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Guru Granth in Sindhi Temples: सिन्धी मंदिरों से गुरुग्रंथ क्यों हटवा रहे हैं सिख निहंग?

मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में पिछले हफ्ते सर्वधर्म समभाव को नकारते हुए सिख निहंगों ने सिंधी मंदिरों से गुरुग्रंथ और नानक नाम निशान हटा दिया। निहंगों ने कहा कि मंदिर में गुरुग्रंथ रखने से उनके ग्रंथ की बेअदबी हो रही है।

Guru Granth in Sindhi Temple

इंदौर में सिन्धियों की बड़ी जनसंख्या रहती है जो बंटवारे के बाद सिन्ध के इलाके से पलायन करके भारत आये थे। आज इनकी जनसंख्या करीब 2.5 लाख है और इस समय भाजपा के टिकट पर जो सांसद शंकर लालवानी हैं वो भी सिन्धी समुदाय से ही आते हैं। भारत में लगभग 20 लाख सिन्धी हैं जिसमें अधिकांश गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और दिल्ली में बसे हुए हैं। इन तीन राज्यों के अलावा मध्य प्रदेश का इंदौर शहर ही ऐसा है जहां इतनी बड़ी संख्या में सिन्धी रहते हैं जहां निहंग सिखों ने उनके मंदिरों से गुरुग्रंथ को बाहर निकालने पर मजबूर कर दिया।

भारत की धार्मिक व्यवस्था ऐसी है कि उसे किसी खास नाम की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन जब से भारत के लोगों की पहचान हिन्दू के रूप में की जाने लगी तब से अलग अलग धर्म के रूप में पहचान की कोशिश भी बढ़ी है। उन्नीसवीं सदी तक सिक्ख कोई अलग धर्म नहीं था। यह भारत की धार्मिक व्यवस्था का ही एक स्वतंत्र हिस्सा था जैसे दूसरे दर्जनों हिस्से हैं जिन्हें संप्रदाय कहा जाता है। सिन्धी भी अपनी मान्यताओं के साथ एक अलग संप्रदाय के रूप में मौजूद थे। लेकिन जब अंग्रेजों ने धर्म के नाम पर पहचान करना शुरु किया तब सिन्धियों ने भी अपने आप को हिन्दू के रूप में परिभाषित किया।

ऐसा करते हुए भी सिन्धी समाज ने अपनी मान्यताओं को अपने साथ जोड़कर रखा। जैसे वो वरुण यानि समुद्र को अपना देवता मानते हैं और झूलेलाल के रूप में उनकी पूजा करते हैं। सिन्ध के शहर कराची में समुद्र के किनारे वरुण देव का विशाल मंदिर आज भी उपेक्षित रूप में मौजूद है। जिन सिन्धियों ने बंटवारे के समय सिन्ध को छोड़ा वो भले ही भारत आ गये लेकिन उनकी स्थानीय मान्यताएं, परंपराएं, बोली भाषा, संस्कृति सब कुछ अपने साथ धारण करके रखा।

उनकी मान्यताओं में ही एक मान्यता है मंदिर में गुरुग्रंथ को एक देवता की तरह विराजमान करके रखना। सिन्धियों में एक छोटी जनसंख्या है जो औपचारिक रूप से सिक्ख भी हो चुकी है। क्योंकि उन्नीसवीं सदी तक न तो नानक पंथ के लोग अलग धर्म होने का दावा करते थे और न किसी दूसरे को वह अलग धर्म लगता था, इसलिए सिक्ख हमसें अलग हैं, ऐसा कोई सोच विचार भी नहीं था। उन्नीसवीं सदी तक बहुत से हिन्दू परिवारों में परिवार का सबसे बड़ा बेटा धर्मयोद्धा बनाया जाता था। यानी, उसे सिख धर्म में भेज दिया जाता था।

गुरु गोविन्द सिंह ने जिन पंज प्यारों को केश, कड़ा, कंघा, कच्छा और कृपाण देकर धर्म के लिए लड़ने वाला योद्धा नियुक्त किया था वो सब भी तो हिन्दू धर्म की अलग अलग जातियों के ही लोग थे। पंज प्यारों में एक खत्री थे, एक जाट थे, एक धोबी थे, एक नाईं थे और एक कुम्हार थे। इन लोगों ने अपने आपको गुरु गोविन्द सिंह के सामने कोई नया धर्म बनाने के लिए प्रस्तुत नहीं किया था। वो धर्म रक्षा के लिए गुरु गोविन्द सिंह के साथ अपने प्राणों का मोह त्यागकर गये थे।

इसलिए सिक्ख अलग हैं और हिन्दू अलग ऐसा विचार कभी भारतीय समाज में था ही नहीं। सिन्धी समाज के वरिष्ठ लोग बताते हैं कि पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के पास लालवानी परिवार मिलने गया था। महाराजा रणजीत सिंह ने उन्हें हस्तलिखित गुरुग्रंथ दिया था जिसे वो हाथी पर सजाकर सिन्ध लाये थे। संभवत: तभी से नानकशाही के गुरुग्रंथ को सिन्धियों ने अपने मंदिर में भगवान के साथ रखना शुरु किया। उनके लिए नानक वैसे ही आदरणीय संत हैं जैसे उनके अपने संत।

