Opposition Unity: क्या एकजुट विपक्ष भाजपा को हरा पाएगा?

मल्लिकार्जुन खड़गे के घर पर हुई बैठक में शामिल सभी 18 राजनीतिक दलों का पिछ्ले चुनाव का वोट प्रतिशत 37.18 प्रतिशत बनता है, जबकि भाजपा का अपना खुद का 37.36 प्रतिशत वोट था।

will Opposition Unity be able to defeat the BJP in elections?

Opposition Unity: मल्लिकार्जुन खड़गे के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद विपक्षी एकता की संभावनाएं बढ़ी हैं| जो राजनीतिक दल राहुल गांधी को पसंद नहीं करते थे, वे भी अब मल्लिकार्जुन खड़गे की बुलाई बैठकों में आने लगे हैं| भाजपा और कांग्रेस विरोधी तीसरे मोर्चे की वकालत करने वाले तीन मुख्यमंत्रियों के दल कांग्रेस की बैठकों में आना शुरू हो चुके हैं| जिनमें ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, चन्द्रशेखर राव की भारत राष्ट्र समिति और केजरीवाल की आम आदमी पार्टी शामिल हैं|

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इन तीनों दलों को राहुल गांधी का नेतृत्व मंजूर नहीं| और हैरानी यह है कि राहुल गांधी के मुद्दे पर ही ये तीनों दल मल्लिकार्जुन खड़गे की बुलाई बैठकों में आने लगे हैं| मल्लिकार्जुन खड़गे को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की बड़ी उपलब्धि है| संसद में काले कपड़ों में सफल प्रदर्शन के बाद 27 मार्च को मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपने घर पर एक बैठक बुलाई थी| हालांकि इन बैठक में गैर कांग्रेस भाजपा का मोर्चा बनाने की कवायद कर रहे इन तीनों मुख्यमंत्रियों में से किसी ने खुद बैठक में शिरकत नहीं की है, लेकिन उन्होंने अपने प्रतिनिधि भेज कर अपना समर्थन जताया|

मल्लिकार्जुन खड़गे के घर पर हुई विपक्षी दलों की बैठक में 18 राजनीतिक दलों ने हिस्सा लिया| तो क्या इससे नरेंद्र मोदी के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है? हैदर अली आतिश का एक शेयर याद आता है| बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का, जो चीरा तो इक कतरा-ए-खून ना निकला| कहने को 18 राजनीतिक दलों ने शिरकत की, लेकिन इन सारे राजनीतिक दलों की लोकसभा में हैसियत 144 सीटों की है|

इनमें भी सिर्फ तीन दलों डीएमके, टीएमसी और जेडीयू की सीटें डबल डिजिट में है| बाकी सब सिंगल डिजिट वाले राजनीतिक दल हैं| लोकसभा में 9 सीटों वाली भारत राष्ट्र समिति और 4 सीटों वाली शरद पवार की एनसीपी को भी जोड़ लें तो कांग्रेस समेत इन सभी दलों की हैसियत 127 दलों की है| बाकी 12 दलों के सिर्फ 17 सांसद हैं| तीन पार्टियों का एक एक सांसद है, चार पार्टियों के सांसद ही नहीं हैं|

रिकार्ड के लिए इन सारे राजनीतिक दलों की लोकसभा में हैसियत देख लीजिए - कांग्रेस (51), द्रमुक (24), तृणमूल कांग्रेस (23), जनता दल यूनाइटेड (16), ये 16 सीटें वे भारतीय जनता पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन के कारण जीते थे| भारत राष्ट्र समिति (9), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (4) और बाकी 12 दलों के 17 सांसद हैं| नेशनल कांफ्रेंस (3), इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (3), समाजवादी पार्टी (3), मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (3), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (2), आरएसपी (1) तमिलनाडू की वीसीके (1), झामुमो (1) आम आदमी पार्टी (0), एमडीएमके (0), केरला कांग्रेस (0), राष्ट्रीय जनता दल (0)|

वे बड़ी पार्टियां, जो भारतीय जनता पार्टी के साथ नहीं हैं, लेकिन कांग्रेस के मोर्चे में शामिल नहीं हो रही हैं| सबसे पहले लोकसभा में 22 सीटों वाली वाईआरएस कांग्रेस, 12 सीटों वाला बीजू जनता दल और 10 सीटों वाली बहुजन समाज पार्टी| तीन सीटों वाली तेलुगु देशम पार्टी, 2 सीटों वाला अकाली दल| पचास सीटों के साथ ये पांच दल अभी तटस्थ हैं| जहां तक शिवसेना का सवाल है, तो शिवसेना के 19 में से 15 सांसद वापस भाजपा के साथ जा चुके हैं|

