Amla or Akshaya Navami 2017: संतानसुख के लिए करें आंवला नवमी पूजा
नई दिल्ली। कार्तिक शुक्ल नवमी को आंवला नवमी या अक्षय नवमी कहा जाता है। आंवला नवमी उत्तर और मध्य भारत में बड़े पैमाने पर मनाई जाती है। इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करके उसके नीचे बैठकर भोजन करने का महत्व है। ऐसी मान्यता है कि आंवला नवमी के दिन आंवला के वृक्ष की पूजा करने से घर-परिवार में स्थायी सुख-संपत्ति का वास होता है। उस परिवार की खुशियां कभी कम नहीं पड़ती, अक्षय रहती है। कई जगह महिलाएं उत्तम संतान सुख की प्राप्ति के लिए भी आंवला नवमी की पूजा और व्रत करती हैं। आंवला नवमी या अक्षय नवमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण वृंदावन की गलियां छोड़ मथुरा प्रस्थान कर गए थे। इस दिन से उन्होंने अपनी बाल लीलाओं का त्याग कर कर्तव्य के पथ पर कदम रखा था। उत्तरभारत में इस दिन वृंदावन की परिक्रमा प्रारंभ की जाती है। वहीं दक्षिण और पूर्वी भारत में इस दिन से जगद्धात्री महापर्व की शुरुआत होती है।

यह है आंवला नवमी कथा
द्रष्टांतों के अनुसार काशी नगरी में एक व्यापारी और उसकी पत्नी निवास करते थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। इसी कारण व्यापारी की पत्नी हमेशा दुखी रहती थी। एक दिन उसे किसी ने कहा कि यदि वह संतान चाहती है तो उसे किसी जीवित बच्चे की बलि भैरव को चढ़ाना होगी। उसने यह बात अपने पति से कही, लेकिन पति को यह बात जरा भी पसंद नहीं आई। चूंकि उसकी पत्नी को संतान की बहुत अधिक लालसा थी, इसलिए उसने पति से छुपाकर और अच्छे-बुरे की परवाह किए बिना एक बच्चा चुराकर उसकी बलि भैरव बाबा को दे दी। इसका गंभीर परिणाम हुआ और व्यापारी की पत्नी को कई रोग हो गए। पत्नी की यह हालत देख व्यापारी दुखी था। उसने इसका कारण पूछा तो पत्नी ने बताया कि बच्चे की बलि के कारण उसकी यह हालत हुए है। यह सुनकर व्यापारी को बहुत क्रोध आया, लेकिन पत्नी की हालत से वह दुखी था। इसलिए उसने उपाय बताया कि वह इस पाप से मुक्ति के लिए गंगा स्नान करे और सच्चे मन से ईश्वर से प्रार्थना करे। व्यापारी की पत्नी ने कई दिनों तक यह किया। इससे प्रसन्न होकर गंगा माता ने एक बूढ़ी औरत के रूप में व्यापारी की पत्नी को दर्शन दिए और कहा कि उसके शरीर के सारे रोग दूर हो जाएंगे, यदि वह कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन वृंदावन में वृत रखकर आंवले के वृक्ष की पूजा करे। व्यापारी की पत्नी ने बड़े विधि-विधान से आंवला नवमी का व्रत-पूजन किया। इससे शीघ्र ही उसके सभी कष्ट दूर हो गए और उसे एक स्वस्थ व सुंदर संतान की प्राप्ति हुई। इसी दिन से महिलाएं सुख-सौभाग्य, रोग मुक्ति और उत्तम संतानसुख की प्राप्ति के लिए आंवला नवमी का व्रत करती हैं।
कैसे की जाती है पूजा
इस दिन प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर किसी आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। पेड़ के आसपास सफाई करके पेड़ के तने को शुद्ध जल से स्नान करवाया जाता है। फिर उसकी जड़ में कच्चा दूध अर्पित किया जाता है। पेड़ का कुंकुम, हल्दी आदि विभिन्न सामग्रियों से पूजन करके उस पर लाल मौली लपेटते हुए 8 या 108 बार परिक्रमा की जाती है। महिलाएं सुहाग की सामग्री अर्पित करती हैं। इसके बाद पूरा परिवार मिलकर आंवले के पेड़ के समीप बैठकर भोजन करता है।












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