समृद्धि के शीर्ष पर बैठे पारसियों की जनसंख्या वृद्धि नकारात्मक क्यों?
टाटा संस के पूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु के बाद एक बार फिर भारत के लोगों का ध्यान उस पारसी समुदाय की ओर गया है जो भारत का सबसे छोटा धार्मिक अल्पसंख्यक समूह है। साइरस मिस्त्री स्वयं एक पारसी थे और भारत की शपूरजी पलोनजी कंपनी के मुखिया भी। शपूरजी पलोनजी 15 अरब डॉलर बाजार मूल्य की कंपनी है जिसका व्यापार रियल स्टेट से लेकर ऑयर एण्ड गैस, इंजीनियरिंग, टेक्सटाइल और कंन्सट्रक्शन तक फैला हुआ है।

2011 की जनगणना के अनुसार भारत में पारसी समुदाय के लोगों की कुल संख्या 57 हजार 264 रह गयी थी। इस छोटी सी संख्या के बाद भी यह पारसियों की दुनिया में सबसे बड़ी आबादी है। दूसरे नंबर पर वह ईरान है जहां से सात सौ से हजार साल पहले पारसी भागकर भारत आये थे और वर्तमान गुजरात में शरण ली थी।
जब ईरान में इस्लाम का दबदबा बढा तो वहां के मूल निवासी पारसियों को इस्लाम कबूल करवाया जाने लगा। ज्यादातर पारसियों ने इस्लाम कबूल कर भी लिया। जो नहीं करना चाहते थे उन्होने भागकर दुनिया के दूसरे हिस्सों में शरण ले ली। जो पारसी ईरान में आज भी बचे हुए हैं वो मुख्य शहरों से दूर ज्यादातर ईरान के पहाड़ी इलाकों में रहते हैं। उनके अपने ही देश में उनकी आर्थिक और सामाजिक हैसियत बहुत खराब है। लेकिन भारत में पारसी समुदाय ने व्यापार जगत में अपनी सफलता के झंडे गाड़ रखे हैं। भारत की कुछ सबसे बड़ी निजी कंपनियों का स्वामित्व पारसी समुदाय के ही हाथों में हैं। इनमें प्रमुख हैं, टाटा समूह, शपूरजी पलोनजी, गोदरेज, बॉम्बे डॉइंग के स्वामित्व वाला वाडिया ग्रुप और वैक्सीन बनानेवाली कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट।
सबसे कम जन्मदर वाला समुदाय
व्यापार में इतनी सफलता अर्जित करनेवाला पारसी समुदाय लंबे समय से अपनी जनसंख्या को लेकर ही चिंतित रहा है। पारसियों की जन्मदर इस समय नकारात्मक है। इस समय पारसियों में जन्मदर 0.8 है। जिसका अर्थ है कि पारसी समुदाय अपने अस्तित्व को ही समाप्त करने की दिशा में आगे बढ रहा है। 2017 में अल्पसंख्यक मंत्रालय द्वारा टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस तथा पारज़ोर फाउण्डेशन के साथ मिलकर एक अध्ययन किया गया। इस अध्ययन "जियो पारसी" के मुताबिक 1941 में भारत में पारसियों की संख्या 1 लाख 14 हजार थी। लेकिन 6 दशक में यह घटकर 57 हजार के आसपास रह गयी। इसमें भी 31 प्रतिशत 65 साल के ऊपर वाले बूढे हैं।
इस अध्ययन में उन बातों का पता लगाने का प्रयास किया गया जिसके कारण पारसियों की जनसंख्या इतनी तेजी से गिर रही है। अध्ययन में जो प्रमुख बातें उभरकर सामने आयीं उसके अनुसार पारसी नौजवान जरूरत से ज्यादा कैरियर आधारित जीवन जीते हैं। नयी पीढी इतनी अधिक आत्मनिर्भर और व्यक्तिवादी है कि अपने मां बाप के साथ रहना भी पसंद नहीं करती। विवाह की औसत उम्र बहुत ज्यादा है। स्त्रियों का विवाह 27 साल में और पुरुषों का औसत 31 साल में होता है। पारसी अकेले रहना पसंद करते हैं इसलिए हर पीढी में लगभग 30 प्रतिशत पारसी विवाह नहीं करते। पारसियों को बच्चे पैदा करने में कोई खास रुचि नहीं होती। उनकी लड़कियां पारसी धर्म से बाहर जाकर शादियां कर रही हैं और पारसियों में तलाक दर बहुत ज्यादा है।
भारत सरकार का पारसी बढाओ कार्यक्रम
इस अध्ययन के बाद भारत सरकार ने पारसियों की जनसंख्या वृद्धि के लिए अल्पसंख्यक मंत्रालय, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस और पारज़ोर फाउण्डेशन के साथ मिलकर पारसी जनसंख्या बढाओ कार्यक्रम शुरु किया। इस कार्यक्रम के तहत पारसी समुदाय के लोगों को आईवीएफ तकनीक से बच्चे पैदा करने, उनके लालन पालन का खर्च उठाने और उनके बीच बच्चों के महत्व को समझाने के प्रयास किये जा रहे हैं। ये कार्यक्रम मुख्य रूप से दिल्ली, मुंबई और गुजरात में रह रहे पारसियों के बीच चलाये जा रहे हैं। इस 'जियो पारसी' कार्यक्रम से अनुमान है कि 2017 से 2020 के बीच पारसियों की जन्मदर में थोड़ा सुधार आया है।
असली आंकड़ें तो अगली जनगणना के बाद ही सामने आयेंगे लेकिन इन संस्थाओं का आंकलन है कि इस समय 2022 में पारसियों की संख्या 61 से 70 हजार के बीच होनी चाहिए। पनवेल में साइरस मिस्त्री की जिस गाड़ी का एक्सीडेन्ट हुआ और उनकी जान चली गयी उस गाड़ी को जो महिला चला रही थी उनका नाम है अनाहिता पंडोले। अनाहिता वह स्वयं एक गॉइकोनोलॉजिस्ट हैं और जियो पारसी अभियान से जुड़ी हुई है। वो पारसियों की जनसंख्या दर वृद्धि की दिशा में ही काम कर रही है। इस एक्सीडेंट में जहां साइरस मिस्त्री की जान चली गयी, संयोग से अनाहिता और उनके पति की जान बच गयी है।
खैर, घटती जनसंख्या सिर्फ पारसियों का ही संकट नहीं है। भारत में जैन और सिक्खों की जनसंख्या वृद्धि भी नकारात्मक हो रही है। जैनों में जन्म दर 1.2 रह गयी है तो सिक्खों में जन्म दर 1.5 पर पहुंच गयी है। कारण वही हैं जो पारसियों के साथ है। बढती उम्र में विवाह, कैरियर आधारित जीवन, व्यक्तिवाद, जीवन में पश्चिमी सभ्यता के असर के कारण घटती जन्म-दर बाकी के अल्पसंख्यकों को भी और अधिक अल्पसंख्यक बना रहे हैं।
भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक मुसलमानों की जन्मदर भारत में सर्वाधिक है। 1991 के 4.4 प्रतिशत के मुकाबले मुसलमानों के जन्मदर में भी गिरावट तो आयी है लेकिन आज भी सभी धार्मिक समुदायों में सबसे अधिक 2.3 प्रतिशत जन्म दर मुसलमानों की ही है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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