में दशामाता एक बुढि़या के रूप में आई और राजा से कहा कि तेरी अच्छी दशा जा रही है और बुरी दशा आ रही है। तूने मेरा अपमान किया है। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, धीरे-धीरे राजा के ठाठ-बाट, धन-धान्य, सुख-समृद्धि नष्ट होने लगे। दशा इतनी बुरी हो गई कि राजा को अपना राज्य छोड़कर दूसरे राज्य में भेष बदलकर काम मांगने जाना पड़ा। रास्ते में राजा को एक भील राजा का महल दिखाई दिया। वहां राजा ने अपने दोनों बच्चों को अमानत के तौर पर सुरक्षित छोड़ दिया और राजा-रानी आगे बढ़ गए। राजा के मित्र का गांव आया। वे मित्र के यहां गए तो उनका खूब आदर-सत्कार हुआ। मित्र ने अपने शयनकक्ष में सुलाया। उसी कमरे में मोर की आकृति की खूंटी पर मित्र की पत्नी का हीरों जड़ा कीमती हार टंगा था। मध्यरात्रि में रानी की नींद खुली तो देखा किया वह बेजान खूंटी हीर को निगल रही है। यह देख रानी ने तुरंत राजा को जगाकर दिखाया और दोनों ने विचार किया किया सुबह मित्र को क्या जवाब देंगे। अतः इसी समय यहां से चले जाना चाहिए। रानी-राजा रात में ही वहां से चले गए। सुबह मित्र की पत्नी को हार नहीं मिला तो उन्होंने राजा पर चोरी का आरोप लगाया। इस प्रकार राजा नल और रानी दमयंती के जीवन में अनेक कष्ट आते रहे।
राजा नल को वही स्वप्न वाली बुढि़या दिखाई दी
एक दिन वन से गुजरते समय राजा नल को वही स्वप्न वाली बुढि़या दिखाई दी तो वे उसके चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगे और बोले माई मुझसे भूल हुई क्षमा करो। मैं पत्नी सहित दशामाता का पूजन करूंगा। बुढि़या ने उसे क्षमा करते हुए दशामाता का पूजन करने की विधि बताई। चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि आने पर राजा-रानी ने अपनी सामर्थ्य अनुसार दशामाता का पूजन किया और दशामाता का डोरा गले में बांधा। इससे उनकी दशा सुधरी और राजा को पुनः अपना राज्य मिल गया।











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