छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में है देवी का 52वां शक्तिपीठ, जहां गिरे में थे माता सती के दांत
Goddess's 52nd Shaktipeeth is in Dantewada, Chhattisgarh, know about Mata Danteshwari हिन्दू
दंतेवाड़ा, 05 अप्रैल। भारत में कई ऐसे मंदिर है,जिनकी महिमा का उल्लेख धर्म ग्रंथों में भी मिलता है। हिन्दू धर्म में माता आदिशक्ति के कई रूपों का वर्णन है। धर्म ग्रंथो में आदिशक्ति के 52 शक्तिपीठों के बारे में भी बताया गया है। इन्ही शक्तिपीठों में से एक माता दंतेश्वरी का मंदिर छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में स्थित है। माना जाता है कि इस स्थान पर माता सती के दांत गिरे थे, यही कारण है कि चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान केवल बस्तर संभाग से नहीं बल्कि देशभर से बड़ी संख्या में यहां श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

दंतेवाड़ा में गिरा था माता सती का दांत
दंतेश्वरी माई के मंदिर प्रबंधन के मुताबिक यह मंदिर सैकड़ों साल पुराना है। माना जाता है कि माता सती का एक दांत दंतेवाड़ा में गिरा था, इस वजह से इस इलाके को दंतेवाड़ा कहा गया। दंतेवाड़ा माता के स्वरूप को भी दंतेश्वरी माई के नाम से ही जाना जाता है। यह मंदिर दुनियाभर में स्थित देवी के 52 शक्तिपीठों में से एक है। हर वैसे तो देवीभक्त सालभर यहां आते हैं ,लेकिन नवरात्रि के समय देशभर से हजारों की तादाद में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए दंतेवाड़ा पहुंचते हैं। दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी मंदिर के अतिरिक्त बस्तर के जगदलपुर शहर में स्थित दंतेश्वरी मंदिर, गिरौला गांव में मौजूद हिंगलाजिन माता मंदिर, बारसूर में स्थित मावली माता मंदिर , शीतला माता मंदिर में भी देवीभक्तों की सालभर भीड़ लगी रहती है।

माता के प्रकट होने की एक कथा यह भी
एक अन्य लोककथा के मुताबिक प्राचीन भारत के राज्य वारंगल के राजा प्रतापरुद्रदेव थे। जब उनके छोटे भाई अन्ममदेव को वारंगल राज से निर्वासित कर दिया गया ,एक बार वह दुखी मन से गोदावरी नदी को पार कर रहे थे , उसी दौरान उन्हें नदी में माता दंतेश्वरी की प्रतिमा मिली। अन्न्मदेव ने उस प्रतिमा को उठाकर नदी के किनारे लाया और उसकी पूजा करने लगे, तभी माता दंतेश्वरी ने साक्षात प्रकट होकर अन्न्मदेव से कहा कि अपने रास्ते पर आगे बढ़ते जाओ, मै भी तुम्हारे पीछे-पीछे चलूंगी।
कहते है कि माता दंतेश्वरी के आशीर्वाद से अन्न्मदेव ने अपने रास्ते पर चलते हुए कई राज्य जीते। दंतेवाड़ा में जिस जगह वह जाकर रुके वहां माता स्थापित हो गईं,इस प्रकार उन्होंने बस्तर सामाज्य की स्थापना भी की। इतिहास में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि बारसुर के युद्ध में राजा अन्न्मदेव ने हरिशचंद्र देव को मारकर बस्तर में अपने राज्य की स्थापना की थी ।

1883 तक होती थी नरबलि
माता दंतेश्वरी के मंदिर को 52वां शक्तिपीठ माना जाता है। कहते है कि डंकिनी और शंखिनी नदी के संगम पर बने इस मंदिर का जीर्णोद्धार पहली दफा वारंगल के पांडव अर्जुन कुल के राजाओं ने लगभग 700 साल पहले करवाया था। बताया जाता है कि वर्ष 1883 तक इस मंदिर में नरबलि भी होती थी । साल 1932-33 में दंतेश्वरी मंदिर का जीर्णोद्धार दूसरी बार किया गया ,जो उस समय की बस्तर महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी ने कराया था।

तांत्रिकों की साधना स्थली है दंतेवाड़ा
यह मंदिर शंखिनी और डंकिनी नदी के संगम पर स्थित है। स्थानीय लोग बताते हैं कि नदी तट पर आठ भैरव भाइयों का आवास है, इसलिए इस स्थान को तांत्रिकों की भी साधना स्थली भी माना जाता है। मान्यता है कि आज भी इस जगह पर गुप्त रूप से बहुत से तांत्रिक जंगलों की गुफाओं में तंत्र विद्या की साधना में लीन हैं। मंदिर प्रांगण में नलयुग से लेकर छिंदक नाग वंशीयकाल की कई मूर्तियां बिखरी हुई हैं। माता दंतेश्वरी को बस्तरराज परिवार अपनी कुल देवी मानता है, लेकिन वह पूरे बस्तरवासियों की रक्षक हैं ।
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