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Sex Education: किशोर नौजवानों को यौन शिक्षा पर शर्म कैसी?

Sex Education: कहते हैं फिल्में समाज का आइना होती है जो समाज के विषयों को अपने तरीके से उठाती हैं। ओएमजी-2 एक ऐसी ही फिल्म हैं जिसमें एक वर्जित विषय उठाया गया है। यह वर्जित विषय है किसी किशोर नौजवान के मन में यौन इच्छाओं को लेकर उठने वाले सवाल। भारत में यौन शिक्षा एक टैबू की तरह है। जहाँ तरुणाई पर बात ना की जा सके वहाँ यौन शिक्षा तो हौव्वा ही होगा। परंतु इस "असहज विषय" पर चुप्पी इसके अस्तित्व और प्रभाव को कम नहीं करती है। हम चाहे या ना चाहे किशोरों में हॉर्मोनल बदलाव के कारण यौन उत्कंठा स्वभाविक है जिनसे जुड़े प्रश्नों का समाधान हम उन्हें नहीं देंगे तो इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री से "गैर-जरूरी पर गलत और कुप्रभावी जानकारियां" उन्हें गलत दिशा ही देंगी।

जिस विषय पर किशोरों से बात करने में भी हम हिचकिचाते हैं, उससे जुड़ी सच्चाई यह है कि इस इंटरनेट युग में भारत में आज 13 वर्ष की उम्र के आधे बच्चे पोर्न देख चुके होते हैं। एक एनजीओ कॉमन सेंस मीडिया द्वारा किए गए जनवरी 2023 में जारी सर्वेक्षण रिपोर्ट में बताया गया था कि 50 प्रतिशत से अधिक किशोर 13 साल की उम्र तक पोर्न के संपर्क में आ चुके हैं। "किशोर और पोर्नोग्राफी" शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में अगर हम वास्तव में सच्चाई जानना चाहें तो कई बातें आंख खोलनेवाली हैं।

Why are teenagers ashamed of sex education?

इस रिपोर्ट में से 58% बच्चों ने माना कि उन्होंने गलती से पोर्न देख लिया और वे वास्तव में इंटरनेट पर ऐसी सामग्री देखने की कोशिश नहीं कर रहे थे। 44% किशोरों ने खुलासा किया कि उन्होंने जानबूझकर ऑनलाइन पोर्नोग्राफ़ी देखी थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कई किशोरों को ऑनलाइन मल्टीप्लेयर गेम खेलने के दौरान बने दोस्तों ने पोर्नोग्राफी से परिचित कराया था।

जानबूझकर पोर्न देखने वालों में से 38% प्रतिभागियों ने इसे इंस्टाग्राम और टिकटॉक जैसी सोशल मीडिया साइटों पर देखा। भले ही टिकटॉक भारत में प्रतिबंधित है, पर यह दुनिया भर में उपलब्ध है और बैन साइट को विजिट करना कोई रॉकेट साइंस भी नहीं है। इनमें से 44% प्रतिभागियों ने वास्तविक वेबसाइटों पर पोर्नोग्राफ़ी देखी जबकि 34% ने यूट्यूब जैसी स्ट्रीमिंग सेवाओं का उपयोग किया। इसके अलावा, सर्वेक्षण से पता चलता है कि 16% किशोरों ने ऐसी साइटों का उपयोग किया जहाँ मेंबर बनने के बाद पोर्न देखना उपलब्ध होता है और 18% ने ऑनलाइन पोर्न लाइव स्ट्रीम किया।

13 साल के बच्चे जो पोर्न साइट्स विजिट कर रहे हैं उन्होंने क्या देखा समझा होगा? पक्के तौर पर कुछ सही तो नहीं ही समझा होगा। मन में यौन सम्बन्ध बनाने की उत्कंठा हुई होगी और इस चाह को पूरी करने के लिए या तो गलत तरीकों का सहारा लिया होगा या यौन अपराधों में लिप्त होने की ओर मन भागा होगा। जब धरातल की स्थिति यह है तो उन्हें सही गाइड क्यों ना किया जाए?

