Bharat Ratna Awards: चरण सिंह, कर्पूरी ठाकुर और नरसिम्हा राव को भारत रत्न क्यों
Bharat Ratna Awards: नरेंद्र मोदी सरकार ने पांच साल के अंतराल के बाद पांच हस्तियों को भारत रत्न सम्मान देकर राजनीति में हलचल पैदा कर दी है| इनमें से कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन को भारत रत्न दिए जाने पर किसी को कोई एतराज नहीं होना चाहिए, है भी नहीं|
लाल कृष्ण आडवाणी भाजपा के शीर्ष नेता रहे हैं, और भाजपा को शिखर पर ले जाने में उन्हीं की प्रमुख भूमिका रही है| नरेंद्र मोदी को संगठन से चुनावी राजनीति में लाने और चुनावी राजनीति में प्रवेश से पहले ही मुख्यमंत्री बनवाने का श्रेय भी आडवाणी को जाता है| लेकिन उनका नाम बाबरी ढाँचे के विध्वंस से जुदा है, इसलिए सेक्यूलरिज्म की राजनीति करने वाले दलों ने उन्हें भारत रत्न दिए जाने पर एतराज जताया है|

विवादास्पद ढांचा टूटने के बाद साजिशकर्ताओं के रूप में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई थी, खासकर यूपी की समाजवादी पार्टी और उसके मुखिया मुलायम सिंह उन्हें अपराधी मानते थे, जबकि किसी भी अदालत ने उन्हें अपराधी नहीं माना है| अटल बिहारी वाजपेयी के बाद वह भाजपा के शिखर पुरुष हैं, इसलिए भाजपा सरकार की ओर से उन्हें भारत रत्न दिया जाना आश्चर्यचकित नहीं करता|
कर्पूरी ठाकुर और चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न दिए जाने पर भी किसी ने उंगली नहीं उठाई, लेकिन नरसिम्हा राव को भारत रत्न सम्मान दिए जाने पर कुछ लोगों ने खुल कर उंगली उठाई, कुछ लोगों ने उंगली तो नहीं उठाई, लेकिन उन्हें तकलीफ बहुत हुई है| इनमें सबसे पहले सोनिया गांधी का नाम लिया जा सकता है, इसके बाद मणिशंकर अय्यर जैसे कई कांग्रेसी नेता भी शामिल हैं|

हिन्दुओं का एक वर्ग भी नरसिम्हा राव को भारत रत्न दिए जाने से क्षुब्ध है, क्योंकि वह 1991 में धार्मिक स्थल संरक्षण के नाम पर एक ऐसा क़ानून बना गए, जिससे हिन्दुओं को मुगल काल में गिराए गए मन्दिरों पर कानूनी लड़ाई के अधिकार से भी वंचित कर दिया गया| इससे पहले मोदी सरकार ने जब कार सेवकों पर गोली चलवाने वाले मुलायम सिंह को पद्म विभूषण दिया था, तब भी भाजपा का कट्टर हिन्दू वोट बैंक मोदी से खफा हुआ था|
लेकिन नरसिम्हा राव को भारत रत्न दिए जाने से मोहब्बत की दूकान चलाने वाले सोनिया परिवार की नफरत की असली कहानी वोटरों के दिमाग में ताज़ा हो गई है| सोनिया परिवार ने नरसिम्हा राव के साथ क्या व्यवहार किया था, वह कम से कम ब्राह्मणों को जरुर याद आएगा| नरसिम्हा राव सरकार के कम से कम दो मंत्री अर्जुन सिंह और मणिशंकर अय्यर हर बात की रिपोर्ट सोनिया गांधी को करते थे|
सोनिया गांधी दो कारणों से नरसिम्हा राव से बेहद खफा थी, पहली तो यह कि राजीव गांधी की हत्या की जांच बहुत धीमी गति से चल रही थी, दूसरी यह कि उनके प्रधानमंत्री रहते बाबरी ढांचा टूटा था| सोनिया गांधी खेमे के मंत्रियों ने उनके कान भरे थे कि नरसिम्हा राव की मिलीभगत से बाबरी ढांचा टूटा है|
मणि शंकर अय्यर ने अपनी किताब के विमोचन के समय यहाँ तक कहा था कि नरसिम्हा राव भाजपा के पहले प्रधानमंत्री थे| नरसिम्हा राव का जब देहांत हुआ तो सोनिया गांधी के दबाव में मनमोहन सिंह सरकार ने उनका दाह संस्कार दिल्ली में करने की इजाजत नहीं दी थी| सोनिया गांधी को डर था कि अगर उनका दाह संस्कार दिल्ली में हुआ, तो नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी के साथ नरसिम्हा राव का स्मारक भी बन जाएगा|