उद्धव ठाकरे के साथ लोकसभा के चार और राज्यसभा के तीन सांसद बचे हैं, लेकिन उद्धव ठाकरे की बची-खुची शिव सेना ने भी वीर सावरकर के मुद्दे कांग्रेस का बायकाट कर दिया है| राहुल गांधी की राजनीति नासमझी के हर रोज नए सबूत सामने आ जाते हैं। खुद को गांधी बता कर और वीर सावरकर को माफी मांगने वाला बता कर राहुल गांधी ने उस उद्धव ठाकरे को भी नाराज कर लिया, जो भाजपा का साथ छोड़कर उनके साथ आए थे|

इस बैठक का सबसे मजेदार पहलू यह रहा कि वीर सावरकर के मुद्दे पर राहुल गांधी को अपना मुहं बंद रखने की हिदायत दी गई| बार बार की राहुल गांधी की जुगाली से शरद पवार भी बहुत नाराज हैं| मंगलवार को उद्धव के साथी संजय राउत ने राहुल गांधी से मुलाक़ात की, तो राहुल गांधी ने उन्हें बताया कि वह अब वीर सावरकर का नाम भी नहीं लेंगे| हम इसी से अंदाज लगा सकते हैं कि दो दिन पहले तक वीर सावरकर के खिलाफ शेर की तरह दहाड़ने वाले राहुल गांधी ने अपनी विचारधारा के साथ कितनी जल्दी समझौता कर लिया| लेकिन संकेत ये भी आ रहे हैं कि उद्वव ठाकरे अपनी गलती सुधारना चाहते हैं, जबकि भाजपा अपना पीछा छुडाने के बाद अब उनकी तरफ देख ही नहीं रही|

अब जरा इससे भी बड़े सच को कसौटी पर रखिए| यह जो 18 दलों का ढिंढोरा पीता जा रहा है, उसकी सच्चाई क्या है| क्या आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और भारत राष्ट्र समिति पुरानी बातें भुलाकर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन करेंगी| क्या समाजवादी पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन करेगी| ये चारों दल गैर भाजपा, गैर कांग्रेस की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं| | आम आदमी पार्टी ने कर्नाटक विधानसभा चुनावों में 80 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है और दूसरी सूची भी जारी होने वाली है| इसी तरह तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चन्द्रशेखर राव और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कर्नाटक में कांग्रेस को हराने के लिए जेडीएस के पक्ष में प्रचार करने का एलान किया है, और जेडीएस मल्लिकार्जुन खड़गे की बुलाई बैठक में शामिल नहीं थी|

जिस समय मल्लिकार्जुन खड़गे के घर पर बैठक चल रही थी, उसी समय ममता बनर्जी और कुमारस्वामी कर्नाटक में कांग्रेस को निपटाने की रणनीति बना रहे थे| इसलिए मल्लिकार्जुन खड़गे के घर पर हुई बैठक के 144 सांसदों में से तृणमूल कांग्रेस, बीआरएस और समाजवादी पार्टी के 35 सांसद निकाल दीजिए, यानी कुल मिला कर 109 लोकसभा सांसदों के दलों की बैठक थी, 35 सांसदों के दल सिर्फ सहानुभूति प्रकट करने गए थे|

आप सवाल उठा सकते हैं कि मैं पिछले चुनाव के आंकड़े ले रहा हूँ, जबकि बात अगले चुनाव की हो रही है, क्योंकि जब ये सभी दल मिल कर चुनाव लड़ेंगें तो इनकी ताकत और सीटें दोगुनी हो जाएगी| तो बता दूं कि मल्लिकार्जुन खड़गे के घर पर हुई बैठक में शामिल सभी 18 राजनीतिक दलों का पिछ्ले चुनाव का वोट प्रतिशत 37.18 प्रतिशत बनता है, जबकि भाजपा का अपना खुद का 37.36 प्रतिशत वोट था|

भारत राष्ट्र समिति, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी को निकाल दें, तो बाकी बचे 14 राजनीतिक दलों को पिछले लोकसभा चुनाव में 28.86 प्रतिशत ही वोट मिला था| इसी लिए नरेंद्र मोदी इस बार समूचे विपक्ष को एक साथ आने की चुनौती दे रहे हैं, फरवरी में लोकसभा में उन्होंने यों ही नहीं कहा था कि एक सब पर भारी है|

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    मल्लिकार्जुन की बैठक में आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, भारत राष्ट्र समिति और समाजवादी के नेताओं ने बाद में स्पष्ट किया है कि इस मीटिंग का मकसद कांग्रेस के लिए एक मुद्दा-आधारित समर्थन था और इसे 2024 के आम चुनावों के संदर्भ में पढ़ा जाने वाला इशारा नहीं समझना चाहिए| तृणमूल के जवाहर सरकार ने कहा, "सभी दलों और नेताओं पर समन्वित और अलोकतांत्रिक हमलों के खिलाफ यह विपक्ष की एकता थी| इसका विपक्षी एकता से कुछ लेना देना नहीं है|" आम आदमी पार्टी तो राजस्थान, मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ में भी कांग्रेस की जड़ों में मठ्ठा डालने की रणनीति बना रही है|

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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