Chhath Puja: 'नहाय-खाय' के साथ हुई चार दिवसीय 'छठ' की शुरुआत, जानिए हर दिन की पूजा विधि
नई दिल्ली। लोक आस्था का महापर्व 'छठ' आज नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया है, पहली नवंबर को खरना, दो नवंबर को षष्ठी तिथि पर अस्ताचलगामी सूर्य को पहला अर्घ्य दिया जाएगा, आपको बता दें कि यह एकमात्र ऐसा पर्व है जिसमें ना केवल उदयाचल सूर्य की पूजा की जाती है बल्कि अस्ताचलगामी सूर्य को भी पूजा जाता है। आज घर की सफाई करके व्रती लोग पवित्र तरीके से कद्दू की सब्जी, चने की दाल और चावल का सेवन करने के बाद व्रत की शुरुआत करते हैं।

क्यों कहा जाता है इसे छठ?
सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा जाता है। यह पर्व लगातार चार दिनों तक मनाया जाता है। दरअसल छठ एक विशेष खगोलीय अवसर है, इस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर अधिक मात्रा में पड़ती हैं, जो मनुष्य के तन व मन को शुद्ध करने के लिए काफी उपयोगी सिद्ध होती है।
ये है चार दिन की पूजा विधि
पहला दिन-नहाय खाय
सबसे पहले स्नान-ध्यान करके शुद्ध शाकाहारी भोजन देशी घी और सेंधा नमक से बना हुआ अरवा चावल और कददू की सब्जी को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
दूसरा दिन-लोहंडा और खरना
कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रत रखने वाले जातक उपवास रखने के बाद शाम को भोजन ग्रहण करते है। इसे खरना कहा जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुये चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिटठा और घीचु पड़ी रोटी बनाई जाती है, इसमें नमक व चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है।

तीसरेदिन-संध्या अर्घ्य
तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद के रूप में ठेकुआ और चावल के लडडू बनाया जाता है, शाम को बॉस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रत के साथ परिवार के लोग अस्ताचलगामी सूर्य को जल में दूध मिश्रित अर्घ्य अर्पण करते है।

चौथे दिन-उषा अर्घ्य
चौथे दिन कार्तिक शुक्लसप्तमी के दिन सुबह के समय उगते हुये सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। शाम को सूर्य को अर्घ्य देने के पश्चात दूध का शरबत पीकर व्रत तोड़ते है। इस पूजा में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है।












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