डिजिटल दुनिया के अनाम दानदाता
24 फरवरी 2020 में पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों में अचानक दंगे भड़क गये थे। उस दिन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दिल्ली में थे। सीएए का विरोध करने वाले लोगों ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां बटोरने के लिए पूर्व योजना के तहत दिल्ली को दंगों की आग में झोंक दिया। अगले तीन-चार दिनों तक पूर्वी दिल्ली के अनेक इलाके दंगों की आग में झुलसते रहे। दंगों की इस आग में कितने लोग मारे गए, इसका ठीक आंकड़ा तो किसी के पास नहीं है लेकिन अलग अलग स्रोतों से 40 से 53 लोगों की मौत होने का दावा किया गया।

दिल्ली सरकार की ओर से बाद में दंगा पीड़ित 2200 लोगों को 26 करोड़ रूपये का मुआवजा दिया गया। लेकिन सरकारी प्रयास से इतर सामाजिक प्रयास भी हुए। पहली बार ऐसा हुआ कि बिल्कुल नये माध्यम से पीड़ित परिवारों की मदद करने के लिए धन इकट्ठा भी हुआ और लोगों में बांटा भी गया। भाजपा नेता कपिल मिश्रा व कुछ अन्य लोगों ने सोशल मीडिया पर पहल करके 70 लाख रुपये एकत्र किये और दंगे में मारे गये 16 लोगों के परिवारों को तीन तीन लाख रूपये की मदद की।
कपिल मिश्रा ने हाल में नबी निंदा के नाम पर मारे गये कन्हैयालाल और उमेश कोल्हे के परिवार को भी मदद के लिए क्राउड फंडिंग का ही सहारा लिया। क्राउड फंडिग के जरिए रिकार्ड तीन दिनों में उन्होंने डेढ करोड़ से अधिक रूपये एकत्र किये जिसमें से कन्हैयालाल के परिवार को एक करोड़, उमेश कोल्हे के परिवार को 30 लाख तथा कन्हैयालाल को बचाने में घायल हुए ईश्वर सिंह को 25 लाख रूपये दिए गए।
ऐसा संभव हुआ इंटरनेट के कारण। ऑनलाइन पेमेन्ट सिस्टम के साथ बीते कुछ सालों में ऑनलाइन डोनेशन और फंडिग का भी चलन हुआ है। इसे अनेक जाने-अनजाने लोगों से एकत्र किया जाता है इसलिए इसे क्राउड फंडिग कहा जाता है। फंडली.कॉम के आंकड़ों के 2020 के आंकड़ों के अनुसार क्राउड फंडिग के जरिए 34 अरब डॉलर (27 खरब रूपये) इकट्ठा किये गये। इसमें करीब 25 अरब डॉलर सीधे एक एकाउण्ट से दूसरे एकाउण्ट में ट्रांसफर किये गए जबकि 5.5 अरब डॉलर किसी न किसी क्राउड फंडिंग प्लेटफार्म के जरिए एकत्र हुए।
क्राउड फंडिंग के जरिए अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको में सालाना औसत 17.2 अरब डॉलर इकट्ठा किये जाते हैं तो एशिया में यह आंकड़ा 10.54 अरब डॉलर का है। इसके बाद यूरोप का नंबर आता है जहां सालाना औसत 6.48 अरब डॉलर क्राउड फंडिंग के जरिए किसी न किसी सार्वजनिक कार्य के लिए इकट्ठा किये जाते हैं।
क्राउड फंडिग से जुड़ा एक तथ्य और महत्वपूर्ण है कि इसके जरिए दान करनेवालों की औसत उम्र 24 से 35 वर्ष के बीच होती है। यानी सोशल मीडिया के ये नये भामाशाह ज्यादातर नयी तकनीकि से जुड़े हुए या उसे समझने वाले लोग ही हैं। फंडली.कॉम के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि नॉर्थ अमेरिका, एशिया और यूरोप में फण्ड जुटाने के जितने कैम्पेन चलते हैं उनके सफलता की दर 78 प्रतिशत है। यानी जो भी सोशल मीडिया पर किसी कार्य के लिए पैसा इकट्ठा करने आता है उसमें से 78 प्रतिशत मामलों में सफलता ही मिलती है।
भारत में नयी टेक्नॉलाजी का विस्तार और समझ धीमी गति से आगे बढ रही है। जब अमेरिका में पे-पैल एक सफल पेमेन्ट गेटवे बना हुआ था उस समय भी भारत में वह असफल रहा। लेकिन बीते चार पांच सालों में दो ऐसी बड़ी घटनाएं हुई जिसके कारण ऑनलाइन पेमेन्ट सिस्टम के प्रति लोगों का रुझान बढा है। पहली घटना है नोटबंदी और दूसरी घटना है इंटरनेट की सस्ती उपलब्धता व स्मार्टफोन का विस्तार।