स्वंय बाबा नानक सिन्ध के शिकारपुर जाकर वहां लोगों से धर्म चर्चा कर चुके थे। बाबा नानक के बेटे और उदासीन संप्रदाय के संस्थापक बाबा श्रीचंद का सिन्ध में व्यापक प्रभाव हुआ। वो बार बार वहां धर्म की शिक्षा देने के लिए जाते थे। सख्खर का साधबेलो आश्रम उदासीन परंपरा का बड़ा केन्द्र बना जो आज भी विद्यमान है। इसलिए नानकशाही और सिन्धी कभी बहुत दूर नहीं रहे। उनके लिए गुरुग्रंथ और गीता में कोई अंतर नहीं था।

लेकिन बीते 18 दिसंबर को इंदौर में अमृतसर से आये निहंगों ने सिन्धियों के मंदिर में जाकर गुरुग्रंथ की बेअदबी का मुद्दा उछाल दिया। इंदौर के सिन्धी मंदिरों में जहां वो गये उन्होंने कहा कि उनके गुरुग्रंथ साहिब का जैसा आदर होना चाहिए वैसा नहीं हो रहा। इस पर सिन्धियों ने कहा कि आप जैसा कहेंगे, वैसा हम कर देंगे। लेकिन इस पर भी वो तैयार नहीं हुए।

फिर उन निहंगों ने कहा कि ये पत्थर यहां क्यों रखें हैं? उन निहंगों का इशारा उन मूर्तियों की ओर था जो मंदिर में विराजमान थीं। निहंगों की आपत्ति थी कि 'पत्थरों' के साथ गुरुग्रंथ को रखना गुरुग्रंथ के साथ बेअदबी है। कुछ एक सिन्धी मंदिर में तो उन्होंने अपने हाथ से भगवान की मूर्तियों को हटाना शुरु कर दिया। इस पर सिन्धी समाज ने तय किया कि अगर इतनी दिक्कत है तो हम मंदिर से गुरुग्रंथ ही हटा देते हैं।

इसी के बाद करीब 70 सिन्धी मंदिरों से गुरुग्रंथ को निकालकर पूरे सम्मान के साथ 12 जनवरी को इमली साहब गुरुद्वारा भेज दिया गया। यह बात पूरे सिन्धी समाज में जहां जहां फैल रही है वो भी अपने मंदिरों से गुरुग्रंथ को निकालकर किसी गुरुद्वारे को सौंपने की तैयारी कर रहे हैं। इसके पीछे मुख्य वजह किसी विवाद से बचना है। वो नहीं चाहते कि निहंग सिख आकर उनके मंदिरों में उत्पात करें या उनके साथ कोई झगड़ा हो।

लेकिन यहां मामला सिन्धी समाज का नहीं है। पाकिस्तान में आज भी ऐसे गुरुद्वारे हैं जहां सिन्धी देवी देवता रखे हुए हैं। या फिर सिन्धी मंदिरों में गुरुग्रंथ साहब रखा हुआ है। मामला तो उस सिख समुदाय का जो है भारतीय समाज से हर प्रकार से अपना रिश्ता इसलिए काट लेना चाहता है क्योंकि उसे अलग धर्म के रूप में स्थापित होना है। वह भी ऐसा धर्म जो भारतीय धर्म के करीब न होकर अब्राहमिक रिलीजन के ज्यादा करीब नजर आता है।

सिन्धी मंदिरों से गुरुग्रंथ निकालने का सीधा असर सिख-सिन्धी रिश्तों पर पड़ेगा। सिन्धी समाज के लिए नानक कोई पराये नहीं हैं और गुरुग्रंथ भी उनका अपना ग्रंथ है। लेकिन जिस तरह से इंदौर में निहंगों ने एक ओर हो जाने की चेतावनी दी वो सिक्ख धर्म के कथित शुद्धतावाद के नाम पर सामाजिक संबंधों को ही काट रहे हैं।

ऐसी घटना 1905-06 में भी हो चुकी है जब अमृतसर के हरि मंदिर (स्वर्ण मंदिर) से पूजा की मूर्तियों को हटा दिया गया था। उसके पहले तक हरि मंदिर में मूर्तियां भी रखी जाती थीं, और वहां गुरुग्रंथ के पाठ के साथ साथ पूजा आरती भी होती थी। उस समय तक देवी देवता अलग हैं और गुरुग्रंथ अलग है इसकी कोई मुहिम नहीं चली थी। लेकिन जट्ट सिखों की अगुवाई में सिक्ख धर्म को अलग धर्म के तौर पर स्थापित करने की जो मुहिम शुरु हुई वही मुहिम आज यहां तक पहुंची है कि सिन्धी मंदिरों से गुरुग्रंथ भी हटाये जा रहे हैं।

दुर्भाग्य से इन सिखों को सामंजस्य की बजाय अलगाव चाहिए जो अंतत: सिख संगत के लिए घाटे का सौदा साबित होगा। सिक्खों को अलग धर्म की मुहिम चलाने वाले आर्थर मैक्लिफ के अलगाववादी रास्ते पर चलकर न तो सिक्ख धर्म का भला होगा और न भारत का। सिक्ख समाज भले ही हरि मंदिर वाले मामले में चुप रहा हो लेकिन सिन्धी मंदिरों से गुरुग्रंथ हटाने या भगवान को पत्थर बताकर उनके साथ न रखने की आपत्तिजनक वारदातों पर जरूर ध्यान देना चाहिए। वरना कहीं ऐसा न हो कि इससे जो सामाजिक नुकसान हो उसकी भरपाई करने में सिख समाज को बहुत देर हो जाए।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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