यूपी भाजपा को जाटलैंड बनाने की कोशिश पड़ी भारी, जातियों में बिखर गया हिंदुत्व!
Uttar Pradesh BJP: केंद्र में दो बार भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनवाने वाला उत्तर प्रदेश 2024 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के लिये सबसे बड़ा झटका साबित हुआ है। खुद नरेंद्र मोदी की बनारस सीट पर जीत का अंतर बहुत कम हो गया।
तीन बार गुजरात के मुख्यमंत्री और दो बार प्रधानमंत्री बनने तक नरेंद्र मोदी बहुमत की सरकार चलाते आये हैं। पहली बार मोदी के गले में गठबंधन सरकार की हड्डी अटकी है।

सवाल उठ रहे हैं कि भाजपा के लिये सबसे ज्यादा उम्मीदों वाले उत्तर प्रदेश का नतीजा इतना हतप्रभ करने वाला कैसे हो गया? दरअसल, इस हार के कारण तो कई हैं, जो लंबे अर्से से मौजूद थे, लेकिन जीत के जश्न में नजर नहीं आ रहे थे। हार के बाद अब सारे रोग सतह पर आने शुरू हो चुके हैं, जिसमें भीतरघात से लेकर नेताओं का अहंकार और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा भी शामिल है।
उत्तर प्रदेश में भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण प्रदेश संगठन का निरंकुश हो जाना रहा है। जब तक पार्टी सत्ता से बाहर रही, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष एवं कार्यकर्ताओं में समन्यवय बना रहा। प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए डा. लक्ष्मीकांत वाजपेयी अपने कार्यकर्ताओं के लिये एक फोन पर उपलब्ध थे, लेकिन सत्ता के बाद वाले अध्यक्षों की उपलब्धता अपने कार्यकर्ताओं के लिये बेहद सीमित हो गई। पार्टी में पराक्रम की जगह परिक्रमा वाले नेताओं की पूछ बढ़ गई। बाहर से आने वाले कैडर नेताओं पर भारी पड़े। भाजपा कार्यकर्ताओं का वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी से मिलना तो और मुश्किल हो गया। पूरे प्रदेश को संभालने के लिये अध्यक्ष बनाये गये भूपेंद्र चौधरी केवल पश्चिमी यूपी और जाटों के अध्यक्ष बनकर रह गये, जो चुनाव में भाजपा को भारी पड़ गया।
आखिर मोदी-योगी फैक्टर और अमित शाह की चुनावी रणनीति के बावजूद भूपेंद्र चौधरी वैसा रिजल्ट क्यों नहीं दे पाये, जैसा केंद्रीय नेतृत्व को अपेक्षित था? भाजपा को जाटलैंड में ही सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा। वह भी तब, जब जाटों के सबसे बड़े नेता रहे चौधरी चरण सिंह को मरणोंपरांत भारत रत्न से सम्मानित करके उनके पोते जयंत चौधरी की पार्टी राष्ट्रीय लोक दल से गठबंधन किया गया था।
पहले चरण से खराब हुआ माहौल आखिरी चरण तक जारी रहा। दरअसल, भाजपा ने भूपेंद्र चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर जाट के साथ पिछड़ों को भी साधने की रणनीति तैयार की थी, लेकिन भूपेंद्र चौधरी शीर्ष नेतृत्व की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। उन्होंने प्रदेश भर के भाजपा कार्यकर्ताओं का अध्यक्ष बनने के बजाय अपनी पूरी ऊर्जा पश्चिमी यूपी के बड़े जाट नेता बनने में खपा दी, जिसमें संजीव बालियान की महत्वाकांक्षा का भी बड़ा रोल रहा। भाजपा ने भी अपनी रणनीति का फोकस हिंदुत्व के बजाय जातीय समीकरण पर कर दिया, जिसने हिंदू वोटरों को जातियों में बांट दिया।