भारत में कुल 1.2 अरब मोबाइल कनेक्शन हैं जिसमें से 77 करोड़ लोग स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं। सस्ते इंटरनेट और स्मार्टफोन ने लोगों को ऑनलाइन लेन देन के प्रति उत्साहित किया है। सामान्य चाय नाश्ते के बिल से लेकर कारोबारी लेन देन तक लोग पैसे के लेन देन के लिए किसी न किसी ऑनलाइन पेमेन्ट गेटवे का इस्तेमाल कर रहे हैं। अक्टूबर 2021 में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार उस समय तक भारत में 300 अरब डॉलर सालाना ऑनलाइन मनी ट्रांसफर हो रहा था। यह 2026 तक बढकर 1 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगा जो कुल घरेलू लेन देन का 30 प्रतिशत होगा।
निश्चय ही डिजिटल तकनीकि ने संकट में लोगों की मदद करने के लिए दर दर भटकने से बेहतर विकल्प उपलब्ध करवा दिया है। इसका अलग अलग विचारधारा के लोग इस्तेमाल करके अपने अपने समूहों तक मदद पहुंचाने का प्रयास भी कर रहे हैं। इस तरीके का इस्तेमाल दंगों के दौरान पीड़ित समुदायों, राजनीतिक चुनाव प्रचार के लिए धन संग्रह तथा किसी बीमार या जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए भी किया जाता है। कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार कन्हैया कुमार हों या आम आदमी पार्टी की आतिशी मर्लिना। इन लोगों ने अपने अपने चुनाव प्रचार के लिए क्राउड फंडिंग के माध्यम से अच्छा खासा धन इकट्ठा किया था।
2019 में अपने चुनाव प्रचार के लिए कन्हैया कुमार ने क्राउड फंडिग से 70 लाख तो आतिशी मर्लिना ने 60 लाख रुपये इकट्ठा किये थे। इसी तरह टीएमसी के समर्थक संकेत गोखले ने उसी साल आरटीआई के खर्चे के नाम पर 20 लाख रूपये जमा कर लिए। इसी तरह मनीष सिसौदिया, जिग्नेश मेवानी, डॉ कफील खान, शेहला राशिद और राना अयूब ने अलग अलग समय पर अलग उद्देश्यों के लिए क्राउड फंडिग के जरिए पैसा इकट्ठा किया। इसमें शेहला राशिद, राना अयूब और संकेत गोखले पर क्राउड फंडिग के जरिए इकट्ठा किये गये पैसे के हेर फेर के आरोप भी लगे हैं।
निश्चय ही सोशल मीडिया वैचारिक बहसों को ही आगे नहीं बढा रहा बल्कि विचारधाराओं जुड़े लोगों एवं पीड़ितों को आर्थिक मदद करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण होता है क्राउड फंडिंग की मुहिम का उद्देश्य। उद्देश्य नेक हो तो लोग तुरंत मदद करने हेतु तत्पर हो जाते हैं। अधिकांश लोग तो यह भी नहीं जानते कि यह मुहीम किन लोगों ने शुरू की है। उन्हें सिर्फ धन संग्रह के उद्देश्य से मतलब होता है। हालांकि कई लोग इसमें अपनी वाहवाही करवाने से नहीं चूकते। वहीं अनेक लोग सामाजिक उद्देश्य की आड़ में क्राउड फंडिंग से धन एकत्र करके अपने व्यक्तिगत उपयोग में लेने के आरोप भी झेल रहे हैं।
क्राउड फंडिग प्लेटफार्म चलानेवाली कंपनियां इसमें बिजनेस की बेहतर संभावना भी देख रहे हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से वो इसे व्यावयायिक तौर पर आगे भी बढा रहे हैं क्योंकि ऐसे हर धन संग्रह अभियान में जहां उनका प्लेटफार्म प्रयोग किया जाता है, वो कमीशन लेते हैं। लेकिन यहां एक बात जो सबसे महत्वपूर्ण है वो है इस क्राउड फंडिग में दान करनेवाले वो दानादाता जो किसी उद्देश्य के लिए उस व्यक्ति को पैसा दे रहे हैं जिस पर उन्हें विश्वास है। ये डिजिटल दुनिया के वो अनाम भामाशाह हैं जिनका नाम लोग भले नहीं जान पाते हैं लेकिन वो चुपचाप अपनी क्षमता अनुसार अपना काम कर जाते हैं। बदले में उन्हें सिवाय आत्म संतोष के और भला क्या मिलता होगा?
(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)
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