नरसिम्हा राव का पार्थिव शरीर जब हैदराबाद ले जाने के लिए एअरपोर्ट ले जाया जा रहा था, तो रास्ते में कांग्रेस दफ्तर भी ले जाया गया, क्योंकि वह कांग्रेस अध्यक्ष भी रहे थे और कांग्रेस सरकार के ही प्रधानमंत्री थे| लेकिन सोनिया गांधी ने पार्टी दफ्तर को हिदायत दे दी थी कि नरसिम्हा राव के शव को दर्शनार्थ पार्टी कार्यालय में नहीं रखा जाएगा|
सोनिया गांधी के निर्देशों पर पार्टी कार्यलय के दरवाजे तक नहीं खोले गए, और राव का पार्थिव शरीर एक घंटे तक 24 अकबर रोड पर रखा रहा| अब किरकिरी से बचने के लिए खून का घूँट पी कर सोनिया गांधी और कांग्रेस ने नरसिम्हा राव को भारत रत्न दिए जाने का स्वागत किया है|
कर्पूरी ठाकुर और चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न दिए जाने से इंडी एलायंस की धड़कने तेज हो गई हैं| इंडी एलायंस के किसी भी राजनीतिक दल ने इन पुरस्कारों का विरोध नहीं किया, लेकिन राजनीतिक दलों के समर्थक इस पर हाय तौबा मचा रहे हैं|
वे बिहार में पिछड़ी जातियों के सबसे बड़े नेता कर्पूरी ठाकुर, और जाटों व किसानों के सबसे बड़े नेता पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह को दिए गए सम्मान को चुनावी दृष्टि से वोट साधने वाला मान रहे है| इन दोनों हस्तियों को भारत रत्न का कोई राजनीतिक दल विरोध कर भी नहीं सकता, भले ही लालू यादव ने कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दिए जाने के समय पर सवाल उठाया है|
कर्पूरी ठाकुर और चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न दिए जाने का राजनीतिक असर तो हुआ ही है| बिहार में गैर यादव पिछड़ी जातियों के नेता नीतीश कुमार इंडी एलायंस छोड़कर राजग में वापस आ गए और यूपी में चौधरी चरण सिंह के पोते और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जाट बेल्ट में प्रभाव रखने वाले जयंत चौधरी भी इंडी एलायंस छोड़कर एनडीए में आ रहे हैं|
इसमें कोई शक नहीं है कि नरेंद्र मोदी ने दोनों हस्तियों की जातियों से जुड़े समाज को साधने के लिए उन्हें भारत दिया है, लेकिन कोई यह नहीं कह सकता कि दोनों हस्तियाँ इस सर्वोच्च सम्मान की हकदार नहीं थी| दोनों को सम्मान दिए जाने की मांग लंबे समय से की भी जा रही थी| दोनों का भारतीय जनता पार्टी से कोई ताल्लुक नहीं था कि प्रधानमंत्री मोदी पर पक्षपात का आरोप लगे|ले
किन कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दिए जाने पर मीडिया में इस तरह की खबरें खूब फैलाई गई कि बिहार में आरक्षण लागू करने के विरोध में पूर्व जनसंघियों ने समर्थन वापस लेकर उनकी सरकार गिराई थी| जबकि यह तथ्य नहीं है, जनता पार्टी सरकार में शामिल जनसंघियों ने आरक्षण का विरोध किया होता, तो केबिनेट और विधानसभा में आरक्षण का बिल पास ही नहीं होता| कर्पूरी ठाकुर सरकार असल में समाजवादियों के आपसी झगड़े के कारण गिरी थी|
सच यह है कि जनसंघियों ने ही दोनों बार अति पिछड़ी जाति के कर्पूरी ठाकुर को मुख्यमंत्री बनवाया था| पहली बार 1971 में जब साझा सरकार बन रही थी, तो समाजवादियों ने रामानन्द तिवारी को मुख्यमंत्री पद के लिए चुना था, जबकि जनसंघ के दबाव में कर्पूरी ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाया गया था|
दूसरी बार 1977 में जब जनसंघ और समाजवादी पार्टी का जनता पार्टी में विलय हो चुका था, तब समाजवादियों ने सत्येन्द्र नारायण सिन्हा को मुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवार बनाया था, दोनों में मुकाबला हुआ था, जिसमें जन संघियों के वोट से कर्पूरी ठाकुर नेता चुने गए थे|
