Parliament and Women: महिला अधिकारों की पटकथा का गवाह रहा है पुराना संसद भवन

Parliament and Women: कहते हैं एडवर्ड लुटियन को उस समय के काउंसिल हाउस (बाद में संसद भवन) की डिजाइन की प्रेरणा मध्य प्रदेश में स्थित 64 योगिनी मंदिर से मिली थी। यह 64 योगिनियों के प्रभाव का असर है या फिर समय की मांग लेकिन अब संग्रहालय का रूप लेने जा रहे उस संसद भवन में महिलाओं को लोकतंत्र में कानूनी रूप से बराबरी पर लाने में जो अहम भूमिका निभाई है उसी का परिणाम है कि आज नये संसद भवन में लोकसभा तथा विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का मार्ग प्रशस्त हो सका है।

हिन्दुओं में बहुविवाह पर रोक हो या मुस्लिमों में तीन तलाक पर रोक, महिला सुरक्षा के लिए संसद का यह भवन एक स्वर्णिम इतिहास का साक्षी रहा है। शायद इसीलिए सोमवार को पुराने संसद भवन की विदाई और नये संसद भवन में प्रवेश के लिए बुलाये गये विशेष सत्र के पहले दिन प्रधानमंत्री मोदी ने संसद भवन की महिमा बताते हुए महिलाओं के मुद्दे को भी छुआ। अपने भाषण में उन्होने संसद में महिलाओं के विशेष योगदान को भी उल्लेखित किया।

women reservation bill Old Parliament House has been witness to the script of womens rights

प्रधानमंत्री मोदी ने न केवल लोकसभा स्पीकर के रूप में सुमित्रा महाजन के साथ अपने अनुभव और उनके योगदान को याद किया बल्कि सबसे कम उम्र की सांसद के रूप में चंद्रानी मुर्मू का जिक्र छेड़ा जो 25 वर्ष की उम्र में संसद सदस्य बनकर इस भव्य भवन में आ गयी थीं। उन्होंने यह भी बताया कि स्वतंत्रता के बाद कुल 7500 संसद सदस्य बनकर इस भवन में प्रविष्ट हुए हैं जिसमें 600 महिला सांसद हैं। यह सच है कि लोकतंत्र के मंदिर के रूप में पुराने संसद भवन ने भारतीय जनता को विशेष रूप से महिलाओं को बहुत कुछ दिया है।

देश के विकास में स्त्रियों के योगदान को समझते हुए ही प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था- '"लोगों को जगाने के लिए महिलाओं का जागृत होना जरुरी है। एक बार जब वो अपना कदम उठा लेती हैं तो उनके पीछे पीछे परिवार आगे बढ़ता है, गाँव आगे बढ़ता है और राष्ट्र विकास की ओर उन्मुख होता है।" यह सच है कि स्वतंत्रता के समय महिलाओं को अत्यधिक भेदभाव का सामना करना पड़ता था और उनकी स्थिति कई मामलों में बदतर थी। इसीलिए संविधान निर्माण के साथ ही महिलाओं को समाज में बराबरी का अधिकार देने के उद्देश्य से कई कानून बनाये गए थे।

संविधान का अनुच्छेद 14 सुनिश्चित करता है कि राज्य किसी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता से वंचित नहीं कर सकता है। अर्थात कानून की नज़र में लिंग भेद के आधार पर भेद-भाव नहीं बरता जा सकता है और यह महिलाओं को भी वही मौलिक अधिकार देता है जो संविधान पुरुष वर्ग को देता है। इससे महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों से उसे क़ानूनी सुरक्षा मिलती है। अनुच्छेद 15(3) महिलाओं के पक्ष में "सुरक्षात्मक भेदभाव" की अनुमति देता है, जिसके अनुसार राज्य महिलाओं की सुरक्षा, रोज़गार, विकास के लिए और उत्पीड़न के विरुद्ध विशेष प्रावधान कर सकता है। अनुच्छेद 39 (a) निर्देशित करता है कि नागरिकों, पुरुषों और महिलाओं को समान रूप से आजीविका के पर्याप्त साधन के उपयोग का अधिकार है।

संविधान निर्माण में इसके मूल में जो अधिकार स्त्री समाज को बलवती करने के लिए दिए गए थे, समय के अनुसार उनमें 50 से अधिक तब्दीलियां लाई गई हैं। बदलते समय के साथ महिलाओं के प्रति अपराध करने के तरीकों में भी बदलाव आया है और साथ ही महिलाओं ने कई जगह स्वयं को सिद्ध भी किया है। इन दोनों स्थितियों में स्त्रियों को और अधिक क़ानूनी सुरक्षा और क़ानूनी अधिकार देने की जरुरत है। अनेक नये विधेयक और मौजूद कानूनों में तब्दीली लाकर महिलाओं के हितों को और अधिक सुरक्षित करने का प्रयास किया गया है।

