रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में बसाना आसान नहीं
बुधवार को एक बार फिर रोहिंग्या मुसलमान तब चर्चा में आ गये जब खबर आयी कि केन्द्र सरकार उन्हें दिल्ली के बक्करवाला में बसाने की योजना बना रही है। जब यह ट्वीट केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने किया तो अचानक मीडिया और सोशल मीडिया में हंगामा मच गया। मीडिया और सोशल मीडिया पर हुए शोर शराबे के बाद गृह मंत्रालय ने तत्काल बयान जारी करके कहा कि बक्करवाला में अवैध रोहिंग्या शरणार्थियों को नहीं बसाया जा रहा।

हरदीप सिंह पुरी ने जो ट्वीट किया वो भी अपनी जगह कायम है और गृह मंत्रालय की सफाई भी अपनी जगह सही है। असल में गृह मंत्रालय अवैध रोहिंग्याओं की बात कर रहा है और केन्द्रीय मंत्री हरदीप पुरी संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (यूएनएचआरसी) कार्ड होल्डर रोहिंग्याओं की। वर्तमान में भारत में दिल्ली समेत विभिन्न राज्यों में रहने वाले यूएनएचआरसी कार्ड धारक रोहिंग्याओं की संख्या 40 हजार के आसपास है।
रोहिंग्याओं पर जब सोशल मीडिया पर बहस चली, आम आदमी पार्टी को भी मौका मिल गया। उसने भाजपा को अवैध रोहिंग्या को लाने वाला और उसे बसाने वाला बता दिया। पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज ने द्वीट किया - देश के साथ खिलवाड़ के भाजपा के एक बड़े षडयंत्र का खुलासा हुआ है।'' आम आदमी पार्टी के अलावा बीजेपी के अंदर से भी विरोध के स्वर सुनाई दिए। विश्व हिन्दू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी इस निर्णय पर सहमति नहीं थी। कुल मिलाकर निर्णय का विरोध अधिक हुआ, सहमति कम बन पाई।
इसी महीने की बात है। जब 05 अगस्त को अयोध्या में श्रीराम लला के मंदिर निर्माण की आधारशिला रखे जाने के दो वर्ष पूरे हुए। इस अवसर पर तपस्वी छावनी के जगत गुरु परमहंस ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने देश में अवैध रोहिंग्या शरणार्थियों की बढ़ती संख्या पर चिन्ता जताई थी। उन्होंने आशंका प्रकट की थी कि यदि रोहिंग्या मुसलमानों की घुसपैठ इसी प्रकार से बढ़ती रही तो आने वाले समय में राम मंदिर पर भी हमला हो सकता है।''
रोहिंग्या मुसलमानों पर गृहमंत्री अमित शाह का 2020 में हैदराबाद में दिया हुआ बयान बहुत चर्चित हुआ था। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया था कि जब भी केन्द्र की सरकार रोंहिंग्या मुसलमानों को भारत से बाहर निकालने हेतु कोई कार्रवाई करती है तो विपक्ष चिल्लाने लगता है। एक बार विपक्ष रोंहिंग्या मुसलमानों को भारत से बाहर निकालने पर अपनी सहमति दे, फिर सरकार इस दिशा में ठोस कार्रवाई करेगी।
यदि विपक्ष रोंहिग्या मुसलमानों के घुसपैठ के खतरे को नहीं समझ रहा तो उसे इतिहास जानना चाहिए। विपक्ष को जानना चाहिए कि क्यों जिस बांग्लादेश से रोहिंग्या दुनिया भर में फैले, वह उन्हें वापस स्वीकार करने को तैयार नहीं हो रहा? रोहिंग्याओं से निपटने के लिए उसे बार बार चीन से मदद क्यों मांगनी पड़ रही है?
