Bihar Politics: बिहार की राजनीति में किसको फायदा पहुंचाएगा ठाकुर का कुआं और खेत?
बिहार में एक आम कहावत है "हंसुए की शादी में खुरपी के गीत" जिसका मोटे तौर पर अर्थ होता है असंबद्ध बातें करना। चर्चा आम की हो रही हो तो इमली की बात करना शुरू कर देने वाले को जैसे अजीब नजरों से देखा जाता है, कुछ कुछ वैसी ही हरकत मनोज झा ने संसद में कर डाली।
महिलाओं के लिए आरक्षण की बात हो रही थी तो उसी मुद्दे पर रहते। इसका "ठाकुरों" से कहीं कोई सम्बन्ध ही नहीं था लेकिन प्रोफेसर मनोज झा ने ओम प्रकाश वाल्मिकी की एक कविता सुनाकर न केवल जातीय संघर्ष को हवा दे दी, बल्कि बिहार की राजनीति में उथल पुथल पैदा कर दी है।

मनोज झा राजद के कोटे से राज्यसभा में भेजे गए हैं और जिस आनंद मोहन सिंह ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल रखा है, उस आनंद मोहन सिंह के सुपुत्र आजकल राजद के टिकट पर ही विधायक हैं। कहा जा सकता है कि सामाजिक न्याय के नाम पर कथित सवर्णों को बिहार से पलायन पर मजबूर करने का आरोप जिस राजद पर अक्सर बिहार में लोग लगाते हैं, उस राजद के नेताओं ने बिहार की दो सवर्ण मानी जाने वाली जातियों को आपस में लड़वा कर, अपने तयशुदा "माय समीकरण" (एम-मुस्लिम और वाय-यादव वोट) के जरिये जीत सुनिश्चित करने का अच्छा प्रयास किया है।
यहाँ ये भी गौर करने लायक है कि राजद और उसके जैसे कई क्षेत्रीय दल जो जातिवाद की राजनीति पर ही जीवित हैं, वो पहले भी राम-जन्मभूमि मंदिर आन्दोलन के दौर में नब्बे के दशक में भाजपा की "कमंडल" की राजनीति का सामना करने के लिए "मंडल" लेकर आये थे। मंडल कमीशन ने जिस आरक्षण की सिफारिश की थी उसे लागू करने के लिए तब वीपी सिंह की सरकार ने सख्ती से काम लिया था।
अख़बारों और पुराने दौर के लोगों की मानें तो मंडल कमीशन का विरोध करते हुए कम से कम सवा सौ युवकों ने आत्मदाह किया था। इस मंडल कमीशन का भी मनोज झा द्वारा सुनाई गयी कविता से सम्बन्ध निकल आता है। मंडल कमीशन के प्रमुख राजा बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल थे, जिन्हें आजकल बी.पी. मंडल बुलाया जाता है। ये मुरहो एस्टेट के राजा थे और मधेपुरा क्षेत्र से थे जो 1990 के दशक के बाद के हिस्से तक भी उसी सहरसा जिले का हुआ करता था जिसके खुद मनोज झा हैं। यानी कि वो जो कुआं-खेत किसी "ठाकुर" का बता रहे थे, वो उन्हीं के इलाके में किसी यादव जी का होता था, जिसे बाद में स्वयं यादव जाति से आने वाले राजा बी.पी. मंडल की सिफारिश पर ओबीसी मान कर आरक्षण दे दिया गया।
आज भी मधेपुरा की बी.एन. मंडल यूनिवर्सिटी के नाम में दिख जाता है कि "ठाकुर" असल में कौन था! ये आपको सहरसा जिले में भी दिख जायेगा क्योंकि सहरसा में सबसे बड़े कॉलेज की जमीन मनोहर लाल टेकरीवाल के दान की वजह से उन्हीं के नाम पर एम.एल.टी. सहरसा कॉलेज है। आज भी कॉलेज के बगल में उसी परिवार का पेट्रोल पंप है और राजद से ही लम्बे समय तक टेकरीवाल परिवार के सदस्य विधायक भी रहे हैं, इसलिए वो भी मनोज झा के परिचित होंगे।
बिहार में हाल ही में करवाई गयी जाति-जनगणना से इसे जोड़कर देखें तो मामला थोड़ा और साफ़ होता है। नीतीश कुमार की जद (यू) के बिहार में 16 सांसद हैं, मगर विधायक केवल 45 हैं। इसकी तुलना में राजद के पास 79 विधायक हैं, भले ही सांसद एक भी न हो। अगले लोकसभा चुनावों में भाजपा की तरह राजद तो मानेगी नहीं और जद(यू) को 17 सीटें मिलना मुश्किल है। राजद अपना हिस्सा लेगी, दस कांग्रेस भी मांगेगी, फिर वामपंथी दल भी हैं।
ऐसे में जिस वोट बैंक के ज़रिये नीतीश ने लालू को पछाड़ा था, केवल उसके जरिये चुनावी जीत संभव नहीं। जद (यू) और राजद दोनों के वोट बैंक मुख्यतः ओबीसी समुदाय (क्रमशः कुर्मी और यादव) से आते हैं। संख्या बल में दोनों करीब बराबर ही बैठेंगे इसलिए सवर्ण मतों के जरिये ही हार-जीत तय हो सकती है। जिसके पक्ष में सवर्णों के मत जायेंगे, उसकी जीत की संभावना बढ़ती है। ये मत किसी तरह से टूटें तो लालू यादव और राजद को सीधा फायदा होता है। इसके लिए उसे अपनी ही पार्टी के एक सांसद और एक विधायक के पिता को आपस में भिड़ाना पड़े, तो क्या हर्ज है?
