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Translation of Samved: संभव नहीं है सामवेद का अनुवाद

जो अल्पज्ञ रामायण, महाभारत आदि शास्त्र और पुराण की उपेक्षा कर सीधे वेदार्थ में हस्तक्षेप करता है, वह वेद का या लोक का उद्धार नहीं करता अपितु वह अनर्थ करता है। वेद के लिए यह उस पर प्रहार करने जैसा है।

Translation of Samved is not possible

Translation of Samved: वेद इसलिए सर्वोच्च हैं क्योंकि इसके सूत्र चेतना की उच्चतम अवस्था में ही प्रकट होते हैं और चेतना के उसी उच्चतम अवस्था के ज्ञानी द्वारा इसे ग्राह्य किया जा सकता है। लेकिन इसी शुक्रवार को दिल्ली के लालकिला पर एक ऐतिहासिक कार्यक्रम हुआ। इस कार्यक्रम में सामवेद को हिन्दी और उर्दू में 'अनुवाद' करने का दावा किया गया। डॉ इकबाल दुर्रानी नामक एक फिल्मों के राइटर ने सामवेद का अनुवाद करते हुए दावा किया कि जो कार्य औरंगजेब के समय में नहीं हुआ वह मोदी के शासनकाल में संभव हुआ है।

मूलत: बिहार के रहनेवाले इकबाल दुर्रानी का अपना लेखन वाला कैरियर फिल्मों का रहा है। उन्होंने बी और सी ग्रेड की कई फिल्मों का लेखन किया है। लेकिन मोदी राज में पता नहीं उन्हें कहां से दारा शिकोह के अधूरे काम को पूरा करने की प्रेरणा मिल गयी और जिसे श्रीकृष्ण स्वयं वेदों में सामवेद कहकर सर्वोच्च ठहराते हैं, सीधे उसका अनुवाद करने का बीड़ा उठा लिया। उनका कहना है कि कई साल की कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने इस 'काम को अंजाम' दिया है।

कोई जिस शास्त्र का चाहे अनुवाद करे, टीका लिखे, भाष्य करे या फिर भावार्थ छाप दे। शास्त्र किसी को मना नहीं करते। लेकिन उसे कम से कम इतना तो पता होना ही चाहिए कि टीका, भाष्य, भावार्थ और अनुवाद में अंतर क्या होता है। सामवेद का अनुवाद ये अपने आप में असंभव कार्य है। जिस वेद की अनुभूति जन्य स्वर गायन की पद्धति है उसे आप अनुवाद कैसे कर सकते हैं? क्या अनुवादित भाषा में वह छंद और गायन शैली रहेगी जो सामवेद में है? अगर नहीं तो फिर इसे अनुवाद कैसे कहा जा सकता है?

सामवेद श्रुति और गायन शैली में है। इसे सुननेवाले और सुनानेवाले के चित्त पर प्रतिष्ठापित किया जाता है। इसे सुनकर चित्त पर अनुभव किया जा सकता है। यह शाब्दिक अर्थ की समझ के लिए नहीं बल्कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए किया जाने वाला उपक्रम है। क्या आप शास्त्रीय संगीत समझने के लिए सुनते हैं? जो ऐसा करते हैं उन्हें शास्त्रीय संगीत का रस कभी नहीं मिल पाता। शास्त्रीय संगीत अनुभव करने के लिए होते हैं। तो फिर उसके शास्त्र का आप अनुवाद करने का दावा कैसे कर सकते हैं?

