हरियाणा के शेर संग्राम सिंह अब यूरोप के अखाड़े में दिखाएंगे दम, हकीम त्राबेलसी से होगी भिड़ंत
Sangram Singh: हरियाणा की मिट्टी से उठकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने वाले पहलवान और अभिनेता संग्राम सिंह एक बार फिर इतिहास रचने को तैयार हैं। देश के लिए लड़ने का जज़्बा, जीतने का संकल्प और तिरंगे के लिए समर्पण। इन तीनों का संगम हैं संग्राम। दो बार के कॉमनवेल्थ हेवीवेट रेसलिंग चैंपियन रह चुके संग्राम अब यूरोप की धरती पर भारत की ताकत दिखाने जा रहे हैं।
2 नवम्बर 2025 को एम्स्टर्डम, नीदरलैंड्स के चमकदार एरीना में जब वह लेवल्स फाइट लीग (Levels Fight League) में उतरेंगे, तो सिर्फ एक फाइटर नहीं बल्कि भारत की आत्मा रिंग में होगी। उनका सामना ट्यूनिशिया के दिग्गज फाइटर हकीम त्राबेलसी से होगा। यह मुकाबला सिर्फ ताकत का नहीं, बल्कि इरादों की जंग होगी, जहां संग्राम का हर पंच, हर किक देश के सम्मान के लिए गूंजेगा। यह फाइट 93 किलो वज़न वर्ग में होगी।

भारत की शान के लिए एक और जंग
संग्राम इस फाइट को केवल एक मुकाबले के रूप में नहीं, बल्कि भारत की प्रतिष्ठा के रूप में देखते हैं। वे कहते हैं, "मैं जान दे सकता हूं, लेकिन देश का नाम झुकने नहीं दूंगा। यह सिर्फ एक फाइट नहीं, यह भारत की कहानी है।" हर वार, हर किक और हर पंच में उनके लिए सिर्फ एक मकसद है - भारत का झंडा ऊंचा रखना।
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कुश्ती से MMA के केज तक का सफर
संग्राम की यात्रा किसी प्रेरणा से कम नहीं। गांव के अखाड़े में मिट्टी से लथपथ होकर शुरुआत करने वाले संग्राम आज अंतरराष्ट्रीय मंच पर उतरने जा रहे हैं। उनकी मेहनत दिन-रात जारी रहती है। वे हर दिन 12 से 18 घंटे ट्रेनिंग करते हैं। सुबह चार बजे उठकर ध्यान और योग से दिन की शुरुआत करते हैं, फिर दौड़ और MMA की कठिन प्रैक्टिस। संग्राम कहते हैं, "मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता। मैं चाहता हूं कि आने वाली पीढ़ी यह समझे कि सपनों को पाने के लिए समर्पण ही असली ताकत है।"
बीमारी से जंग और हौसले की मिसाल
संग्राम सिंह का जीवन सिर्फ खेल का नहीं, बल्कि जज़्बे का प्रतीक है। बचपन में उन्हें Rheumatoid Arthritis नामक गंभीर बीमारी हो गई थी। डॉक्टरों ने कह दिया था कि वे कभी चल नहीं पाएंगे।लेकिन संग्राम ने हार नहीं मानी। वे बताते हैं, "डॉक्टर ने कहा था कि 99.9 प्रतिशत लोग इस बीमारी के बाद सामान्य जीवन नहीं जी पाते। मैंने ठान लिया कि मैं उस 0.1 प्रतिशत में रहूंगा जो कभी हार नहीं मानते।" आज वही व्यक्ति न केवल चल रहा है, बल्कि पूरी दुनिया के सामने भारत का नाम लेकर रिंग में उतरने जा रहा है।
हर पंच में देश का नाम
संग्राम के लिए यह फाइट सिर्फ जीतने का मौका नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रतिष्ठा का सवाल है। वे कहते हैं, "सपनों की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। उम्र नहीं, इरादे लड़ते हैं। मैं भारत के लिए लड़ता हूं।"उनके हर कदम में आत्मविश्वास झलकता है। वे जानते हैं कि जब वह केज में उतरेंगे, तो सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि 125 करोड़ भारतीयों की उम्मीदों का प्रतीक बनेंगे।
हरियाणा से एम्स्टर्डम तक की गूंज
हरियाणा के छोटे से गांव से निकलकर एम्स्टर्डम की चमकदार रोशनी तक पहुंचना आसान नहीं था। पर संग्राम सिंह ने हर बाधा को मात दी। वे कहते हैं, "हर बार जब मैं रिंग में उतरता हूं, तो मेरे मन में बस यही सोच होती है कि मुझे भारत का तिरंगा सबसे ऊंचा दिखाना है।"
उनकी कहानी उस नए भारत की पहचान है जो सीमाओं से नहीं रुकता, बल्कि सपनों की नई परिभाषा गढ़ता है। जब वे 2 नवम्बर की रात 8 बजे एम्स्टर्डम में केज में उतरेंगे, तो यह सिर्फ एक खेल नहीं होगा - यह भारत की दहाड़ होगी।
जब दहाड़ेगा हरियाणा का शेर
संग्राम सिंह का लक्ष्य केवल जीत नहीं, बल्कि प्रेरणा बनना है। वे लाखों युवाओं को यह संदेश देना चाहते हैं कि "अगर हिम्मत और मेहनत हो, तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं।"
अब पूरी दुनिया की नजरें उन पर टिकी हैं, क्योंकि जब हरियाणा का शेर दहाड़ता है, तो उसकी आवाज़ सिर्फ भारत में नहीं, पूरी दुनिया में गूंजती है।
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