CAA: फिर से बवाल की बलि चढ़ेगा, या लागू होगा सीएए?

CAA: नागरिकता संशोधन कानून को लेकर एक बार फिर बवाल होता नजर आ रहा है। पश्चिम बंगाल की एक सभा में केंद्रीय राज्यमंत्री शांतनु ठाकुर ने नागरिकता संशोधन कानून को लागू करने का दावा कर दिया है। उनका कहना है कि एक हफ्ते में इसे लागू कर दिया जाएगा।

चूंकि कुछ ही महीनों बाद लोकसभा का चुनाव होना है इसलिए राजनीति पर टीका टिप्पणी करने वाले एक समूह को लग रहा है कि केंद्र सरकार ध्रुवीकरण के लक्ष्य को हासिल करने के लिए जानबूझकर इस कानून को लागू करने जा रही है।

Will there be again uproar over CAA or will it be implemented?

राजनीतिक समीक्षकों को लगता है कि इस कानून को लेकर पहले से ही सशंकित मुस्लिम समुदाय एक बार फिर सड़कों पर उतरेगा। वह गुस्सा दिखाएगा तो उसके जवाब के तौर पर बहुसंख्यक मानस भी गोलबंद होगा। जिसका फायदा निश्चित तौर पर भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को मिलेगा।

टिप्पणीकारों की सोच किंचित सही हो सकती है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इसी आधार पर संसद से पारित किसी कानून को लागू करने से रोका जाना चाहिए? निश्चित तौर पर इस सवाल का जवाब ना में है।

वैसे यह कानून साल 2014 से पहले तक अफगानिस्तान, बर्मा, पाकिस्तान, बांग्लादेश से आए हिंदुओं, बौद्धों, सिखों को नागरिकता देने का प्रावधान करता है। नागरिकता संशोधन कानून बुनियादी रूप में 1955 में पास हुआ था। इसके तहत बंटवारे के बाद भारत आए लोगों को नागरिक अधिकार देने का प्रावधान किया गया था। इस कानून में पहली बार संशोधन वाजपेयी सरकार के दौरान साल 2003 में हुआ था।

इसके बावजूद पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, बर्मा या म्यांमार से आए हिंदू, सिख, ईसाई, जैन और बौद्ध शरणार्थी किस हाल में है, इसे देखना-समझना हो तो हमें राजस्थान के सीमाई इलाके बीकानेर, जोधपुर या जैसलमेर के शरणार्थी कैंपों और दिल्ली के नजफगढ़ के पास स्थित कैंपों का दौरा करना पड़ेगा।

यहां रह रहे लोगों को ना तो शैक्षिक सुविधाएं मिल पाती हैं, ना उन्हें नियमित रोजगार मिल पाता है और ना ही दूसरी सरकारी सहूलियतें। क्योंकि ये भारत के वैध नागरिक नहीं हैं, इसलिए इनके पास आज के दौर के लिए जरूरी आधार कार्ड, पैन कार्ड आदि नहीं है, वोटर सूची में नाम आदि नहीं है। जमीन खरीद नहीं सकते। दरअसल यह कानून ऐसे ही लोगों के लिए आया था।

लेकिन चार साल पहले 2019 के दिसंबर में जब इस कानून को संसद ने मंजूरी दी थी, तो इसे मुस्लिम विरोधी बताने की शुरूआत हुई। मुस्लिम समुदाय में समाज और राजनीति के कतिपय तत्वों ने जानबूझकर यह संदेश देने की कोशिश की कि यह कानून मुस्लिम विरोधी है। इसके बाद ही इस कानून के खिलाफ देश का तकरीबन समूचा मुस्लिम बहुल इलाका खड़ा हो गया। इसे वामपंथी वैचारिकी से ओतप्रोत राजनीतिक ताकतों ने खुला समर्थन दिया।

इसे संयोग कहें या प्रयोग कि यह कानून 11 दिसंबर 2019 को पारित हुआ और इसके विरोध में धरने और प्रदर्शन इसके ठीक तीन दिनों बाद यानी 14 दिसंबर से शुरू हो गये। देखते ही देखते दिल्ली का शाहीन बाग इसके देशव्यापी विरोध का केंद्र बिंदु बन गया। इसके बाद तो शहर-दर-शहर विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। इसी के विरोध प्रदर्शन में अमरीकी राष्ट्रपति के भारत दौरे के समय षड्यंत्रपूर्वक दिल्ली में दंगे कराए गए।

दरअसल मुसलमानों को बरगलाने की वजह बना है, इसी कानून में 2003 में हुआ संशोधन, जिसके तहत विशेषकर उत्तरपूर्वी राज्यों जैसे असम आदि में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर बनाने की बात है। इसके तहत एक खास अवधि के बाद सीमा पार से आए लोगों की पहचान की कोशिश की जानी थी।

बड़ी बात यह है कि नागरिकता संशोधन कानून बुनियादी रूप से भारतीय मुसलमानों के खिलाफ नहीं है। लेकिन इसका मकसद लगातार सीमा पार से भारत में घुसपैठ करने वाले लोगों की पहचान सुनिश्चित करना और अवैध अप्रवासन को रोकना है।