यौन इच्छा को शांत करने के लिए जिस मास्टरबेशन को आधार बनाकर OMG 2 फिल्म बनाई गई है समाज के रूप में हमने इसे कुकर्म की संज्ञा दी है। जबकि हकीकत यही है कि इससे अछूता लगभग कोई नहीं है और इससे जुड़ा "गिल्ट फील" किशोरों का भविष्य खराब करता है।

भारत के टॉप सेक्सोलॉजिस्ट रंजन भोंसले के अनुसार मास्टरबेशन एक सामान्य और हानिरहित क्रिया है। अधिकांश लड़के किशोरावस्था के दौरान अक्सर इसका अभ्यास करते हैं। इसका स्वास्थ्य (शरीर), प्रजनन क्षमता या कामुकता पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है। हालाँकि इससे जुड़ा 'अपराधबोध' किसी के भावनात्मक स्वास्थ्य और आत्मसम्मान के लिए हानिकारक हो सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी छात्र में इसकी चाहत इतनी बढ़ जाती है कि वह छात्र अपनी पढ़ाई/कैरियर से ध्यान हटा देता है या लोगों से मिलना-जुलना बंद कर देता है तो वह कैरियर के अवसरों को खो सकता है और सामाजिक रूप से अलग-थलग भी हो सकता है। इससे उसके जीवन में और समस्याएं पैदा हो सकती हैं। किसी भी गतिविधि की अधिकता एक लत बन सकती है, जिससे जीवन के किसी भी क्षेत्र में प्रगति में मनोवैज्ञानिक बाधाएँ पैदा हो सकती हैं। यहीं पर सेक्स एजुकेशन की जरूरत आती है जहाँ बताना होता है इसकी असमय चाहत को रोका कैसे जा सकता है।

हम सेक्स एजुकेशन का सामान्य पर बेढ़ब अर्थ यह निकाल लेते हैं कि इसकी प्रक्रिया के बारे में बताना सेक्स एजुकेशन है, जबकि हकीकत बहुत अलग और व्यापक है। बच्चों को रिप्रोडक्टिव सिस्टम पढ़ाना भी यौन शिक्षा है। बच्चियों को मासिक धर्म के बारे में बताना भी यौनशिक्षा का हिस्सा है। इंडियन नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के ताजा आंकड़े ये बताते हैं कि भारत में लोग कच्ची उम्र में यौन संबंध बना रहे हैं। 39 प्रतिशत से ज्यादा भारतीय महिलाओं ने 18 साल की उम्र से पहले यौन संबंध बनाए हैं। क्या यहाँ यौन रोगों, निरोधों और यौन प्रक्रियाओं से जुड़ी भ्रांतियों के बारे में किशोरियों को ज्ञान देना समाज परिवार का कर्तव्य नहीं बनता है?

बढ़ती उम्र के साथ किशोर वर्ग में अनेक शारीरिक बदलाव आते हैं। लड़कियों में जहां वक्ष बनने समय इसे दबाने पर दर्द की भीषण अनुभूति होती है वहां मासिक चक्र भावनात्मक बदलाव लाता है। उस समय उनके कोमल मन को कुछ पता नहीं होता कि उनके शरीर में अचानक आनेवाले ये शारीरिक और मानसिक बदलाव आगे क्या आकार लेंगे। इसलिए किशोर मन में भावनात्मक उद्वेलन बहुत तीव्र होता है। हर किशोर या किशोरी के शरीर में जब बचपन जा रहा होता है और जवानी आ रही होती है तो न केवल शरीर बल्कि मन में भी भीषण उथल पुथल होती है। अक्यर ये बदलाव उसके लिए शर्म के विषय बन जाते हैं। वह इन बदलावों को लेकर अपने आप को दूसरों से छिपाता है।

लेकिन जननांगों का आकार प्रकार, ब्रेस्ट साइज, दाढ़ी- मूँछ ये सब ना तो गर्व के विषय हैं ना शर्म के। ये शरीर में समय के साथ आनेवाले सामान्य बदलाव है जिसको सही शिक्षा देकर उसका भविष्य सुनिश्चित किया जा सकता है। वर्तमान किशोर वर्ग ना सिर्फ भावी पीढी के जनक होते हैं बल्कि सभ्य और उन्नत समाज भी नींव होते हैं। इन्हें सही और दुरुस्त जानकारी से देना हमारा धर्म है। अत: किशोर नौजवानों में यौन शिक्षा को शर्म की दृष्टि से देखने के बजाय इसे शिक्षा की दृष्टि से देखने की जरूरत है। उनके सवालों पर चुप कराने की बजाय ममता और प्यार से उनके सवालों का जवाब देने की जरूरत है तभी करोड़ों किशोर गलत रास्ते पर जाने से बच सकेंगे और उनका भविष्य उज्ज्वल बन सकेगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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