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आधा चुनाव बीतने के बाद कांग्रेस को क्यों याद आया मुफ्त राशन?

Free Ration: आम चुनावों के चार चरण बीत जाने के बाद इंडिया गठबंधन ने कुछ नए वायदे किए हैं। इनमें सबसे प्रमुख है मुफ्त राशन की सीमा को दोगुना करना। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की एक प्रेस कांफ्रेंस में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने साझा प्रेस कांफ्रेंस में बीजेपी को एक तरह से पीछे छोड़ने की कोशिश की है।

लेकिन मुफ्त में दोगुना राशन देने के कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के वायदे ने कुछ प्रश्न खड़े किए हैं। सवाल यह है कि चार चरण बीतने के बाद आखिर ऐसा क्या हुआ कि इंडिया गठबंधन को यह वायदा करना पड़ा। इस योजना पर अक्सर इंडिया गठबंधन के दल सवाल उठाते रहे हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठना भी लाजमी है कि क्या उन्होंने भी मान लिया है कि मुफ्त राशन योजना सही है और उसे ठीक से लागू किया जाना चाहिए।

Free Ration

वैश्विक महामारी कोरोना ने साल 2020 में जब पूरी दुनिया को अपने चपेटे में ले लिया, तो पूरी दुनिया ही एक तरह से ठप हो गई थी। उस दौर में मोदी सरकार ने मुफ्त राशन की योजना शुरू की थी, जिसे महज एक साल के लिए ही लाया गया था। इसके तहत अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त राशन दिया जाना शुरू हुआ। कोरोना पर काबू पाने के बाद जब जनजीवन पटरी पर आने लगा तो पहले इसे दिसंबर 2022 तक के लिए बढ़ाया गया और फिर राजनीतिक जरूरतों के लिहाज से इसे और पांच साल तक के लिए लागू कर दिया गया है।

मुफ्त राशन योजना लागू होने के बाद से हुए कई चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को जीत मिली है। पंजाब, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना इसके अपवाद रहे हैं। मोदी सरकार और बीजेपी को मुफ्त राशन योजना का चुनावी लाभ मिलता रहा है। मुफ्त राशन योजना की ही वजह से देश में एक नए शब्द का चलन बढ़ा है। मुफ्त राशन उठाने वाले लोगों को सियासी तौर पर लाभार्थी वर्ग कहा जा रहा है।

मुफ्त राशन, उज्ज्वला, प्रधानमंत्री आवास, शौचालय और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं की वजह से निश्चित तौर पर भारतीय जनता पार्टी का एक बड़ा वोट बैंक बना है। इसी वजह से कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी पार्टियां इस योजना का विरोध करती रही हैं। हालांकि मुखालफत का उनका तर्क कुछ अलग रहा है। मोदी सरकार दावा करती रही है कि उसके कार्यकाल में 25 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से उपर लाया जा सका है।

भारत की आबादी करीब एक सौ चालीस करोड़ है। यानी देश की आबादी का पचपन फीसद से अधिक हिस्सा मुफ्त राशन के दायरे में आता है। इन्हीं आंकड़ों के आधार पर विपक्षी दल बीजेपी और मोदी सरकार पर आरोप लगाते रहे हैं कि अगर अस्सी करोड़ लोगों तक मुफ्त राशन पहुंच रहा है तो आखिर कौन लोग हैं जो गरीबी रेखा से उपर लाए गए हैं।

विपक्षी दल मुफ्त अनाज योजना का विरोध करते हुए तर्क देते रहे हैं कि मुफ्त राशन देने के बजाय लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया जाना चाहिए। मुफ्त राशन योजना पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ की चर्चा भी विपक्ष करता रहा है। लेकिन ऐसे तर्क देने वाला विपक्ष जब आधे से ज्यादा चुनाव बीतने के बाद मुफ्त राशन की योजना के तहत दोगुना अनाज देने का वायदा करता है तो सवाल उठेंगे ही। तो क्या यह मान लिया जाना चाहिए कि विपक्षी गठबंधन अपनी आशंकित हार के अंतर को कम करने के लिए यह नया वायदा लेकर आया है?