फिर बात सिर्फ बांग्लादेश या भारत की नहीं है। बौद्ध धर्म जैसे शांतिप्रिय धर्म को मानने वाले लोगों को भी हिंसा पर रोहिंग्याओें ने मजबूर कर दिया। 2017 में शांतिप्रिय बौद्ध भिक्षु म्यांमार में हिंसक क्यों हो गए? इस सवाल का जवाब आज भी अनसुलझा है। म्यांमार में जो कुछ हुआ उसके बाद से यह बहस जारी है।
बात सिर्फ म्यांमार तक सीमित होती तो इस विषय पर विमर्श की दिशा कुछ और हो सकती थी लेकिन बौद्ध भिक्षुओं पर हमला और हिंसक होने का व्यवहार चीन, श्रीलंका, थाइलैण्ड तक में दिखा। यह संयोग है कि इन सभी देशों में शांतिप्रिय बौद्ध भिक्षुओं का संघर्ष जिस एक समुदाय से है, वह सभी रोहिंग्या मुसलमान हैं।
म्यांमार में भी रोहिंग्या मुसलमानों की अलग स्थिति नहीं है। जिन मुसलमानों को हम रोहिंग्या नाम से पुकारते हैं, वे तो अविभाजित भारत के चटगांव से छह सौ साल पहले निकले थे। यह तब की बात है जब रखाइन राज्य का नाम अराकान प्रांत होता था। चटगांव वर्तमान बांग्लादेश के दक्षिणी तट पर बसा एक प्रमुख बंदरगाह है। यहीं से निकल कर मुसलमानों का एक बड़ा समूह म्यांमार के अराकान प्रांत के बौद्ध राजा नारामीखला के पास नौकरी करने के लिए आया था। ये लोग अराकान के रोहंग या रखंग नामक जगह पर बस गये। इसलिए आज इन्हें रोहिंग्या मुस्लिम कहा जाता है।
एक समय ऐसा भी आया जब चटगांव से गये इन मुसलमानों ने भारत में मुगलों का शासन आने पर अराकान प्रांत में सत्ता की बाजी पलट दी। अराकान प्रांत पर उनका कब्जा हो गया। लेकिन उनका यह राज अधिक लंबा नहीं चला। उनका तख्ता पलट हुआ। बौद्धों ने 1785 में चटगांव से आये मुसलमानों को परास्त कर अपना राज वापस हासिल किया। इस युद्ध में 35,000 मुसलमान अराकान प्रांत छोड़कर भागे थे।
1826 में बौद्धों को अंग्रेजों से हार का सामना करना पड़ा। अपनी फूट डालों राज करो नीति के अन्तर्गत अंग्रेजों ने उन मुसलमानों को लाकर वापस अराकान प्रांत में बसा दिया, जो पहले भाग गये थे। उनके साथ रहना बौद्ध भिक्षुओं के लिए कठिन हो रहा था लेकिन वे युद्ध हारे हुए थे, इसलिए मजबूरी में उन्हें रहना पड़ा। चटगांव से आये मुसलमानों को यहां मन मांगी मुराद मिली थी। उन्होंने अंग्रेजों का जमकर साथ दिया और बौद्ध धर्म के अनुयायियों का जमकर शोषण किया।
यह वह दौर था जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जापानी सेना के साथ मिलकर अंग्रेजों से लोहा ले रहे थे। इसी दौरान जापानी सेना का रोहिंग्या मुसलमानों से भी टकराव हुआ। लगभग एक लाख मुसलमानों को जापानी सेना ने खदेड़ कर बांग्लादेश वापस भेज दिया था।
म्यांमार में रखाइन राज्य के अंदर चटगांव मूल के मुसलमानों के बुरे दिन वास्तविक अर्थों में 1982 से प्रारम्भ हुए। उन्होंने म्यांमार के मूल निवासी बौद्ध भिक्षुओं का विश्वास खो दिया था। लगातार संघर्षों के बाद प्राथमिक शिक्षा के अलावा हर तरह की शिक्षा तक से इन मुसलमानों को दूर कर दिया गया।
आज म्यांमार के लोग अपने बच्चों को बंगाली मुसलमानों के विश्वासघात के किस्से सुनाते हैं। यही वजह है कि इन्हें वापस लेने को वहां की नई पीढ़ी भी तैयार नहीं है। इतना ही नहीं इनके विश्वासघात के किस्सों का ही असर है कि जिस बांग्लादेश से यह निकल कर गए, वह बांग्लादेश भी इन्हें वापस लेने को तैयार नहीं है।
तीन साल पहले फिर एक बार संगठित होकर रोहिंग्या मुसलमानों ने म्यांमार की सेना पर हमला बोल दिया था। आरोप तो यह भी लगा कि 2012 में उन्होंने बौद्ध युवती का बलात्कार किया। जब बौद्ध भिक्षुओं की तरफ से इसका विरोध हुआ तो रोहिंग्या मुसलमानों ने उन पर भी हमला कर दिया।
इसके बाद दोनों समुदायों के बीच हिंसक झड़प बढ़ गई। 2015 के बाद रोहिंग्या मुसलमान कमजोर पड़ने लगे और इसके बाद हुई हिंसा में लगभग डेढ़ लाख रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार से खदेड़ दिया गया। इस हमले के बाद म्यांमार के बौद्ध भिक्षुओं के बीच रोहिंग्या मुसलमानों के लिए इतना अधिक गुस्सा है कि वे इस बात को स्वीकार करने के लिए भी तैयार नहीं हैं कि ये बंगाली मूल के मुसलमान म्यांमार के नागरिक हैं या उनका म्यांमार से कोई ताल्लुक है।
भारत में भी उनका विरोध इसलिए हो रहा है क्योंकि भारतीय समाज का उन पर विश्वास जम नहीं पा रहा है। दिल्ली के जिस बक्करवाला में उन्हें बसाने की चर्चा चल रही थी, उससे कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर दांतों के डॉक्टर पंकज नारंग की छोटी सी कहासुनी पर बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। इस मामले में अवैध रोहिंग्याओं के शामिल होने की बात भी सामने आई थी।
रोहिंग्याओं पर कोई विश्वास नहीं कर रहा और उन्हें देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जा रहा है। बक्करवाला के स्थानीय लोगों के अनुसार दो साल पहले भी सरकार द्वारा रोहिंग्याओं को बसाने का प्रयास किया गया था, जिसे बक्करवाला के निवासियों के विरोध के बाद वापस लेना पड़ा। अब रोहिंग्याओं की पूरी दुनिया में जैसी खराब छवि है, उसके बाद बक्करवाला में उन्हें पुनः बसाए जाने की कवायद आसान नहीं रहने वाली है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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