Craze for fitness: जानलेवा साबित हो रही है सुंदर और सुडौल दिखने की चाहत
Craze for fitness: फिटनेस की चाहत अच्छी बात है, लेकिन जब यह आदत से ज्यादा जुनून बन जाती है, तो खतरनाक साबित हो जाती है। हाल ही में, 46 वर्षीय टेलीविजन स्टार सिद्धांतवीर सूर्यवंशी की असामायिक मृत्यु ने लोगों को एक बार फिर इस मुद्दे पर सोचने के लिए विवश कर दिया है।

पिछले साल सितंबर में बिगबॉस 13 के विनर सिद्धार्थ शुक्ला (40) और अक्टूबर में कन्नड़ फिल्म स्टार पुनीत राजकुमार (47), डेढ़ महीने पहले 21 सितंबर को राजू श्रीवास्तव (50), 30 सितंबर को सलमान के बॉडी डबल सागर पांडे (50) जैसी दूसरी नामी हस्तियां बीते एक साल में इसी तरह के हालात का शिकार हो चुकी हैं। इनसे पहले 2013 में टीवी एक्टर अबीर गोस्वामी और 2017 में सिने अभिनेता इंदर कुमार को भी वर्कआउट करते हुए आये हार्ट अटैक के चलते जान से हाथ धोना पड़ा था।
लेकिन, कोरोना के बाद से फिटनेस के प्रति लोगों का जुनून और इस तरह के मामलों की संख्या अप्रत्याशित रूप से काफी बढ़ी है। हर मौत के बाद ओवर-जिम के खतरों पर चिंताओं और चर्चा के दौर चलते हैं। लेकिन, कुछ दिनों में बात आई-गई हो जाती है।
युवाओं की सेहत और सोच पर पड़ रहा बुरा असर
कामयाबी के लिए भी, जानबूझकर कोई अपनी जान दांव पर नहीं लगाना चाहेगा। फिर क्या वजह है कि इस तरह के हादसे बार-बार हो रहे हैं? शो बिजनेस से जुड़े लोगों के लिए सुडौल दिखना एक पेशेवर जरूरत हो सकती है। लेकिन, सुंदर और सुडौल दिखने का यह जुनून आम युवाओं पर भी सवार है। जिसके चलते वे तरह-तरह की शारीरिक और मानसिक समस्याओं का शिकार हो रहे हैं। शारीरिक सौष्ठव के लिए वे स्टेरॉयड्स लेते हैं, जिन्हें फायदेमंद से ज्यादा नुकसान देह माना जाता है।
स्टेरॉयड के सेवन से दिल कमजोर होता है अैर ब्लॉकेज, किडनी फेलियर जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। यहॉं तक कि इनका उपयोग बंद करने बाद भी सालों तक उनके साइड इफेक्ट्स महूसस किये जाते हैं।
फिटनेस बाजार की ताकतों ने खूबसूरती के ऐसे मानदंड स्थापित कर दिये हैं कि हर कोई उनमें फिट होना चाहता है। महिलायें कम वजन और छरहरापन चाहती हैं तो पुरुष लंबा कद और गठीला शरीर। इसके बिना वे खुद को लेकर अजीब सी हीनभावना से ग्रस्त रहते हैं।
बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर यानी डिस्मॉर्फिया
सुपरफिट और स्मार्ट दिखने की यह चाहत बढ़ते- बढ़ते कब सनक में बदल जाती है, पता ही नहीं चलता। मनोवैज्ञानिक इसे एक बीमारी मानते हैं, जिसे उन्होंने बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर यानी डिस्मॉर्फिया नाम दिया है। इसके शिकार लोग वर्कआउट या स्टेरॉड्स के सेवन तक ही नहीं रुकते, बल्कि खाने को लेकर तरह-तरह के प्रयोग कर-कर के अपनी सेहत को बिगाड़ते जाते हैं। जिसकी वजह से वे चिड़चिड़ेपन और अवसाद जैसी समस्याओं से ग्रस्त हो जाते हैं।
बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर शारीरिक गठन ही नहीं, त्वचा के गहरे रंग, दाग-धब्बों, बड़े दॉंतों, गंजेपन, बालों के सफेद होने जैसी समस्याओं को लेकर भी हो सकता है। इसके शिकार व्यक्ति का ध्यान हर समय अपने उसी अंग विशेष पर लगा रहता है, जिसे वह सौंदर्य या फिटनेस के पैमानों में फिट नहीं मानता। इसे लेकर वह कैरियर, सफलता, रिश्तों और भविष्य को लेकर भी संदिग्ध रहने लगता है। और फिर उनकी यह सोच उनके जीवन पर हावी होने लग जाती है और वास्तविक जीवन में भी, उनमें अपने शरीर को लेकर आत्मविश्वास की कमी जीवन के हर पहलू पर नकारात्मक असर डालने लगती है।
