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Muharram in Bihar: मुहर्रम पर बिहार में सांप्रदायिक टकराव का मातम क्यों?

Muharram in Bihar: मुहर्रम से एक सप्ताह पूर्व ही बिहार के सभी पुलिसकर्मियों की छुट्टी एक अगस्त तक रद्द कर दी गई। राज्य के सभी जिलों को अलर्ट करते हुए विशेष सतर्कता बरतने का निर्देश दिया गया है। पुलिस मुख्यालय के एडीजी के अनुसार, मुहर्रम के मद्देनजर 30 कंपनी अतिरिक्त पुलिस बलों की तैनाती की गयी है। इसके अलावा केंद्रीय पुलिस बल की छह कंपनियां भी मांगी गई हैं। इन्हें पटना, नालंदा, रोहतास, भागलपुर, सिवान और दरभंगा जिले में तैनात किया गया है। प्रशिक्षु नवनियुक्त 7,790 सिपाहियों की ड्यूटी भी मुहर्रम के मौके पर अलग-अलग जिलों में लगाई गई है। दरभंगा जिला में 30 जुलाई तक इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई है। सोशल मीडिया पर नजर रखने के लिए साइबर विशेषज्ञों की तैनाती की गई है।

ऊपरी तौर पर देखें, तो ये समाचार प्रशासन की चुस्ती के प्रतीक लगते हैं। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। समाज में हर हाल में शांति व्यवस्था कायम रखना पुलिस और प्रशासन का दायित्व है। इसके लिए अगर प्रशासन कई दिन पूर्व से ही जरूरी कदम उठा रहा है, तो यह संतोष की बात है। लेकिन, अगर इन सब स्थितियों का गहराई में विश्लेषण करें तो जो तस्वीर उभरती है, वह काफी चिंताजनक है। यह प्रशासनिक मसला भर नहीं रह जाता है, बल्कि इसके गंभीर सामाजिक निहितार्थ सामने आते हैं।

Why mourning the communal conflict in Bihar on Muharram?

सांप्रदायिक सौहार्द्र के मामले में बिहार की स्थिति विभाजन के बाद से लगातार संतोषजनक रही है। यह सच है कि बीते दशकों में राज्य के कुछ शहरों में कई दुर्भाग्यपूर्ण और त्रासद सांप्रदायिक दंगे हुए, लेकिन नागरिक जीवन में धरातल पर किसी तरह के सांप्रदायिक द्वेष की भावना नहीं रही। राज्य का लगभग संपूर्ण ग्रामीण इलाका सांप्रदायिक अलगाव से मुक्त रहा है। मुहर्रम भले एक विशुद्ध इस्लामिक पर्व हो, लेकिन बिहार में इसका इंतजार हिंदुओं को भी उतनी ही शिद्दत से रहता है। हिंदू न सिर्फ अपने द्वार पर ताजिये का स्वागत करते हैं, बल्कि ताजिये के निर्माण से लेकर प्रदर्शन तक में सहयोगी रहते आए हैं।

एक-डेढ़ दशक पूर्व तक कोई कल्पना नहीं करता था कि मुर्हरम के अवसर पर कोई सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न हो सकता है। कई गांवों में जहां मुस्लिम आबादी बहुत कम होती थी, वहां हिंदू ताजिया बनाने से लेकर जुलूस तक में शामिल होते थे। लेकिन अब स्थिति यह है कि मुहर्रम शांतिपूर्वक संपन्न कराने में पुलिस-प्रशासन के हाथ-पांव पंद्रह दिन पहले से ही फूलने लगते हैं। तमाम तैयारी के बावजूद और ताजिया जुलूस से पूर्व ही एक ही जिले में टकराव और झड़प की कई घटनाएं हो रही हैं।

दरभंगा जिले में मुहर्रम से पूर्व ही एक के बाद कई सांप्रदायिक झड़प, तोड़-फोड़, पत्थरबाजी आदि की घटनाएं हुई हैं। जिले के कमतौल थाना में लाश के अंतिम संस्कार को लेकर शर्मनाक उपद्रव किया गया, जबकि दरभंगा को पारंपरिक तौर पर सांप्रदायिक अलगाव से मुक्त इलाका माना जाता रहा है। दरभंगा मिथिला की केंद्र भूमि है। सांस्कृतिक सदभाव के लिए प्रसिद्ध मिथिला क्षेत्र में मृतक के अंतिम संस्कार को लेकर हिंसक विवाद होना, इस बात का संकेत है कि समाज के अंदर कोई खतरनाक फॉल्ट लाइन आकार ले चुकी है।

