Amla Navami 2024 Katha: जानिए आंवला नवमी से जुड़ी कथाएं

Amla Navami 2024 Katha: कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन आंवला नवमी या अक्षय नवमी मनाई जाती है, आज वो पावन दिन आया है। आंवला नवमी का पुराणों में बड़ा महत्व बताया गया है। द्वापर युग का प्रारंभ अक्षय नवमी के दिन से ही माना जाता है।

आंवला नवमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन-गोकुल की गलियों को छोड़कर मथुरा प्रस्थान किया था। इसीलिए आंवला नवमी के दिन से वृंदावन परिक्रमा भी प्रारंभ होती है।

Amla Navami 2024 Katha

आंवला नवमी के दिन ही आदि शंकराचार्य ने एक वृद्धा की गरीबी दूर करने के लिए स्वर्ण के आंवला फलों की वर्षा करवाई थी। आंवला नवमी से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएं मिलती हैं, उनमें से कुछ आप यहां पढ़ सकते हैं-

पहली कथा

एक सेठ आंवला नवमी के दिन आंवले के पेड़ के नीचे ब्राह्मणों को भोजन कराता था और उन्हें स्वर्ण दान देता था। उसके पुत्रों को यह धन की बर्बादी लगती इसलिए वे पिता से झगड़ते थे। रोज-रोज की कलह से तंग आकर सेठ घर छोड़कर दूसरे गांव में रहने चला गया। उसने वहां जीवनयापन के लिए एक दुकान लगा ली। उसने दुकान के आगे आंवले का एक पेड़ लगाया। उसकी दुकान खूब चलने लगी। वह यहां भी आंवला नवमी का व्रत-पूजा करने लगा तथा ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देने लगा। उधर, उसके पुत्रों का व्यापार ठप हो गया। उनकी समझ में यह बात आ गई कि हम पिताश्री के भाग्य से ही खाते थे। बेटे अपने पिता के पास गए और अपनी गलती के लिए क्षमा मांगने लगे। पिता ने उन्हें आंवला के पेड़ की पूजा करने और दान देने की सलाह दी। पिता की आज्ञा मानकर पुत्र भी वैसा ही करने लगे और उनके घर में भी पहले जैसी खुशहाली आ गई।

दूसरी कथा

एक बार देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण कर रही थीं। उनकी इच्छा हुई कि वे भगवान विष्णु और शिव की एकसाथ पूजा करें। इसका उपाय उन्होंने नारदजी से पूछा। नारदजी ने उन्हें बताया कि आप आंवले के वृक्ष को विष्णु और शिव का प्रतीक मानकर पूजा करें। क्योंकि विष्णु को तुलसी प्रिय हैं और शिव को बेलपत्र। इन दोनों के गुण आंवले में हैं, इसलिए दोनों का पूजन एक साथ हो जाएगा। देवी लक्ष्मी ने ऐसा ही किया और उनकी पूजा से प्रसन्न होकर विष्णु और शिव दोनों प्रकट हुए। देवी लक्ष्मी ने उन्हें आंवले के पेड़ के नीचे ही भोजन करवाया। दोनों ने वर मांगने को कहा तो देवी लक्ष्मी ने कहा कि आज के दिन अर्थात् कार्तिक शुक्ल नवमी के दिन जो मनुष्य आंवला वृक्ष की पूजा करेगा उसके पास धन की कभी कमी न हो। तथास्तु कहकर दोनों देव अंतरध्यान हो गए।

तीसरी कथा

एक अन्य कथा के अनुसार आंवला नवमी के दिन आद्य शंकराचार्य एक गरीब वृद्धा के पास भिक्षा मांगने गए। वृद्धा के पास कुछ नहीं था तो उन्होंने शंकराचार्य को एक सूखा आंवला भेंट किया। शंकराचार्य ने उसे खाकर जल पिया और अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने उस वृद्धा की गरीबी दूर करने का निर्णय लिया और वहीं बैठकर कनकधारा स्तोत्र से देवी लक्ष्मी की आराधना की। देवी प्रसन्न हुई और शंकराचार्य द्वारा वर मांगने पर वृद्धा के घर स्वर्ण के आंवलों की वर्षा करवाई।

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