विशेषकर पूर्वी भारत के राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, मणिपुर, असम आदि में अवैध अप्रवासन बहुत हुआ है, वहां अवैध तरीके से आए लोगों ने राशनकार्ड, आधार कार्ड आदि बनवा लिए हैं। उन लोगों का राजस्थान, पंजाब, दिल्ली, हरियाणा आदि पश्चिमी राज्यों तक विस्तार हो गया है। कुछ लोग तो कश्मीर तक पहुंच गए हैं। गैर भाजपा दलों के लिए ऐसे अप्रवासी बड़े वोट बैंक साबित होते रहे हैं। इसलिए गैर भाजपा दल देश की स्थानीय समस्याओं को भुलाते हुए इन अप्रवासियों को सहयोग करते रहे हैं, इसीलिए उन्हें भी यह कानून नहीं स्वीकार रहा।

यही वजह है कि इस कानून के खिलाफ देशव्यापी विरोध में विपक्षी दलों का बड़ा हिस्सा भी शामिल रहा। तब महाराष्ट्र में कांग्रेस के सहयोग से उद्धव ठाकरे की सरकार थी। अवैध अप्रवासन का दर्द महाराष्ट्र भी झेल रहा है, लेकिन इसे दरकिनार करते हुए महाराष्ट्र ने इस कानून को लागू करने से मना कर दिया था।

यही स्थिति पंजाब की तत्कालीन अमरिंदर सरकार की भी थी, लिहाजा उसका रूख भी उद्धव ठाकरे सरकार की तरह रहा। राजस्थान और मध्य प्रदेश की तत्कालीन कांग्रेस सरकारों के साथ ही पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश ने भी इस कानून को अपने यहां लागू करने से मना किया था। पश्चिम बंगाल में एक दौर में अवैध अप्रवासी वाममोर्चे के बड़े वोटर थे। तब ममता बनर्जी उनका विरोध करती थीं।

लेकिन अब ममता के पाले में ये घुसपैठिए वोटर आ चुके हैं, इसलिए वे अब भी इस नागरिकता कानून को लागू करने से इनकार कर रही हैं। केरल की वाममोर्चे की सरकार भी इससे इनकार करती है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत की संप्रभुता की गारंटी संसद देती है और संसद सर्वोच्च है। सवाल यह है कि क्या सर्वोच्च संसद के कानून को कोई राज्य लागू करने से कैसे मना कर सकता है?

इस कानून की आलोचना के संदर्भ में उठने वाले तर्कों को भी देखा जाना चाहिए। इस कानून में चूंकि विदेशी मुसलमानों का जिक्र नहीं है, इसीलिए तर्क दिया जाता है कि यह कानून भेदभावपूर्ण है। इसी आधार पर इस पर सेकुलरिज्म के उल्लंघन का भी आरोप लगता है।

इस कानून की आलोचना की एक वजह यह भी है कि नागरिकता रजिस्टर एक होगा तो मुसलमानों का बहिष्कार हो सकता है। इससे संविधान में निहित समानता और गैर भेदभाव के मूल्यों को चुनौती मिलती है। आरोप यह भी लगाया जाता है कि यह कानून लागू होने के बाद राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर में कानून की जटिलता की वजह से बेगुनाहों को अपनी नागरिकता साबित करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है, नतीजतन अन्यापूर्ण परिणाम भी देखने को मिल सकते हैं।

वैसे भारत को अवैध अप्रवासन से बचाना है, तुष्टिकरण की राजनीति की बजाय समानता आधारित व्यवस्था को अपनाना है तो यह कानून हर हाल में लागू किया जाना चाहिए। कानून का विरोध ना हो, इसके लिए आशंकाओं का समाधान सरकारी स्तर पर किया जाना चाहिए। लेकिन यह तर्क किसी भी हालत में स्वीकार नहीं हो सकता कि संसद का बनाया कानून लागू नहीं किया जा सकता।

वैसे अल्पसंख्यक विशेषकर मुस्लिम समुदाय की राजनीति करने वाले दलों और उनकी अगुआई करने वाली सामाजिक संस्थाओं ने जिस तरह विरोध के सुर को तेज करना शुरू किया है, उससे लगता है कि उनकी कोशिश एक बार फिर 2019 को ही दोहराने की है।

परंतु उम्मीद की जानी चाहिए कि चार साल के लंबे अंतराल में समाज के हर तबके को इतनी जानकारी तो हो चुकी है कि यह कानून बुनियादी रूप से क्या है और उसका बुनियादी लक्ष्य क्या है? लोग यह समझ चुके होंगे कि यह कानून भेदभाव नहीं करता, बल्कि अति अल्पसंख्यक समुदायों को मुख्यधारा में लाने की कोशिश करता है। अगर ऐसा नहीं हुआ है तो लोगों को इस नजरिये से समझाने की कोशिश होनी चाहिए।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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