वेद सभी धर्मों का मूल है। उसे अवश्य जानना चाहिए। किन्तु वेद जानने के लिए उसके नियमों का जानना अनिवार्य है। सामवेद की व्युत्पत्ति सामन् से हुई है। सन् धातु में मन् प्रत्यय लगाने से
शाबर स्वामी के अनुसार - "विशिष्टा काचित् साम्यो गीतिः सामेत्युच्यते।" अर्थात् मन्त्रों को जब विशिष्ट विधि से गाया जाता है तो उसे सामन् कहते हैं।
साम का शाब्दिक अर्थ है "वह गीत जिसके द्वारा परम चेतना को प्राप्त किया जाता है।"

यहां यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि सामवेद में सर्वाधिक मंत्र ऋग्वेद के ही हैं, किन्तु ऋग्वेद के ऋत्विक् को 'होता' कहते हैं। सामवेद के मंत्रो का अर्थ तो 'होता' भी जानते हैं किन्तु वे सामवेद के "उद्गाता' नहीं हो सकते हैं। यही सामवेद का आधार है कि यह शब्द भावार्थ का विषय नहीं। आर्चिक' और 'गान' इसके मूल हैं।

सामवेद की भाष्य, टीका हो सकती है, यह भी माना जा सकता है कि अर्थ व्याख्या का प्रयास भी हो सकता है किन्तु इसका अनुवाद या तर्जुमा नहीं हो सकता। 'मंत्र' का और ध्वनि व स्वर का क्या और कैसे अनुवाद करेंगे? सामवेद छन्द गायन का विषय है। जहां भाषा स्वर ध्वनि विज्ञान कार्य करता है। इनमें अर्थ से कोई तात्पर्य ही नहीं। ध्वनि बदलते ही सामवेद का तत्व और सत्व दोनों समाप्त हो जाएगा।

जिस प्रकार वायरस के विषय में अध्ययन शोध आदि कार्य करने या उस पर व्याख्यान देने हेतु हमें वायरोलॉजिस्ट ही चाहिए होता है। अंतरिक्ष स्पेस संबंधित विषय पर कार्य करने हेतु अंतरिक्ष विज्ञानी ही अधिकृत हो सकते हैं। यहां तक कि फाइनेंस पर कोई बात सार्वजनिक रूप से रखने के लिए अर्थशास्त्री की अनिवार्यता है। वैसे ही सामवेद पर समाज को कोई भी जानकारी, शिक्षा या ज्ञान संबंधित विषय रखने के लिए वही अधिकृत होता है जिसका स्वयं सामवेद पर अध्ययन हो। जो पंचविश और उद्गाता हो। जिन्होंने स्वयं सामवेद को उसकी तकनीकी और उसके स्वर विज्ञान को समग्रता को समझा हो। साधना की हो। क्योंकि यह सृष्टि की तरंग का, लय और लास्य का विषय है। लस्य का अर्थ है लय, जिससे रस निष्पादित होता हो। यह सृष्टि के लय को ध्वनि से जोड़कर समझे जाने का उपकरण है।

यह संचरण शक्ति अर्थात विष्णु तत्व का विज्ञान है। इसका महत्व इतना बड़ा है कि गीता में भगवान् ने कहा -'वेदानां सामवेदोऽस्मि।' विचार करें कि इसके अनुवाद' का अर्थ क्या हुआ? और फिर यह भी विचार करें कि समस्त स्वर, ताल, लय, छंद, गति, मन्त्र, स्वर-चिकित्सा, राग, नृत्य, मुद्रा, भाव आदि जो सामवेद से ही निकले हैं, उसका अनुवाद कैसे होगा?

यह उदगीथों का रस है। यदि रस का अनुवाद कर सकते हैं तो ही सामवेद का अनुवाद हो सकता है। सामवेद में ऋचाएं नहीं हैं। सामवेद में 'सामानि' हैं। जिनकी एक हजार एक शाखाओं में, सामान के अलग व्याखान, गायन की प्रविधि और मंत्रों के क्रम हैं। क्या यह अनुवाद का विषय हो सकता है? वह भी ऐसे व्यक्ति के द्वारा जिन्हें न इस भाषा का प्रायोगिक विज्ञान और न ही भाषा के सूत्र सिद्धांत का ज्ञान है। न ही उसके ध्वनि स्वर रस छन्द के महत्व का पता है और न ही जिन्होंने सदियों से चली आ रही छान्दोग्य परम्परा की आधारभूत जानकारी ही प्राप्त की हो।