अनैतिक व्यापार निषेध कानून, 1956 के अनुसार अनैतिक कामों के लिए स्त्री, पुरूष या बच्चों की खरीद व बिक्री करना अवैध दुर्व्यापार (इम्मोरल ट्रैफिकिंग) की श्रेणी में आता है। इस अधिनियम का उद्देश्य महिलाओं और लड़कियों की तस्करी को रोकना है। यह वेश्यावृत्ति के अनैतिक पहलुओं पर अंकुश लगाता है।

दहेज निषेध अधिनियम, 1961 महिलाओं को दहेज़ के कारण होने वाली हिंसा, प्रताड़ना और हत्या जैसे अपराध से सुरक्षा देता है। इसके सेक्शन 3 के तहत दहेज लेना और देना दोनों अपराध है। इसमें 15 हजार तक के जुर्माने और 5 साल की सजा सुनाई जा सकती है। सेक्शन 4 कहता है कि दहेज की मांग करने पर 6 महीने से 2 साल तक की सजा हो सकती है। 1984 और 1986 में इसे संशोधित किया गया और कड़े कानून बनाये गए।

मातृत्व लाभ कानून, 1861 मातृत्व को प्राप्त कामकाजी महिलाओं के हितों की रक्षा करता है। इसके अनुसार गर्भावस्था में और इसके तुरंत बाद कामकाजी महिलाओं को 'पेड लीव' देने की बात कही गई है। अवकाश के दौरान 12 हफ़्तों के पूरे वेतन को देने से इसकी शुरआत की गई जो 2017 में 26 हफ़्तों तक की कर दी गई और अब नीति आयोग ने इसे पूरे 9 महीने करने की सिफारिश की है।

भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 तलाक का अधिकार महिलाओं को भी देता है। तलाक के बाद उनके गुजारे-भत्ते की परिचर्चा करता है। समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 के तहत एक ही तरह के काम के लिए महिला और पुरुष दोनों को मेहनताना भी एक जैसा ही मिलना चाहिए। महिलाओं का अश्लील प्रतिनिधित्व (रोकथाम) अधिनियम 1986, विज्ञापन या प्रकाशनों, लेखन, चित्रों, आकृतियों या किसी अन्य तरीके से महिलाओं के अशोभनीय प्रतिनिधित्व पर रोक लगाता है।

इसके अलावा राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम 1992, महिला सुरक्षा कानून 2016, पोक्सो एक्ट 2012, हिंदू महिला संपत्ति का अधिकार अधिनियम 1937, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005, सती आयोग (निवारण) अधिनियम 1987, कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (निवारण, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 आदि कुछ कानून बनाये गए जो स्त्रियों की शुचिता, बराबरी के अधिकार, सुरक्षा को और अधिक पुख्ता करते हैं।

अभी हाल के परिवर्तनों की चर्चा करें तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मानसून सत्र के आखिरी दिन इसी पुरानी संसद की लोकसभा में भारतीय न्याय संहिता, भारतीय साक्ष्य विधेयक और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में सुधार की दृष्टि से तीन नये विधेयक पेश किये थे। इन विधेयकों ने नारी सुरक्षा को एक नया आयाम दिया। प्रस्तावित कानून में पहचान छुपाकर विवाह करने पर धारा 69 के अनुसार 10 साल की सज़ा और जुर्माना का प्रस्ताव है। प्रस्तावित संहिता में धारा 70 डी के तहत नाबालिग से गैंग रेप करने की स्थिति में मौत तक की सजा तय की गई है।

अब जबकि नये संसद भवन में प्रवेश हो गया है तब पुराने भवन में अधूरा रह गया काम नये भवन के विशेष सत्र में पूरा किया जा रहा है। इस विशेष सत्र में महिला आरक्षण विधेयक पेश हो चुका है जिसके तहत संसद के निम्न सदन यानी लोकसभा तथा राज्यों की विधानसभाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण दिया जाएगा। अगर यह विधेयक पारित हो जाता है तो यह नये संसद भवन में महिलाओं के लिए शुभ शुरुआत होगी। उम्मीद करनी चाहिए कि पुराने संसद भवन में संविधान सभा द्वारा संविधान बनाने से लेकर संसद की हाल तक चली कार्रवाई ने महिला अधिकारों की जो पटकथा लिखी है, नये संसद भवन में वह क्रम निरंतर जारी रहेगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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