गौर करने लायक है कि मनोज झा ने अपने बयान में स्पष्ट नहीं किया था कि ठाकुर मतलब राजपूत/क्षत्रिय बिरादरी ही है! मनोज झा और उनकी जबान खींचने की बात करने वाले आनंद मोहन सिंह, दोनों ही सहरसा क्षेत्र के हैं। इस इलाके में ठाकुर का अर्थ मैथिल ब्राह्मण होता है जो मनोज झा की खुद की बिरादरी है। बिहार के अन्य क्षेत्रों में ठाकुर का अर्थ नाई होता है। यानी राजद के इस एक तीर से कई शिकार होते हैं।
बिहार से कर्पूरी ठाकुर एक कद्दावर नेता रहे जो अति पिछड़ा मानी जाने वाली नाई बिरादरी से आते थे। नीतीश कुमार हाल ही में उनके सम्मान में एक आयोजन में नजर आये थे। आज जो अंग्रेजी के विरोध की नीतीश कुमार की नीति है, या फिर शराबबंदी का कानून है, ये सभी वो नीतियाँ हैं जो असल में कर्पूरी ठाकुर की हुआ करती थीं। राजद के कई बड़े नाम जैसे लालू यादव के सुपुत्र तेज प्रताप यादव भी कह चुके हैं कि शराबबंदी जैसी नीतियों का वो समर्थन नहीं करते।
ऐसी स्थिति में जब बिहार का कोई नेता अन्दर के ठाकुर को मारने की बात करता है, और बिहार में ठाकुर का अर्थ ही कुछ और होता है, तो ऐसा संभव है कि बिहार के अपने वोट बैंक को राजद कुछ सन्देश दे रहा हो। इस मुद्दे पर जब लालू यादव से बात की गयी तो उन्होंने पत्रकारों को भी स्पष्ट कह दिया है कि वो प्रो. मनोज झा को पढ़ा लिखा मानते हैं और उनके बयान के समर्थन में हैं। ये स्थिति आनंद मोहन सिंह के लिए सांप-छछुंदर वाली हो गयी है। अब वो "मनोज झा की जीभ खींच लेने" जैसे अपने बयान को निगल भी नहीं सकते और अपने पुत्र चेतन आनंद को राजद से अलग हो जाने की सलाह भी नहीं दे सकते।
जिस सहरसा क्षेत्र के आनंद मोहन सिंह और मनोज झा हैं, वो ब्राह्मण बहुल क्षेत्र है। वहाँ के किसी ब्राह्मण को समर्थन देकर लालू यादव अपने परम्परागत वोट बैंक यानि मुस्लिम-यादव गठजोड़ में कुछ ब्राह्मण समर्थन जोड़ने में भी सफल होंगे, जबकि राजपूत वोटबैंक परंपरागत रूप से राजद का विरोधी ही रहा है, इसलिए उसमें राजद का नुकसान नहीं। दूसरी तरफ बिहार में ठाकुर का अर्थ अति-पिछड़ा कहलाने वाली नाई बिरादरी होती है जो नीतीश कुमार की तरफ बढ़ रही थी और मनोज झा के एक बयान में ही राजद ने उनके लिए भी सन्देश दे दिया है।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि लोकसभा चुनावों से पहले के राजनैतिक दाँव-पेंच शुरू हो चुके हैं। जैसे दो दशक पहले के दौर में मंडल और कमंडल की राजनीति चली थी, कुछ उसी तर्ज पर इस बार भी भाजपा के राष्ट्रवाद का सामना आई.एन.डी.आई.ए. गठबंधन के कई घटक जातिवाद की राजनीति से करने वाले हैं। कोटे के अन्दर कोटे की मांग के बाद अब भारत को एक बार फिर से जातिवाद की राजनीति का सामना करने की तैयारी कर लेनी चाहिए।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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