महिलाओं से ज्यादा हैं पुरुष डिस्मॉर्फिक
यह पारंपरिक मिथक कि सुंदर दिखने की चाहत महिलाओं में ज्यादा होती है, अब ध्वंस हो चुका है। इस विषय को लेकर, ब्रिटिश सोशल एंटरप्राइज 'बेटर' द्वारा दो हजार लोगों के बीच कराये गये एक सर्वेक्षण से कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आये। इससे पता चला कि प्रतिभागियों में, बॉडी डिस्मॉर्फिया के शिकारों में महिलाओं की संख्या 49% थी और पुरुषों की 54%।
शारीरिक क्षति या बीमार होने के बावजूद वर्कआउट जारी रखने वालों में भी पुरुषों की संख्या (34%), महिलाओं से अधिक (27%) है। डिस्मॉर्फिया के लक्षणों वाले प्रतिभागियों में 18-24 आयु वर्ग वाले युवाओं की संख्या काफी बड़ी (81%) पायी गयी। इनमें भी 51% ऐसे थे, जिनके लिए वर्कआउट उनके काम, स्टडी या सामाजिक गतिविधियों की तुलना में ज्यादा जरूरी था।
पुरुषों के भीतर, मॉंसपेशियों के उभार को लेकर व्याप्त चिंता को मसल डिस्मॉर्फिया या बायगोरेक्सिया भी कहा जाता है। सर्वे से यह पता चला है कि जिम जाने वाला हर दसवां पुरुष मसल डिस्मॉर्फिया से ग्रस्त है।
सोशल मीडिया और मार्केटिंग देते हैं बढ़ावा
बॉडी डिस्मॉर्फिया डिसऑर्डर की समस्या की सबसे बड़ी वजह है एक तो दूसरों से तुलना करने की हमारी आदत और दूसरे यह गलतफहमी कि सुंदर और सुडौल लोगों का कैरियर और लवलाइफ सामान्य लोगों की तुलना में ज्यादा बेहतर होते हैं। ब्यूटी और फिटनेस के बाजार ने सुनियोजित मार्केटिंग के जरिये इसे बढ़ावा दिया है।
उनके निरंतर प्रचार अभियानों ने कमजोर मानसिकता के लोगों में यह स्थापित कर दिया है कि अगर आप मोटे, काले, नाटे, गंजे, दुबले या बेडौल हैं तो आप अनफिट हैं और जीवन के किसी भी क्षेत्र में सुखी नहीं रह सकते। रही-सही कसर सोशल मीडिया ने पूरी कर दी है।
सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्मों, खासकर इंस्टाग्राम पर बड़ी तादाद में 'जिमफ्लुएंसर' (जिम जाने के लिए उकसाने वाले इन्फ्लुएंसर) मौजूद हैं। इन्होंने जुनूनी वर्कआउट की प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हुए, स्वस्थ वर्कआउट रूटीन और बहुत ज्यादा असर डालने वाली एक्सरसाइजों के बीच के फर्क को धुंधला कर दिया है। इसकी वजह से वर्कआउट, फायदे से ज्यादा नुकसान पहुँचाने लगा है। इसका प्रमाण हैं जिम में वर्कआउट करने के दौरान या इसकी वजह से होने वाली मौतों की बढ़ती संख्या।
खतरे में युवा आबादी
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का एक अनुमान है कि हार्ट अटैक से होने वाली कुल मौतों में 20 प्रतिशत भारत में होती हैं। यही नहीं, 26 से 40 आयु वर्ग की हमारी 53 प्रतिशत युवा जनसंख्या कार्डियाक अटैक के रिस्क के साथ जी रही है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हालात कितने गंभीर हैं। जाहिर है कि हमें अपनी प्राथमिकताओं को फिर से तय करने की जरूरत है।
हमें समझना होगा कि अच्छा स्वास्थ्य, सौंदर्य और सौष्ठव से ज्यादा महत्वपूर्ण है। दूसरों जैसा दिखने के चक्कर में अपनी जान के साथ खिलवाड़ करना कतई समझदारी नहीं कहा जा सकता।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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