Y. S. Sharmila: आंध्र प्रदेश में क्यों बिखर गया वाईएसआर रेड्डी का परिवार?
अखंड आंध्र में कांग्रेस को एक परिवार की तरह जोड़कर ऐतिहासिक जीत दिलानेवाले वाईएस राजशेखर रेड्डी का अपना ही परिवार अब बिखर गया है। राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद जब बेटे जगनमोहन ने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर दावा किया था तब उनको जिस बहन वाईएस शर्मिला का साथ मिला, कांग्रेस से विद्रोह करके नयी पार्टी बनाई, आज वही शर्मिला लौटकर कांग्रेस में चली गयीं।
अब आंध्र प्रदेश की राजनीतिक अवस्था ऐसी हो गयी है कि कभी कांग्रेस में अकेले पड़े जगनमोहन अब परिवार में भी अकेले पड़ गये हैं। उनकी मां और बहन कांग्रेस का दामन थाम चुके हैं और भविष्य में राजशेखर रेड्डी के वारिस के तौर पर कांग्रेस इन्हीं को प्रदेश में आगे बढायेगी।

इतिहास साक्षी है कि जिन राजनीतिक दलों की नींव पारिवारिक राजनीति एवं राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति हेतु होती है, उनमें राजनीतिक विरासत की लड़ाई अक्सर देखने को मिलती है। उत्तर प्रदेश में मुलायम परिवार, बिहार में लालू परिवार, हरियाणा में चौटाला परिवार जैसे कई उदाहरण सामने हैं जहाँ पारिवारिक सदस्य राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते आपस में लड़ने लगे। राजनीतिक विरासत पाने की यही लड़ाई अब राजशेखर रेड्डी के परिवार में भी शुरु हो गयी है।
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वाईएस शर्मीला ने पहले ही भाई से अलग अपनी पार्टी बना रखी थी लेकिन वो कुछ खास कर नहीं पा रही थीं। इसलिए वो तो कांग्रेस में शामिल हुई हीं, उन्होंने अपनी पार्टी वाईएसआर तेलंगाना का विलय भी कांग्रेस में कर दिया है। एक समय वाईएसआर कांग्रेस को आंध्र में पहचान दिलाने वाली शर्मीला को अपनी माँ का साथ भी मिला है। अब उनके जिम्मे आंध्र में कांग्रेस को मजबूत कर सत्ता में लाने की जवाबदेही होगी।
अविभाजित आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के लोकप्रिय मुख्यमंत्री रहे स्व. येदुगुरी संदिंटि राजशेखर रेड्डी (वाईएसआर रेड्डी) की 2009 में असमय मृत्यु के पश्चात जब दिल्ली दरबार में नए मुख्यमंत्री के नाम को चुनने की स्थिति बनी तो उनके सांसद पुत्र जगनमोहन रेड्डी ने मुख्यमंत्री पद को पारिवारिक विरासत मानते हुए स्वयं को भावी मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया। हालांकि कांग्रेस नेतृत्व ने उनकी मांग को ठुकराते हुए कोनिजेती रोसैया को मुख्यमंत्री बना दिया जिसके पश्चात जगन मोहन रेड्डी ने आंध्र में ओडारपु यात्रा निकाली जिसे जनता का खासा समर्थन मिला।
कांग्रेस नेतृत्व ने तत्काल जगनमोहन से यात्रा समाप्त करने की मांग की जिसे ठुकराते हुए उन्होंने कांग्रेस छोड़कर पिता के नाम से 2011 में वाईएसआर कांग्रेस पार्टी की स्थापना की। स्वयं उन्होंने सांसद पद से और उनकी माँ वाईएस विजयाम्मा ने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। यहीं जगनमोहन की बहन वाईएस शर्मीला की राजनीतिक एंट्री भी हुई और उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया।
2012 में जगनमोहन को आय से अधिक संपत्ति के मामले में जेल जाना पड़ा जिसके पश्चात उनकी बहन ने अपनी माँ के साथ पार्टी को स्थापित करने के उद्देश्य से पार्टी की राष्ट्रीय संयोजक के तौर पर 'मारो राजा प्रस्थानम' नाम से पैदल मार्च किया जिसमें लगातार 230 दिन चलकर उन्होंने आंध्र में अपनी और परिवार की पहचान को स्थापित कर दिया।
वाईएस शर्मीला की मेहनत रंग लाई और 2014 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी 67 सीटें जीती और जगनमोहन नेता प्रतिपक्ष बने। पार्टी अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष के नाते जगनमोहन ने 2017 में आंध्र में 3,000 किलोमीटर की पदयात्रा शुरू की जो 430 दिनों बाद 125 विधानसभा क्षेत्रों से गुजरते हुए 2019 को समाप्त हुई जिसमें उनकी बहन की मुख्य भूमिका रही।
