इंडिया गेट से: गुजरात के एक गलत फैसले से मोदी की किरकिरी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब लाल किले की प्राचीर से देश में महिलाओं के साथ किए जा रहे भेदभाव और अत्याचारों पर अपनी पीड़ा का इजहार किया था, तो देश भर की पीड़ित महिलाएं अपने प्रधानमंत्री पर गर्व महसूस कर रहीं थीं। भले ही जमीन पर उन की सुनवाई नहीं हो रही होगी, लेकिन उन्हें यह तो लगा कि देश का सर्वोच्च नेता उन की दुर्दशा से अनभिज्ञ नहीं है।

लीक से हट कर मोदी ने अपने मन की बात कही थी। उन्होंने कहा था- "मैं एक पीड़ा जाहिर करना चाहता हूं। मैं जानता हूं कि शायद ये लाल किले का विषय नहीं हो सकता। मेरे भीतर का दर्द कहां कहूं। वो है किसी न किसी कारण से, हमारे अंदर एक ऐसी विकृति आई है, हमारी बोल चाल, हमारे शब्दों में.. हम नारी का अपमान करते हैं। क्या हम स्वभाव से, संस्कार से, रोजमर्रा की जिंदगी में नारी को अपमानित करने वाली हर बात से मुक्ति का संकल्प ले सकते हैं? नारी का गौरव राष्ट्र के सपने पूरे करने में बहुत बड़ी पूंजी बनने वाला है। ये सामर्थ्य मैं देख रहा हूं।" मोदी यह कहते हुए काफी भावुक हो गए थे।
मोदी ने सारे देश के सभी पुरुषों से आग्रह किया था कि वे महिलाओं को अपमानित करने वाली प्रवृति से मुक्ति पाएं। क्या अगले दिन के अखबारों की इस खबर ने उन्हें उद्वेलित नहीं किया होगा कि उन के गृह राज्य गुजरात की उन्हीं की पार्टी की सरकार ने गैंग रेप और एक बच्ची समेत सात लोगों की हत्याओं के 11 दोषियों को आम माफी दे कर रिहा कर दिया?
आज़ादी के अमृत महोत्सव के मौके पर देश को शर्मसार करने वाली इस से बड़ी घटना और नहीं हो सकती। आजकल एक और शर्मनाक प्रवृति देखने को मिल रही है। भ्रष्टाचार के आरोपों में गिरफ्तार किए गए नेता भी पटका लहराते हुए ऐसे जेल में जाते हैं, जैसे आज़ादी की लड़ाई लड़ने के लिए जेल जा रहे हों। इन भ्रष्ट नेताओं की जमानत पर उन का मिठाई खिला कर और जुलूस निकाल कर स्वागत किया जाता है।
समाज की यह विकृति अब अपने पैर ज्यादा फैला रही है। गैंग रेप और हत्या के इन आरोपियों का जेल से रिहा होने पर ऐसा ही स्वागत किया गया। जेल से रिहा होने पर इन्हें कोई शर्म नहीं आई, वे गर्व से मिठाई खाते हुए अपना फोटो खिंचवा रहे थे।
कांग्रेस के नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी से अनेक मुद्दों पर असहमति हो सकती है। इन दोनों और इन के चापलूसों ने परिवारवाद के कारण कांग्रेस को डुबो दिया। नरेंद्र मोदी ने लालकिले की प्राचीर से राजनीति में परिवारवाद पर भी हमला बोला है। इस पर कांग्रेस के नेता भाजपा के उन नेताओं के नाम गिना रहे हैं , जो अपने बाप दादाओं की राजनीतिक विरासत के बूते आज मंत्री, सांसद और विधायक हैं।
यह खिसिआनी बिल्ली खंभा नोचे जैसा है। क्योंकि मोदी का हमला चुने हुए नेताओं के परिवारवाद पर नहीं था। राजनीतिक दलों के परिवारवाद पर था। कांग्रेस, राजद, सपा, द्रमुक, बीजू जनता दल की राजनीति परिवारवाद की विरासत पर टिकी है। लेकिन राहुल गांधी की इस बात से इतिफाक होना पड़ेगा कि गुजरात सरकार ने बिलकिस बानों के अपराधियों को रिहा कर के मोदी के लालकिले से दिए गए भाषण पर पानी फेर दिया।
राहुल गांधी ने एक ट्विट कर के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने अपने ट्विट में लिखा है- "5 महीने की गर्भवती महिला से बलात्कार और उन की 3 साल की बच्ची की हत्या करने वालों को आज़ादी के अमृत महोत्सव के दौरान रिहा किया गया। नारी शक्ति की झूठी बातें करने वाले देश की महिलाओं को क्या संदेश दे रहे हैं। प्रधानमंत्री जी, पूरा देश आप की करनी और कथनी को देख रहा है।"