जो लालू यादव खुद को कर्पूरी ठाकुर का राजनीतिक वारिस बताते हैं, उन्होंने कर्पूरी ठाकुर के मुंगेरी लाल कमीशन की सिफारिशों पर आधारित आरक्षण फार्मूले का विरोध किया था, क्योंकि उस फार्मूले में यादव क्रीमी लेयर में शामिल किए गए थे| लालू यादव उन्हें कपटी कर्पूरी कहा करते थे| कर्पूरी ठाकुर ने उनके जवाब में पत्रकारों से बात करते हुए कहा था कि वह यादव होते तो उनका विरोध नहीं होता|
चौधरी चरण सिंह के भाजपा के साथ हमेशा खट्टे मीठे संबंध रहे| 1967 में वह कांग्रेस छोड़कर जनसंघ के समर्थन से पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे| 1979 में चौधरी चरण सिंह और पूर्व समाजवादियों ने पूर्व जन संघियों पर दोहरी सदस्यता के नाम पर मोरारजी देसाई की सरकार गिरा दी थी तो चरण सिंह जनता पार्टी सेक्यूलर बनाकर कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बन गए थे|
लेकिन कांग्रेस ने छह महीने से पहले ही उन पर शर्त लगा दी कि वह आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी और संजय गांधी पर दायर मुकद्दमे वापस लें| चरण सिंह ने यह शर्त मानने की बजाए प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था| घड़ी की सुई लौट कर आई जब 1980 में पूर्व जनसंघियों ने भारतीय जनता पार्टी के रूप में नई पार्टी बना ली थी और चौधरी चरण सिंह ने भी अपनी लोकदल बना ली थी| चरण सिंह ने एक बार फिर अटल बिहारी वाजपेयी को दोनों पार्टियों के विलय का प्रस्ताव दिया था, लेकिन चोट खाई भाजपा ने विलय से इनकार कर दिया था|
आखिर 1983 में दोनों पार्टियों में फिर से गठबंधन हुआ| गठबंधन के बाद चौधरी चरण सिंह लोकसभा में और लाल किशन आडवाणी राज्यसभा में गठबंधन के नेता बने थे| चौधरी चरण सिंह और बाद में उनके बेटे अजीत सिंह के साथ भाजपा का गठबंधन टूटता बनता रहा| अजीत सिंह वाजपेयी सरकार में कृषि मंत्री भी रहे|
पश्चिम उत्तर प्रदेश की जाट बेल्ट में चरण सिंह के परिवार का काफी दबदबा रहा है, लेकिन 2013 के जाट-मुस्लिम दंगों के बाद जाट बड़ी तादाद में अजीत सिंह का साथ छोड़कर भाजपा के साथ जुड़ गए| इस कारण जाटलैंड में चरण सिंह के पोते जयंत चौधरी का वह दबदबा नहीं रहा| 2019 के लोकसभा चुनावों में अजीत सिंह के रालोद को एक भी सीट नहीं मिली, खुद चौधरी अजीत सिंह और उनका बेटा जयंत चौधरी भी हार गए| लेकिन रालोद, सपा, बसपा गठबंधन के कारण भाजपा को भी नुक्सान हुआ, वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सात सीटें हार गई थी|
अपने पिता अजीत सिंह के देहांत के बाद जयंत चौधरी लगातार सपा के साथ गठबंधन में थे, लेकिन उन्हें इसका कोई राजनीतिक फायदा नहीं हो रहा था| क्योंकि जाट वोटों पर उनका पूरा कंट्रोल नहीं रह गया| आखिर उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन का फैसला किया है, जिससे जाट वोट एकसाथ आएँगे और भाजपा 2019 में हारी सातों सीटें गठबंधन के साथ जीतने की स्थिति में आ जाएगी|
जिस तरह 2019 में नीतीश कुमार और राम विलास पासवान के साथ गठबंधन में एनडीए ने 40 में 39 सीटों पर कब्जा कर लिया था, ठीक वैसे ही जयंत चौधरी, अनुप्रिया पटेल, ओम प्रकाश राजभर और संजय निषाद के साथ गठबंधन से यूपी में भी वैसी ही स्थिति बन रही है|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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