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Cruel Mothers: कुमाता क्यों बन रही है माताएं?

Cruel Mothers: कई बार इंसानी फितरत की टोह ईश्वर भी नहीं ले पाता होगा। लखनऊ के मलिहाबाद क्षेत्र से एक ऐसी घटना सामने आयी है जो मानवता के साथ-साथ ममता को भी शर्मसार करती है।

सामूहिक बलात्कार के मामले में एक मौलवी को गिरफ्तार किया गया है और मामले में बच्ची की मां की मिलीभगत और सहमति सबको सकते में डाल रही है। 8 वर्षीय पीड़िता के पिता खाड़ी देश में काम करते हैं और पिछले लगभग 8 महीनों से देश के बाहर थे। इस बीच पीड़िता की मां के नाजायज संबंध मौलवी आबदीन से बन गए।

why are mothers becoming cruel

ताज्जुब की बात है पीड़िता के पिता इसी मौलवी की देख-रेख में अपने परिवार को छोड़ दूर देश कमाने गए थे। 8 महीने बाद घर आने पर बच्ची ने अपने साथ हुए सामूहिक बलात्कार की बात अपने पिता को बतायी और पिता की ही शिकायत पर मो. आबदीन और उसकी मां की गिरफ्तारी हुई है। बलात्कार का एक और आरोपी आबदीन का भाई अरशद फरार है। बच्ची के अनुसार दोनों ने उसके साथ बलात्कार किया और ये सब उसकी मां की जानकारी और सहमति से हुआ।

पुलिस उपायुक्त (पश्चिम) विश्वजीत श्रीवास्तव ने बताया कि शिकायत के आधार पर पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड विधान की धारा 376 डी (सामूहिक बलात्कार) और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पोक्‍सो) अधिनियम की धाराओं में मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

पुलिस और कानून तो अपना काम करते रहेंगे पर उस 8 साल की मासूम के बारे में कल्पना कर मन सिहर जाता है कि जिस उम्र में बच्चे अभी अपना जीवन सुचारू रूप से जीना ही सीख रहे होते हैं उस उम्र में मासूम अपने ही शिक्षकों द्वारा सामूहिक बलात्कार का शिकार हो जाती है। दुर्भाग्य का आलम देखिये जिस कोख ने पैदा किया, उसी ने मासूम को बलात्कारी के हवाले कर दिया। इस बच्ची की शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्थिति को महसूस भर कर लेने से रूह कांप जाती है। लेकिन यह ऐसी पहली घटना नहीं है जहां मां ममता के नाम पर शर्मिंदगी बनी है। ऐसी अनेक घटनाएं यत्र-तत्र सर्वत्र हो रही हैं जो अविश्वास से भरी हैं, पर घटित हो रही हैं।

कन्या भ्रूण हत्या जैसे जघन्य पाप से समाज अभी ठीक से उबरना सीख भी नहीं पाया है कि अन्यान्य कारणों से मातृत्व लज्जित हो रहा है। अपनी ही बच्चियों के साथ बलात्कार के कई मामले हर दिन अखबार में छाए रहते हैं जिसमें बाप, चाचा, मामा, भाई आदि दोषी होते हैं। कई मामलों में सब कुछ जानते हुए भी मां की चुप्पी रहती है। क्या कोई भय, लोक-लाज, लालच या आशंका किसी मां के लिए अपनी बेटी की इस पीड़ा से बढ़कर हो सकता है जिसमें उसकी अपनी बच्ची के मन और शरीर को उसके अपने रौंद जाते हों?

बलात्कार की ऐसी कहानियां इतनी सरल सपाट भी नहीं है। कैक्टस के शूल जैसे कई हैं। 2015 में बैंगलोर में एक मां ने अपने बेटे के साथ बलात्कार इसलिए किया क्योंकि बेटा समलैंगिक था। समलैंगिक लड़कियों के माता पिता बच्चियों को "मर्द का सुख" समझाने के नाम पर अपनों से ही बलात्कार करवाते हैं और ऐसी घटनाएं राजस्थान, यूपी और तमिलनाडु, केरल तक भरी पड़ी हैं।

कुछ रोज पहले ही आईटी कंपनी की एक सीईओ मां ने एक होटल में अपने 6 साल के बेटे की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी क्योंकि तलाक के बाद वह नहीं चाहती थी बेटा अपने पिता से मिले। अभी हाल में केरल में एक मां बच्ची को टॉयलेट में जन्म देकर फरार हो गयी थी। किसी को कुछ पता नहीं चलता अगर टॉयलेट जाम नहीं होता। सफाई करने पर बच्ची का शव गर्भनाल के साथ मिला। इतनी बेरहम मां कौन थी यह भी पता नहीं चला।

ऐसे शर्मनाक और भयानक घटनाओं को अंजाम देने वाली माँ की मानसिकता क्या रही होगी? वह भावनाओं के किस आवेग से गुजरी होगी जिसमें ममता का गला घोंट दिया गया? इंसानी रूप में जिस रिश्ते का मान और ओहदा सबसे ऊँचा है, ऐसी करतूत ने उस ओहदे को पाताल में ढकेल दिया।

केरल में ही एक मां ने आवेश में आकर अपने 14 साल के बेटे की जान इस बात पर ले ली कि बेटा अपने दादा-दादी के घर अक्सर जाता था जो मां को पसंद नहीं था। एक दिन बेटा दादा-दादी से मिलने निकलने लगा तो गुस्से में मां ने बेटे को मारकर जला दिया और अपने ही अहाते में दफना भी दिया। तिस पर आवेश, शातिर कातिल के दिमाग सा काम करने लगा और बच्चे की गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज़ की गयी। बार-बार बयानों में उलट-फेर होने से शक की स्थिति में जांच करने पर यह दिल दहलाने वाला सच सामने आया।

ऐसा नहीं है कि ऐसी घटनाएं सिर्फ भारत में हो रही हैं। अभी कुछ वर्ष पूर्व अमेरिका में एक माँ को मौत की सज़ा इसलिए दी गयी क्योंकि उसने अपने 9 साल के बेटे को भूख से तड़पा-तड़पा कर मार दिया था। पिछले साल राजधानी दिल्ली में भी एक मां ने 6 साल की बेटी को इसलिए मार दिया क्योंकि बेटी ने उसे प्रेमी के साथ देख लिया था।

स्त्री के सबसे सौम्य रूप की यह कुरूपता भले ही हलक के नीचे ना उतरे मगर सच्चाई चीख रही है। ममता में ऐसी मिलावट कौतूहल और क्रोध का विषय है। आवेश पर काबू ना रख पाना, बच्चों, विशेषकर लड़कियों को बोझ समझना, विवाहेतर संबंधों या तलाक-वैधव्य के बाद नये जीवन की शुरुआत में बच्चों को बाधा समझना, समलैंगिकता से बाहर निकालना आदि कुछ कारण सामने आते हैं।

मानवीय गुणों पर कुत्सित विचारों का हावी होना समाज के लिए अच्छा संकेत नहीं है। कहते हैं पुत्र चाहे बुरा निकल जाए मगर माँ कभी कुमाता नहीं हो सकती। मगर जिस तरह अपने ही बच्चों के साथ अपराध में माताओं की भूमिका दिखने लगी है वह इन बातों को नकार रही है। एक स्त्री के लिए मां होना उसके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है। अगर उस उपलब्धि पर ही कुछ माताएं कलंक लगाती हैं तो सवाल जरूर उठाना चाहिए।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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