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भारतीय नववर्ष: ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व प्राकृतिक नवचेतना का उत्सव

सत्यवती महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रबोधिनी परिषद् (संस्कृत साहित्य सभा) द्वारा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, 2082 के अवसर पर भारतीय नववर्ष पर एक ऑनलाइन परिचर्चा का आयोजन किया गया।

इस परिचर्चा में मुख्य वक्ता राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता एवं महर्षि बादरायण व्यास सम्मान से सम्मानित प्रो. अजय कुमार मिश्रा (केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली) ने अपने विचार रखते हुए कहा कि भारतीय नववर्ष ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक नवचेतना का उत्सव है।

Indian New Year

भारतीय नववर्ष: संस्कृति व अस्मिता का प्रतीक

प्रो. मिश्रा ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय नववर्ष केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता, धरोहर और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन और चिंतन में समय, ब्रह्मांड और प्राकृतिक गतिविधियों को लेकर सबसे पहले विमर्श भारत में हुआ, जिसे आज विश्व के समक्ष पुनः प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि वेद, उपनिषद, रामायण और महाभारत में विक्रम संवत का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है, किंतु समय, काल और देश की अवधारणा स्पष्ट रूप से मिलती है। पुराणों में विक्रम संवत का विशेष उल्लेख मिलता है। भविष्य पुराण में वर्णित है कि राजा विक्रमादित्य ने विदेशी आक्रमणकारियों पर विजय प्राप्त कर जनता के हित में इस संवत्सर की शुरुआत की।

संवत्सर की अवधारणा और कालचक्र

प्रो. मिश्रा ने ऋग्वेद के अग्नि सूक्त में "पूर्व" और "नूतन" शब्दों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह विश्व में कालगणना का सबसे प्राचीन संदर्भ प्रस्तुत करता है। उन्होंने बाल्मीकि रामायण और महाभारत का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय कालगणना वृत्तात्मक (साइकलिक) है, जबकि पाश्चात्य दृष्टि इसे रैखिक (लीनियर) मानती है। यही कारण है कि पश्चिमी सभ्यता में जो समय बीत जाता है, वह लौटकर नहीं आता, जबकि भारतीय दर्शन में समय पुनः चक्र में घूमता है।

विदेशी विद्वानों के भ्रामक सिद्धांतों का खंडन

अपने संबोधन में प्रो. मिश्रा ने पाश्चात्य विद्वान ई. डब्ल्यू. हॉपकिंस की इन्वर्जन थ्योरी को अमान्य बताते हुए कहा कि महाभारत को धुंधली और असंबद्ध कल्पनाओं का संग्रह मानने का उनका विचार भ्रामक है और इसका खंडन किया जाना चाहिए। उन्होंने जैकोबी के उस मत का भी विरोध किया, जिसमें रामायण को अयोध्या कांड से प्रारंभ मानते हुए भगवान श्रीराम को मात्र एक कबीलों का सरदार बताया गया है।

भारतीय नववर्ष की महत्ता पर विद्वानों के विचार

सत्यवती महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. सुभाष सिंह ने कहा कि भारतीय नववर्ष देश की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी भावना को प्रखर करने का अवसर है। उन्होंने कहा कि बीते कुछ वर्षों में भारतीय नववर्ष को लेकर जनचेतना में वृद्धि हुई है, जो एक सकारात्मक संकेत है।

संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. अजय कुमार झा ने मंच का संचालन करते हुए कहा कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मां भगवती की विशेष पूजा का आरंभ इसलिए किया जाता है क्योंकि वह शक्ति की प्रतीक हैं। साथ ही, भगवान विष्णु ने इसी दिन सृष्टि की रचना की थी, जो परम शक्ति का संकेत है।

कार्यक्रम की प्रमुख झलकियां

कार्यक्रम का शुभारंभ सत्यवती महाविद्यालय के छात्र श्री सूर्यांश के स्वस्तिवाचन से हुआ, जबकि श्री हर्ष ने पौराणिक मंगलाचरण का सस्वर पाठ किया। डॉ. संदीप कटारिया ने आयोजन की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापन दिया। सत्यवती महाविद्यालय की चर्चित प्रबोधिनी परिषद् की कार्यकारिणी सदस्यों के साथ अंकुश, प्रणव तथा कुणाल ने कार्यक्रम की सफलता में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

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