केंद्रीय नेतृत्व को जब इस बात का एहसास हुआ कि भूपेंद्र चौधरी को अध्यक्ष बनाने के बावजूद जाट भाजपा के साथ नहीं है, तब तक देर हो चुकी थी। भाजपा ने अपनी गलती दुरुस्त करने के लिये जयंत चौधरी को भी साथ जोड़ा, लेकिन यह गठबंधन भी फलदायी साबित नहीं हुआ। इस चुनाव से जाटलैंड का नैरेटिव भी ध्वस्त हो गया। पश्चिमी यूपी में जाटों के अलावा सैनी, गुर्जर, क्षत्रिय, दलित, ब्राह्मण, त्यागी भी हैं, जो रिजल्ट प्रभावित करते हैं, लेकिन लगातार जाटों को महत्व देने से अन्य जातियां भाजपा से छिटक गईं। बीते विधानसभा चुनाव में कई सांसदों ने विभिन्न कारणों से अपने क्षेत्र के कई विधायकों को जानबूझकर हराने की साजिश रची। प्रदेश संगठन को इसकी जानकारी थी, लेकिन इस मामले में कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हुई, जिसका नतीजा लोकसभा चुनाव में भी दिखा।
इस बार कई विधायक अपने सांसदों को हराने को तैयार बैठे थे, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष ने स्वयं इस मामले को सुलझाने के बजाय सब कुछ केंद्रीय नेतृत्व के जिम्मे छोड़ दिया। समय रहते ऐसे मामलों को सुलझा लिया गया होता या केंद्रीय नेतृत्व को इसकी सही जानकारी दी गई होती तो नतीजा बेहतर हो सकता था। दूसरे, कई सांसदों के खिलाफ जनता में बेहद नाराजगी थी, लेकिन प्रत्याशी चयन करते समय इसका ध्यान नहीं रखा गया। कम से कम दो दर्जन सीटों पर जनता उम्मीद कर रही थी कि भाजपा प्रत्याशी बदल देगी, लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा। उन्हीं प्रत्याशियों को रिपीट कर दिया गया। राज्य स्तर पर हुए कई सर्वे में इस बात का खुलासा हुआ था कि कई मौजूदा सांसद हार जायेंगे, लेकिन प्रदेश ईकाई ने इसकी रिपोर्ट केंद्रीय नेतृत्व को नहीं दी।
बीते दो लोकसभा चुनावों में रणनीतिक बिसात बिछाने वाले अमित शाह को भी प्रदेश नेतृत्व ने प्रत्याशियों की छवि को लेकर अंधेरे में रखा। मुजफ्फरनगर सांसद संजीव बालियान, कैराना से प्रदीप चौधरी, एटा से राजवीर सिंह, बुलंदशहर से भोला सिंह, अलीगढ़ से सतीश गौतम, इटावा से डा. राम शंकर कठेरिया, कौशांबी से विनोद सोनकर, प्रतापगढ़ से संगमलाल गुप्ता, मोहनलालगंज से कौशल किशोर, मछलीशहर से बीपी सरोज, चंदौली से डा. महेंद्रनाथ पांडेय, बस्ती से हरीश द्विवेदी, लालगंज से नीलम सोनकर, फैजाबाद से लल्लू सिंह, अमेठी से स्मृति ईरानी, कन्नौज से सुब्रत पाठक जैसे सांसदों से मतदाता नाराज था, लेकिन शीर्ष नेतृत्व को इस बात की रिपोर्ट नहीं दी गई।
गलत प्रत्याशी चयन के बाद चुनाव प्रचार के दौरान ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हटाने का नैरेटिव बनाया जाने लगा। यह संदेश नीचे तक गया कि चुनाव में बड़ी जीत मिलते ही योगी आदित्यनाथ को हटा दिया जायेगा। इस अफवाह का किसी बड़े नेता ने एक बार भी खंडन नहीं किया। इसने कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़कर पार्टी का सबसे बड़ा नुकसान किया। कई राष्ट्रीय पदाधिकारी पूरी ऊर्जा के साथ यह संदेश अपने लोगों तक पहुंचाने में जुटे रहे कि पर्याप्त सीटें आते ही योगी को हटा दिया जायेगा, जिसने फायरबैक कर दिया। इसमें एक राष्ट्रीय महामंत्री तो योगी आदित्यनाथ के रहमोकरम पर ही पहली बार विधायक बने थे।
दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने लखनऊ में अखिलेश यादव के साथ प्रेस कांफ्रेंस करते हुए आरोप लगाया कि मोदी यह चुनाव अमित शाह को पीएम बनाने के लिये लड़ रहे हैं, और मोदी सरकार फिर से बनते ही योगी आदित्यनाथ को सीएम की कुर्सी से हटा दिया जायेगा। अमित शाह के पीएम बनने के आरोप का तो भाजपा ने जमकर खंडन किया, लेकिन योगी वाले मामले पर चुप्पी साध ली गई। इससे अफवाह को और अधिक बल मिला। कोर हिंदू जातियां निष्क्रिय हो गईं। सातवें चरण से पहले जेपी नड्डा ने एक इंटरव्यू में इसे अफवाह बताया तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