ऐसा क्यों हो रहा है? यह एक ज्वलंत सवाल है, लेकिन इसका आधिकारिक उत्तर कहीं उपलब्ध नहीं है। शायद उत्तर कोई देना नहीं चाहता, क्योंकि उत्तर से जो संदेश निकलता है वह राजनीतिक रूप से गलत (पॉलिटिककली इनकरेक्ट) है। टकराव होने पर विपक्ष इसे सरकार की विफलता कहता है, जबकि सत्ताधारी पक्ष के लोग इसे कुछ लोगों की साजिश बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं। दरभंगा के मामलों पर भी यही सब हो रहा है। भाजपा नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष विजय सिन्हा ने दरभंगा की घटना पर टिप्पणी करते हुए कहा, 'बिहार जल रहा है, कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गई है।'

जवाब में सत्ताधारी दल के नेताओं ने इसे कुछ लोगों की साजिश बताया। वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि पुलिस पीड़ित और हमलावर दोनों के साथ समान कार्रवाई कर रही है। उल्लेखनीय है कि जिस शव के अंतिम संस्कार को लेकर उपद्रव किया गया, वह दलित समुदाय का व्यक्ति था। लेकिन, दलित अधिकार, दलित उत्पीड़न आदि की सारी राजनीतिक धाराएं यहां निस्तेज हो गईं। क्यों? आधिकारिक उत्तर अनुपलब्ध है।

सामाजिक विश्लेषण के दूसरे पहलू भी हैं। ऐसी धारणा देश भर में है कि सांप्रदायिक तनाव के लिहाज से बिहार की स्थिति अब भी ठीक है। लेकिन क्या यह सच है? पिछले कुछ वर्षों का रिकॉर्ड खंगालें तो परसेप्शन और जमीनी सच में कोई मेल नहीं दिखता। लगभग हर बड़े हिंदू त्योहारों पर राज्य में सांप्रदायिक टकराव की घटना बड़ी संख्या में होती है। फरवरी 2022 में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने राज्य सभा में जो सूचना दी थी उसके मुताबिक 2018 से 2020 के दौरान देश भर में 1807 सांप्रदायिक दंगों के मामले दर्ज किए गए। इनमें सर्वाधिक 419 दंगे बिहार में हुए। इससे पूर्व के वर्षों के रिकार्ड भी यही बताते हैं कि बिहार में सांप्रदायिक घटना लगातार बढ़ती जा रही है। इसी साल अप्रैल में रामनवमी के दौरान सासाराम, बिहार शरीफ, समेत कई क्षेत्रों में गंभीर दंगे हुए, जिसमें जान-माल का भी काफी नुकसान हुआ था। आलम यह है कि दो अलग-अलग समुदाय के बीच होने वाले विशुद्ध व्यक्तिगत झगड़े भी तुरंत सांप्रदायिक रंग ले लेते हैं। क्यों? आधिकारिक उत्तर कहीं उपलब्ध नहीं है।

स्पष्ट है कि सामाजिक ताने-बाने में कहीं गहराई में कुछ ऐसा चल रहा है, जिस पर सरकार या जिम्मेदार प्राधिकारों का ध्यान नहीं है। इसके संकेत अक्सर मिलते रहते हैं। उन टोलों में भी रातों-रात पक्की मस्जिद, मजार, मदरसे बन रहे हैं, जहां कल तक ईंट की एक दीवार नहीं दिखती थी। जिन मस्जिदों में दशकों से बिना स्पीकर के अजान होते थे, उनमें बड़ी तीव्रता वाले कई स्पीकर लग गए हैं।

दशकों से बेरोकटोक निकलने वाली शोभा यात्राओं के मार्ग बदलने की मांग, रातों-रात उठ जाती है। सुदूर गांवों में मजहबी जलसे आयोजित होने हैं, जिसमें कट्टरता का पाठ खुलेआम पढ़ाया जाता है। इसके अलाव समय-समय पर जहां-तहां से स्लीपर सेल का उद्गम होता रहता है। इन परिवर्तनों को देखकर दूसरे समुदाय के लोगों के मन में लगातार शंका पनप रही है। एक पक्ष के ये प्रो-एक्टिव परिवर्तन और दूसरे पक्ष की आशंका, दोनों मिलकर सद्भाव की पुरानी लकीर को मलिन करती जा रही है। सोशल मीडिया के प्रचार तंत्र के कारण हर बात चारों ओर अब तेजी से फैल रही है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सांप्रदायिक चुनौतियों के लिहाज से बिहार समय के एक गंभीर मोड़ पर खड़ा है। इसका तथ्यात्मक विश्लेषण करना और तदनुसार समाधान परम आवश्यक है। राजनीतिक सुविधा के हिसाब से इस समस्या को देखने का समय शायद अब लद गया है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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