Bakrid Namaz Timings 2026 City Wise: 'दिल्ली से लखनऊ तक', आपके शहर में कितने बजे पढ़ी जाएगी बकरीद की नमाज?

Bakrid 2026 Namaz Time: 28 मई को 'बकरीद' है , ये त्योहार मुस्लिमों के खास पर्व में से एक है, इसे 'ईद-उल-अजहा' और 'ईद ए कुर्बां' के नाम से भी संबोधित किया जाता है। इस दिन बकरे की कुर्बानी दी जाती है , फिर उसे दोस्तों, रिश्तेदारों और जरूरतमंदों के बीच बांटा जाता है। इस दिन लोग नए कपड़े पहनते हैं और उसके बाद मस्जिदों में नमाज पढ़ते हैं, फिर एक -दूसरे को ईद की बधाई देते हैं।

इस दिन अदा की जाने वाली नमाज़ का विशेष महत्व है। यह नमाज़ केवल इबादत नहीं, बल्कि त्याग, भाईचारे और अल्लाह के प्रति समर्पण का संदेश भी देती है। यह नमाज हजरत इब्राहीम की कुर्बानी और अल्लाह के हुक्म के प्रति उनके समर्पण की याद दिलाती है। नमाज अदा करने के बाद लोग एक-दूसरे को गले लगाकर 'ईद मुबारक' कहते हैं, जिससे प्रेम और सौहार्द बढ़ता है, इस दिन जरूरतमंदों की मदद और कुर्बानी का महत्व भी समझाया जाता है।

Bakrid Namaz Timings 2026 City Wise

आपके शहर में कितने बजे पढ़ी जाएगी बकरीद की नमाज? चेक करें यहां टाइम

  • दिल्ली - सुबह 6:15 बजे
  • गुरुग्राम - सुबह 6:17 बजे
  • नोएडा - सुबह 6:14 बजे
  • गाज़ियाबाद - सुबह 6:13 बजे
  • देहरादून - सुबह 6:18 बजे
  • लखनऊ - सुबह 6:05 बजे
  • कानपुर - सुबह 6:08 बजे
  • वाराणसी - सुबह 5:58 बजे
  • प्रयागराज - सुबह 6:02 बजे
  • मुंबई - सुबह 6:25 बजे
  • पुणे - सुबह 6:22 बजे
  • नागपुर - सुबह 6:10 बजे
  • बेंगलुरु - सुबह 6:10 बजे
  • हैदराबाद - सुबह 6:20 बजे
  • चेन्नई - सुबह 6:15 बजे
  • कोच्चि - सुबह 6:18 बजे
  • तिरुवनंतपुरम - सुबह 6:20 बजे
  • पटना - सुबह 5:50 बजे
  • रांची - सुबह 5:55 बजे
  • जयपुर - सुबह 6:20 बजे
  • उदयपुर - सुबह 6:25 बजे
  • भोपाल - सुबह 6:18 बजे
  • इंदौर - सुबह 6:20 बजे
  • अहमदाबाद - सुबह 6:30 बजे
  • सूरत - सुबह 6:28 बजे
  • श्रीनगर - सुबह 6:45 बजे
  • जम्मू - सुबह 6:35 बजे
  • अमृतसर - सुबह 6:30 बजे
  • चंडीगढ़ - सुबह 6:22 बजे

नोट: नमाज़ का समय स्थानीय चांद दिखने और मस्जिद कमेटियों की घोषणा के अनुसार बदल सकता है।

Bakrid 2026

क्यों मनाते हैं बकरीद?

हजरत इब्राहीम ने अपना पूरा जीवन मानवता, करुणा और ईश्वर के प्रति समर्पण में बिताया। कहा जाता है कि 90 वर्ष की आयु में उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिनका नाम Hazrat Ismail रखा था, वो अपने बेटे से बेहद प्रेम करते थे, लेकिन उनका विश्वास और आस्था सबसे ऊपर थी। एक रात उन्हें सपना आया कि खुदा की राह में उन्हें अपनी सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी देनी होगी। यह कोई साधारण परीक्षा नहीं थी, बल्कि उनके विश्वास, धैर्य और समर्पण की सबसे बड़ी कसौटी थी। खुदा के आदेश को सर्वोपरि मानते हुए उन्होंने अपने प्यारे बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने का निश्चय किया।

अपनी आंखों पर पट्टी कुर्बानी देने पहुंचे हज़रत इब्राहीम

कहते हैं कि जब वे कुर्बानी देने पहुंचे तो एक पिता का दिल कमजोर न पड़े, इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली। उन्होंने पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ खुदा की राह में कुर्बानी दी लेकिन जैसे ही उन्होंने पट्टी हटाई, वे आश्चर्यचकित रह गए। वहां उनके बेटे इस्माइल सुरक्षित खड़े थे और उनकी जगह बलि वेदी पर एक दुंबा (बकरा) मौजूद था। यह खुदा की ओर से इब्राहिम की आस्था और समर्पण की स्वीकृति थी। तभी से Eid al-Adha को कुर्बानी, त्याग, प्रेम और इंसानियत के प्रतीक के रूप में मनाया जाने लगा। यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्ची आस्था वही है, जिसमें इंसान मानवता और ईश्वर के आदेश के लिए अपने सबसे प्रिय मोह का भी त्याग करने को तैयार हो जाए।

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