90 दशक के बाद पहली बार भाजपा का कोर वोटर भी उससे दूर छिटका है। कुर्मी, कुशवाहा, मौर्य, ब्राह्मण जैसी जातियां तो अतीत में सपा और बसपा के साथ साझीदार रही हैं, लेकिन लोध, सैनी, क्षत्रिय, पासी, वाल्मिकी भाजपा का कोर वोटर रहा है। इस बार भाजपा के कोर वोटर का बड़ा हिस्सा भी उससे दूर हो गया। लोधी वोटर कल्याण सिंह के भाजपा से अलग होने के बावजूद बड़ी संख्या में भाजपा से जुड़ा रहा, लेकिन इस बार उसका ठीक ठाक हिस्सा इंडी गठबंधन को गया। सबसे बड़ी बात यह रही कि अनुप्रिया पटेल, ओम प्रकाश राजभर एवं संजय निषाद के भाजपा गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद इन जातियों का वोट भाजपा से ज्यादा सपा-कांग्रेस गठबंधन को गया। भाजपा में भी स्वतंत्रदेव सिंह जैसा कुर्मी नेता तथा अनुप्रिया पटेल से गठबंधन के बावजूद कुर्मी वोटर भाजपा को छोड़कर अपनी जाति के प्रत्याशियों की ओर गया।
पूर्वांचल की कई सीटों पर प्रभाव होने का दावा करने वाले ओम प्रकाश राजभर की वापसी भी भाजपा के लिये मुफीद साबित नहीं हुई। सुभासपा से गठबंधन भाजपा के लिये बोझ साबित हुआ। घोसी से राजभर के पुत्र अरविंद राजभर चुनाव हार गये। यही हाल संजय निषाद का भी रहा। उनके पुत्र को भी निषाद बाहुल्य सीट पर हार का सामना करना पड़ा। मतदाताओं को भाजपा का अहंकार कि जिसे चाहेंगे, जिता देंगे, जिससे चाहेंगे गठबंधन करेंगे, रास नहीं आया। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य अपनी जाति का वोट भाजपा को नहीं दिलवा पाये। कौशांबी, जौनपुर, चंदौली, गाजीपुर जैसी सीटों पर प्रभावी कोयरी-कुशवाहा वोट भी सपा-कांग्रेस को चला गया। खुद बनारस सीट पर कुर्मी और कोयरी वोट नरेंद्र मोदी के बजाय अजय राय को मिले, जिसने जीत के अंतर को घटा दिया।
रही सही कसर भाजपा नेताओं के संविधान बदल देने के बड़बोलेपन से पूरी हो गई। फैजाबाद सांसद लल्लू सिंह समेत कई भाजपा नेताओं ने चार सौ सीट आने पर संविधान बदलने की बात कही, जिससे दलित मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा डर के चलते इंडी गठबंधन की ओर चला गया। सीएसडीएस के आंकड़ों को देखें तो 92 फीसदी मुसलमान एवं 82 फीसदी यादव वोटर गठबंधन के साथ रहे। 56 फीसदी गैर-जाटव दलित तो सपा-कांग्रेस के साथ गये ही, 25 फीसदी जाटव मतदाताओं ने भी इंडिया गठबंधन को वोट किया। वो भी केवल इसलिये कि उसे संविधान बदले जाने का खतरा महसूस हो रहा था। भाजपा का मीडिया सेल संविधान बदले जाने के नरेटिव का तोड़ नहीं ढूंढ पाया, जिसका भाजपा को भारी नुकसान हुआ।
2019 के आंकड़ों को देखें तो उस चुनाव में भाजपा को गैर जाटव दलितों का 48 फीसदी वोट मिला, जो इस चुनाव में सिमटकर 29 फीसदी पर पहुंच गया। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को 41 फीसदी गैर-जाटव वोट तथा 21 फीसदी जाटव वोट मिले थे। भाजपा के लिये अब भी समय है कि जातीय रणनीति तैयार करने के बजाय अपने हिंदुत्व के एजेंडे पर लौट आये। भाजपा ने सपा की तरह जातीय राजनीति पर फोकस किया तो उसे भविष्य में इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है, क्योंकि भाजपा कैडर की पार्टी है, किसी एक परिवार की नहीं। भाजपा को यह भी ध्यान रखना होगा कि नई जातियों को महत्व देने के प्रयास में वह अपने कोर वोटरों से हाथ ना धो बैठे।












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