गुजरात सरकार के इस गलत फैसले से प्रधानमंत्री को राहुल गांधी जैसे विरोधियों से खरी खरी सुननी पड रही है। गुजरात सरकार के इस अपरिपक्व फैसले ने देश भर के विपक्ष को प्रधानमंत्री पर हमलावर रूख अपनाने और शर्मसार करने का मौक़ा दे दिया है।
राहुल गांधी के बाद आजकल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ज्यादा ही हमलावर हो रहे तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने भी तलवारें म्यानों से बाहर निकाल ली हैं। वैसे इस गलती को सुधारने का अब कोई रास्ता नहीं है, क्योंकि तीर कमान से निकल चुका है। केंद्र सरकार शायद ही कुछ कर पाए, लेकिन केसीआर के बेटे केटीआर ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि वह बलात्कारियों और हत्यारों की रिहाई के आदेश को रद्द करवाएं।
आरोपों के अनुसार बलात्कार की यह घटना फरवरी 2002 को हुई थी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बाद 2004 में आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। निचली अदालत ने 2008 में और हाईकोर्ट ने 2018 में 11 अपराधियों को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। तीन साल बाद 2021 में आज़ादी का अमृत महोत्सव शुरू हो गया और केंद्र सरकार ने जून 2022 मे दोषी कैदियों की एक विशेष रिहाई नीति का एलान करते हुए राज्यों के लिए गाइडलाइंस जारी की थीं। हालांकि रेप के दोषी उस सूची में शामिल नहीं थे जिन्हें इस नीति के तहत विशेष रिहाई नहीं दी जानी थी।
गुजरात सरकार का यह फैसला केंद्र के सिद्धांत के खिलाफ है। गृह मंत्रालय की बेबसाइट पर केंद्र की विशेष नीति के चौथे पेज पर पांचवे प्वाईंट में साफ साफ़ लिखा गया है कि विशेष रिहाई की यह नीति आजीवन कारावास की सजा वाले किसी भी शख्स पर लागू नहीं होगी। इस के अलावा बलात्कार, आतंकवाद, दहेज हत्या और मनी लांड्रिंग वाले केसों पर भी लागू नहीं होगी।
लेकिन गुजरात सरकार ने सुप्रीमकोर्ट के एक निर्देश को आधार बना कर 11 बलात्कारियों और हत्यारों को रिहा कर दिया। जबकि सुप्रीमकोर्ट ने 11 में से एक कैदी राधे श्याम शाही की याचिका पर गुजरात सरकार को उस की आम माफी की याचिका पर सिर्फ विचार करने को कहा था, रिहा करने के निर्देश नहीं दिए थे।
गुजरात सरकार का बलात्कारियों और हत्यारों को आम माफी देने वाला फैसला उस की अपनी कैदियों को आम माफी वाली पालिसी के खिलाफ है। पहले यह पालिसी 1992 में बनी थी, जिसे 23 जनवरी 2014 को तब संशोधित किया गया था, जब नरेंद्र मोदी खुद मुख्यमंत्री थे। इस नई नीति में साफ़ तौर पर कहा गया था कि दो या दो से ज्यादा व्यक्तियों की सामूहिक हत्या और बलात्कार या गैंग रेप के सजायाफ्ता दोषियों पर लागू नहीं होगी।
इतना ही नहीं नीति में यह भी कहा गया है कि जिन कैदियों को दिल्ली स्पेशल पुलिस एक्ट 1946 के तहत हुई जांच में अपराधी पाया गया है, उन की सजा भी माफ़ नहीं होगी। इस मामले की जांच भी सीबीआई ने इसी एक्ट के तहत की थी। इस तरह अपनी नीति को भी दरकिनार कर बलात्कारियों और हत्यारों को रिहा कर के गुजरात सरकार ने प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी की नाक कटवा दी। अब चुनावी साल में इस की गाज मुख्यमंत्री पर गिरेगी या गुजरात के गृहमंत्री पर, पर गाज गिरेगी जरुर।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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