Madrassas in Assam: मदरसों के खिलाफ क्यों हैं योगी और हिमंत विश्व शर्मा
मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने अब सभी मदरसों को बंद करने की मंशा जताई है। असम की तरह उत्तर प्रदेश में भी बिना रजिस्ट्रेशन चलाए जा रहे मदरसों की शिनाख्त की गई है।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने देश में नई बहस शुरू कर दी है। कर्नाटक में अपने चुनावी दौरे के दौरान उन्होंने कहा कि असम में उन्होंने 600 मदरसे बंद कर दिए हैं, लेकिन उनकी मंशा सारे मदरसे बंद करने की है। असम में पहले जो अभियान चलाया गया था, वह सिर्फ उन मदरसों के खिलाफ था, जिन्होंने किसी तरह की मान्यता प्राप्त नहीं की थी, या जहां अवैध गतिविधियाँ चलने की खबरें आई थीं। बहुत सारी खबरें तो बच्चों के यौन शोषण की ही आ रहीं थीं। मदरसों में पोक्सो क़ानून का उल्लंघन हो रहा था। इस वजह से भी हिमंत विश्व शर्मा और योगी आदित्यनाथ ने मदरसों का सफाई अभियान शुरू किया है।
असम की तरह उत्तर प्रदेश में भी बिना रजिस्ट्रेशन चलाए जा रहे मदरसों की शिनाख्त की गई है। हिमंत विश्व शर्मा ने अब सभी मदरसों को बंद करने की मंशा जताई है, जिससे मुस्लिम समाज में आक्रोश बढ़ गया है। हालांकि चुनावी मौसम में उनके बयान को सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है। माना जा रहा है कि हिमंत विश्व शर्मा ने कर्नाटक के चुनावों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए यह बात कही है।
लेकिन शर्मा का तर्क यह है कि मदरसों में आधुनिक शिक्षा नहीं दी जा रही, जिस कारण मुस्लिम बच्चे पढाई में पिछड़ रहे हैं। यह काफी हद तक सच है, मदरसों में पढ़ने वाले छात्र अंगरेजी, गणित, साईंस, सोशल साईंस में अक्सर कमजोर ही होते हैं। भारत में 48 प्रतिशत छात्र बारहवीं से आगे पढाई नहीं कर पाते, और इनमें से ज्यादातर मदरसों में पढ़ने वाले मुस्लिम विद्यार्थी हैं, इनमें भी लड़कियों की संख्या सर्वाधिक है।
अब सवाल खड़ा होता है कि हिमंत विश्व शर्मा का बयान या उनकी मंशा संविधान सम्मत है या नहीं। तो इसका उत्तर यह है कि उनकी यह मंशा संविधान सम्मत नहीं है, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद में देश के धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान चलाने की इजाजत है और यह उनका अधिकार भी है। संविधान के अनुच्छेद 13 में अल्पसंख्यक समुदायों को संरक्षण दिया गया है कि कोई भी क़ानून उनके अधिकारों का हनन करने वाला नहीं बन सकता, शिक्षण संस्थान चलाना उनका मौलिक अधिकार है।

टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2002) के मामले में सुप्रीमकोर्ट की 11 जजों की पीठ ने फैसला दिया था कि अल्पसंख्यक का निर्धारण आबादी के हिसाब से राज्य स्तर पर किया जाएगा, न कि राष्ट्रीय स्तर पर। एस पी मित्तल बनाम भारत संघ के एक फैसले में सुप्रीमकोर्ट ने कहा था कि अनुच्छेद 30(1) के अंतर्गत शिक्ष्ण संस्थान स्थापित करने के लिए समुदाय को दो शर्तें पूरी करनी होंगी। पहली यह वह धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक है, दूसरी यह कि संस्थान की स्थापना समुदाय की ओर से की गई है।
इस हिसाब से उन राज्यों में मदरसे या ईसाईयों के शिक्षण संस्थान नहीं चल सकते, जहां वे बहुसंख्यक हैं, जैसे जम्मू कश्मीर में मदरसे नहीं चल सकते, लेकिन चल रहे हैं। पंजाब में सिख संस्थाएं धार्मिक आधार पर अलग शिक्षण संस्थान नहीं खोल सकतीं, लेकिन खुले हुए हैं। नगालैंड में ईसाई धार्मिक आधार पर अपने अलग शिक्षण संस्थान नहीं खोल सकते, लेकिन खुले हुए हैं।