मनु महाराज कहते हैं वेदोऽखिलो धर्ममूलम्! मनु.२.६। वेद सभी धर्मों का मूल है। वेद अवश्य जानिए, किन्तु पहले वेद जानने के नियमों का पालन कीजिए। तभी वेद का लाभ मिल सकेगा।

पुराण, रामायण, महाभारतादि भी वेदार्थ को विस्तार देने वाले ग्रंथ हैं। उन्हें लोक मानस तक पहुंचाये जाने के साधन हैं। रामचरितमानस लोक वेद है। तुलसीदास जी ने हम सबके लिए लोक वेद की रचना की है। ऐसे लोक वेदों की रचना होते रहनी चाहिए। किन्तु मूल वेद के साथ छेड़छाड़ या उसके भाषांतर से न लोक का भला होगा न ही वेद विज्ञान का शोध या प्रसार।

वेदार्थ तक पहुंचने के पूर्व पुराण सहित उक्त ग्रंथों का अध्ययन आवश्यक होता है। इसके उपरांत ही वेद में प्रवेश मिलता है। वेदार्थ के प्रसार के लिए उक्त ग्रंथों को माध्यम बनाना चाहिए, न कि वेद का भाषांतर कर देना चाहिए। भाषा ही है जो संस्कृति और उस संस्कृति के विज्ञान संस्कार का वहन करती है। प्रत्येक वेद के उपनिषद हैं और सभी उपनिषदों का सार गीता है। गीता सर्वोपलब्ध है। उसका अनुवाद, अध्ययन लोक के लिए सुलभ होना चाहिए।

इतना तो प्रत्येक सुधी को जानना ही चाहिए कि वेद आधिदैविक वाणी है। ऋचाओं के छंद होते हैं, छंदों में देवशक्तियां होती हैं। इसे यूं समझें कि सूर्य- चन्द्र इत्यादि में जो ध्वनियां हो रही हैं वे ही सामवेद की सामानि में हैं। आधुनिक विज्ञान कहता है हमारी प्रत्येक क्रिया या स्पन्दन का प्रभाव पूरे ब्रह्मांड पर पड़ता है। मंत्रों का प्रभाव सामान्य से कहीं अधिक है। अतः उन्हें भाषांतर कर उनसे छेड़छाड़ नहीं की जाती।

सामवेद में कुल 1 लाख 44 हजार 'अक्षर' हैं। यहां अक्षरों का और स्वर का महत्व है। अर्थ, भावार्थ का भी नहीं। फिर अनुवाद का क्या तात्पर्य हुआ? सामवेद में गायत्री और प्रगाथ छन्दों का सर्वाधिक प्रयोग है। गायत्री में 24 मात्राएं होती हैं और प्रगाथ में 72 मात्राएं। अब इन मात्रात्मक अक्षरों का भाषांतर अनुवाद या तर्जुमा किस प्रकार होगा। यह भी विचारणीय है।

इसका अर्थ यह नहीं कि समाज में सामवेद गायन के जानकार लोग नहीं है। आज भी कुछ परिवार हैं जो इसके गायन के जानकार हैं। इसकी हजार शाखाओं में मात्र तीन ही बची हुई हैं। इस तरह अनुवाद का प्रोपेगेण्डा करने से अधिक आवश्यकता है कि, उन परिवारों का संपोषण, संवर्धन और प्रतिष्ठा हो। इनमें कौमुथीय शाखा के कुछ गुजराती ब्राह्मण परिवार, रामायणीय शाखा महाराष्ट्र में प्रचलित थी। वहाँ इसके उद्गाताओं की जानकारी लेकर इस शाखा का संवर्धन किया जाना चाहिए तथा जैमिनीय शाखा, जो कि कर्नाटक में प्रचलित है। वहाँ के सामवेद ब्राह्मणों को इस ज्ञान के संवर्धन, संरक्षण हेतु सहयोग किया जाना चाहिए।

अगर सामवेद का संवर्धन ही करना है तो उसके नियमों के अधीन ही संभव है, इस तरह अनुवाद का व्यर्थ प्रचार करके नहीं।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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