2019 में एक बार फिर वाईएस शर्मिला पार्टी और अपने भाई के लिए जनसमर्थन जुटाने के मकसद से लोगों के बीच गईं और उन्होंने 11 दिनों में बस के जरिए पूरे आंध्र प्रदेश में जनसंपर्क अभियान चलाया। इसका असर विधानसभा चुनाव में दिखा और 175 विधानसभा सीटों में से वाईएसआर कांग्रेस ने 151 और लोकसभा की 25 में से 22 सीटें जीत लीं। जगनमोहन धूमधाम से मुख्यमंत्री बने।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो वाईएसआर कांग्रेस को आंध्र में स्थापित करने का श्रेय वाईएस शर्मिला और उनकी माँ को जाता है। चूँकि नई-नवेली पार्टी के मुखिया का आय से अधिक संपत्ति के मामले में जेल चला जाना पार्टी के भविष्य के लिए सही नहीं था अतः माँ-बेटी ने इसे कांग्रेस और चंद्रबाबू नायडू की राजनीतिक साजिश बताकर पूरे प्रदेश में पार्टी और जगन के लिए समर्थन बटोरा। पिता की राजनीतिक साख भी उनके काम आई। अतः यदि यह कहा जाए कि वाईएसआर की राजनीतिक विरासत को किसी ने आगे बढ़ाया है तो उसमें वाईएस शर्मीला को बड़ा योगदान है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
भाई के लिए उन्होंने एक समय राजनीतिक त्याग किया किंतु उन्हें जो सम्मान मिलना चाहिए था संभवतः वह पार्टी में नहीं मिला जिसके कारण उन्होंने अपनी नई पार्टी वाईएसआर तेलंगाना का गठन किया और अब जबकि वो कांग्रेस में शामिल हो गयीं हैं तो उनकी माँ भी उनके साथ आ गई हैं।
जगनमोहन ने अपने मुख्यमंत्री काल में कांग्रेस से दूरी बनाते हुए केंद्र की मोदी सरकार को हर संकट के समय उबारा है। विपक्ष द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर रेड्डी की पार्टी ने केंद्र सरकार का समर्थन किया था। हाल ही में दिल्ली के अधिकारियों की ट्रांसफर और पोस्टिंग से जुड़े अध्यादेश की जगह लेने वाले विधेयक पर भी वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने केंद्र का साथ दिया था जबकि शर्मिला खुले तौर पर कांग्रेस का साथ देते नजर आती हैं।
अपने परिवार से दो-दो मुख्यमंत्री देख चुकीं शर्मिला की पार्टी यूँ तो तेलंगाना में सक्रिय है और हाल ही के विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस को समर्थन दिया था किंतु उनकी जुझारू छवि और संगठनात्मक क्षमता उन्हें आंध्र में भी लोकप्रिय बनाती है। चूँकि उनके पिता भी कांग्रेसी थे तो स्वाभाविक रूप से उनका झुकाव कांग्रेस की ओर ही है जबकि जगन मोहन को अपनी राजनीति चलाने के लिए कांग्रेस का विरोध करना आवश्यक है।
वाईएस शर्मिला कांग्रेस को आंध्र में पुनर्जीवित कर सकती हैं क्योंकि कई राज्यव्यापी पदयात्राओं से उनकी पकड़ निचले स्तर तक है। वहीं जगनमोहन के विरुद्ध आंध्र में असंतोष बढ़ता जा रहा है। यदि शर्मिला इस असंतोष को कांग्रेस के पक्ष में मोड़ देती हैं तो 2014 से आंध्र की राजनीति से गायब हो चुकी कांग्रेस को बड़ी संजीवनी मिल जाएगी।
कर्नाटक और तेलंगाना के बाद आंध्र प्रदेश में कांग्रेस बड़ा अवसर तलाश रही है और वाईएस शर्मिला को चेहरा बनाकर वह अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति कर सकती है। शर्मिला भी जानती हैं कि भाई जगनमोहन के रहते उनकी राजनीति एक-साथ नहीं चल सकती और कांग्रेस का साथ उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति कर सकता है। अर्थात दोनों को एक-दूसरे की आवश्यकता है और दोनों का साथ दोनों का राजनीतिक भला करने का सामर्थ्य रखता है। कुल मिलाकर लोकसभा चुनाव से पहले दक्षिण भारत की राजनीति कांग्रेस को मजबूत करती दिख रही है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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