संसद में शोर के बीच क्यों दिखा सन्नाटा?

नई दिल्ली। लोकतंत्र का मंदिर, मस्जिद, गुरद्वारा और चर्च कही जाती है संसद। संविधान इसकी आत्मा कहलाती है। पुजारी, मौलाना, ग्रंथी और पादरी कहलाते हैं सांसद। इन्हीं सांसदों की आवाज़ को हम जनता की आवाज़ कहते हैं। यह मान लेते हैं कि सांसद के रूप में मंदिर का पुजारी जो कवायद कर रहा है वही पूजा है। इसी पूजा में आस्था होती है भक्तों की। जी हां, वही भक्त जिन्होंने मतदाता बनकर इन सांसदों को लोकतंत्र के मंदिर में भेजा है।

संसद में शोर के बीच क्यों दिखा सन्नाटा?

पंडित, मौलाना, ग्रंथी और पादरी के तौर पर नियुक्ति की शपथ लेते हुए ये सांसद अचानक ही कुछ भूलने लग गये। बोलना था कुछ, कुछ और बोलने लग गये। प्रज्ञा सिंह ठाकुर अपना नाम ही गलत पढ़ गयीं। गलत को सही बताकर गलत कर गयीं। रिकॉर्ड चेक कराया गया, तो इस बात का खुलासा हुआ। ऐसा लगा कि लोकतंत्र के मंदिर में सच्चाई का 'राम नाम सत्य' करने की ठान ली गयी थी। जैसे-जैसे 'धर्म' का जयघोष हो रहा था, अधर्म की अग्नि धधकने लगी थी। जिन्ना की तस्वीर को पाकिस्तान भिजवाने की रट लगाते रहे अलीगढ़ के सांसद सतीश गौतम की देशभक्ति शपथ के वक्त जाग उठी- भारत माता की जय, जय श्री राम, वंदेमातरम् के नारे फूटने लगे।

जो असदुद्दीन ओवैसी कह रहे थे कि इस देश में मुसलमान किराएदार नहीं है, उन्हें देखते ही जय श्री राम का ऐसा शोर उठा मानो पंडित मत्रोच्चार कर रहे हों। ओवैसी ने दोनों हाथ उठाकर 'मंत्रोच्चार' जारी रखने को कहते रहे। मगर, जल्द ही संविधान की रस्मी शपथ लेकर बोलते सुने गये- जय भीम, जय मीम, अल्ला-हू-अकबर, जय हिन्द। यह अलग किस्म की आयतें रहीं। पश्चिम बंगाल से चुनकर आए सांसदों ने जय श्री राम के नारे लगाए, तो कई ऐसे भी रहे जिन्होंने साथ में मां दुर्गा और मां काली की जय भी जोड़ दिया। एक्टर रविकिशन ने 'हर हर महादेव' का नारा बुलन्द किया। ईश्वर की शपथ लेकर संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखने का संकल्प अचानक संविधान के लिए ली गयी शपथ तोड़ते हुए अपने-अपने ईश्वर के प्रति कथित सच्ची श्रद्धा और कथित निष्ठा रखने के संकल्प में बदल गया। अपने-अपने ईश्वर हो गये। उन ईश्वरों के लिए नारे भी अपने-अपने और एक-दूसरे से अलग थे। हर नारा दूसरे नारे को दबाता दिख रहा था। हर ईश्वर का भक्त दूसरे ईश्वर के भक्तों को नीचा दिखा रहा था। ऐसा करते हुए सभी अपने-अपने ईश्वर को श्रेष्ठ बताते दिख रहे थे।

'ईश्वर-अल्लाह तेरे नाम, सबको सम्मति दे भगवान' की याद हर उस व्यक्ति को आ रही थी जो लोकतंत्र के मंदिर में ईश्वर का शोर सुन रहा था। कोलकाता और नोआखाली जाकर नंगे पैर सांप्रदायिक सौहार्द का मतलब समझाने वाले महात्मा गांधी नि:शब्द थे। ऐसा लगा मानो संसद में 1948 ज़िन्दा हो उठा था। गांधी की आवाज़ मद्धिम पड़ रही थी, उनकी आंखों के सामने अंधेरा छा रहा था।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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