मौजूदा चुनाव प्रक्रिया के बीच सोशल मीडिया पर विपक्षी खेमा कहीं ज्यादा सक्रिय और ताकतवर नजर आ रहा है। 2014 और 2019 की तुलना में बीजेपी की अगुआई वाला सत्ताधारी खेमा सोशल मीडिया पर विपक्षी हरावल दस्तों की तुलना में कमजोर नजर आ रहा है। सोशल मीडिया पर बीजेपी खेमे की उपस्थिति का सबसे बड़ा हिस्सा उस वर्ग का है, जो वैचारिक रूप से बीजेपी और संघ परिवार का समर्थक है। उसे निजी तौर पर बीजेपी से कोई लाभ हासिल नहीं हो रहा है। जबकि विपक्षी खेमे की ओर से सोशल मीडिया पर सक्रिय दस्तों में से ज्यादातर को विपक्षी खेमे से आर्थिक और दूसरे तरह के फायदे मिलने की खबर है।

अगर आप सोशल मीडिया को देखें तो लगेगा कि मौजूदा चुनावों में बीजेपी की अच्छी स्थिति नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि लाभार्थी वर्ग, जातीय गणित और नरेंद्र मोदी की महिला, अति पिछड़े समेत कुछ वर्गों के बीच स्थापित क्रेज की वजह से जमीनी स्तर पर चुनाव का दृश्य सोशल मीडिया की तुलना में कुछ और है। चार चरणों में हुई वोटिंग में एक और प्रवृत्ति दिखी है। बीजेपी और मोदी सरकार से कुछ वजहों से चिढ़े हुए पारंपरिक वोटर, मतदान केंद्रों पर जाकर बीजेपी या उसके गठबंधन वाले दलों को ही वोट दे रहे हैं। वैसे आम बहसों और विमर्श में वे बीजेपी के कटु आलोचक हैं। बीजेपी को वोट देने को लेकर उनका तर्क है कि तुलनात्मक रूप से यही पार्टी ठीक है। इसका एक मतलब यह हुआ कि बीजेपी के बरक्स खड़े विपक्षी खेमे की साख मोदी और बीजेपी के आलोचकों के एक बड़े वर्ग में भी नहीं है।

चुनाव को लेकर अपना अनुभव यह है कि उसकी असलियत राजनेता और राजनीतिक दल बाकी लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा गहराई से समझते हैं। बशर्तें कि वह चापलूस पसंद ना हो और उसके इर्द-गिर्द चापलूस नेता ना हों। वह असल सूचनाओं और चापलूसी वाली जानकारियों में फर्क कर सकता हो। शायद विपक्षी खेमे को अंदाजा लग गया है कि चुनाव की जमीनी हकीकत कुछ और है। इसीलिए उसने अपना नुकसान कम करने के लिए मुफ्त राशन योजना को बढ़ाकर दोगुना करने का वायदा किया है। इस योजना की घोषणा करते वक्त कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि चूंकि कांग्रेस की सरकार कर्नाटक और तेलंगाना में ऐसा कर चुकी है, लिहाजा उसी तर्ज पर यह योजना पूरे देश में लागू की जाएगी।

कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बने एक साल और तेलंगाना में करीब छह माह हो चुके हैं। अगर कांग्रेस को अपनी इस योजना पर इतना ही भरोसा था तो उसने अपने चुनावी घोषणा पत्र में इसे क्यों नहीं शामिल किया। न्याय पत्र में पार्टी अपनी इस योजना को क्यों भूल गई? अगर उसे अपनी यह योजना इतनी ही बेहतर लगती थी तो वह इसे चार चरणों के चुनाव के बाद लेकर क्यों आई। अगर इन सवालों के जवाब खोजे जाएंगे तो उनका सीधा उत्तर तो यही नजर आता है कि चार चरणों के चुनाव के बाद विपक्षी खेमे और कांग्रेस को मतदाताओं की नजर में अपनी जमीनी हकीकत पता चल चुकी है, इसी वजह से वह नए वायदों की पोटली खोल रही है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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