अब दूसरी शर्त की बात करें, जिसमें सुप्रीमकोर्ट ने साफ़ कहा है कि समुदाय को शिक्षण संस्थान खोलने का अधिकार है, न कि व्यक्ति को। जबकि देश भर में कई जगहों पर मुसलमानों और ईसाईयों ने खुद को अल्पसंख्यक बता कर मदरसे और हाई-फाई शिक्षण संस्थान खोल लिए हैं। जिनमें धार्मिक शिक्षा भी दी जा रही है।
इन हाई-फाई शिक्षण संस्थाओं में गैर अल्पसंख्यक छात्रों की तादाद भी ज्यादा है। हाई-फाई ईसाई स्कूलों में हिन्दू धर्म के खिलाफ कही जाने वाली बातों पर देश भर में कई बार कई जगहों पर बवाल भी हो चुका है। जबकि पी.ए. ईनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2005) के फैसले में सुप्रीमकोर्ट ने कहा था कि ऐसे शिक्षण संस्थान अनुच्छेद 30 (1) में मिले अधिकार से वंचित हो जाएंगे, जिनमें अन्य समुदाय के छात्रों की तादाद ज्यादा होगी।
इन सब बातों से भी महत्वपूर्ण बात यह है कि संविधान के अनुच्छेद 30(1) में धार्मिक अल्पसंख्यकों और भाषाई अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्थान खोलने की इजाजत दी गई है, न कि धार्मिक शिक्षा देने और दूसरे धर्म के खिलाफ विषवमन करने की। जबकि देशभर में फैले लाखों मदरसों में तथाकथित धार्मिक शिक्षा के नाम ऐसी ऐसी हदीसें पढाई जाती हैं, जिनमें बच्चों के कोमल मन में दूसरे धर्म के प्रति नफरत पैदा होती है। संविधान ऐसे शिक्षण संस्थानों की कतई इजाजत नहीं देता, जिनमें धार्मिक विद्वेष की शिक्षा दी जाती हो। इन सब मापदंडों पर कोई भी मदरसा खरा नहीं उतरता।
पूर्ववर्ती सरकारों ने शुरू से ही मदरसों में धार्मिक शिक्षा के नाम पर परोसी जा रही नफरत पर रोक लगाई होती, तो आज यह स्थिति पैदा नहीं होती, जैसी 2020 में नागरिकता संशोधन क़ानून के खिलाफ जामिया मिलिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पैदा हुई थी। मदरसे तो छोडिए मुस्लिम उच्च शिक्षण संस्थान भी नफरत के केंद्र बन चुके हैं, जिनमें समाज विरोधियों और देश विरोधियों को पनाह मिल रही है।
असम में भी मदरसों के खिलाफ तब कार्रवाई शुरू हुई, जब आतंकवादियों को मदरसों में पनाह मिलने की खबरें आईं और उसकी पुष्टि भी हुई। पाक प्रायोजित आतंकवाद के दौर में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में आतंकवादी पकड़े गए थे। 1990 के दशक में जम्मू कश्मीर में आतंकवाद की शुरुआत में आतंकवादी हजरतबल दरगाह और चरार-ए-शरीफ में छिपते थे और सुरक्षा बलों से उनकी झड़पें होती थीं। यह सिलसिला अभी थमा नहीं है। हाल में हुई कुछ मुठभेड़ों, खासकर दक्षिण कश्मीर में सुरक्षा बलों की कार्रवाइयों के विश्लेषण से पता चला कि पाकिस्तान प्रायोजित दहशतगर्द पनाह लेने के लिए फिर से मस्जिदों और मदरसों का इस्तेमाल कर रहे हैं। पिछले कुछ सप्ताह में कुलगाम, नैना बटपोरा और चेवा कलां में हुई तीन मुठभेड़ों में यही बात देखने को मिली है।
सिर्फ आतंकवादी ही नहीं बल्कि मुस्लिम शिक्षण संस्थान अपराधियों के भी शरणस्थल बने हुए हैं। अभी हाल ही में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के 131 साल पुराने मुस्लिम हॉस्टल के कमरा नम्बर 36 से माफिया अतीक अहमद का गुर्गा सदाकत पकड़ा गया, जो 24 फरवरी को हुई उमेश पाल की हत्या में शामिल था। सदाकत की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी, इसके बावजूद वह हॉस्टल में गलत तरीके से रह रहा था। इसलिए मदरसों व अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को संविधान के मुताबिक ही चलाया जाए तो उनका विरोध कम होगा और उन्हें बंद करने की मांग भी नहीं उठेगी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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