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New Alliance: नए बने गठबंधन में क्या जुड़ा और क्या घटा?

2004 में अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों का मानना ​​था कि एनडीए चुनाव जीतेगा। सर्वेक्षणों ने ही नहीं, बल्कि सभी एक्जिट पोल ने भी एनडीए को 250 से ज्यादा सीटें दिखाई थीं। अटल बिहारी वाजपेयी के सामने कोई चेहरा नहीं था। चुनावों से पहले के कुछ महीनों में अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहा था।

उदारीकरण की नीतियाँ ट्रेक पर आ गई थीं। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया था, जो दुनिया में 7वां सबसे बड़ा और भारत के लिए एक रिकॉर्ड था। "फील गुड फैक्टर" और "इंडिया शाइनिंग" का प्रचार था।

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लेकिन एग्जिट पोल्स की 250 सीटों के मुकाबले एनडीए 181 पर अटक गया था। भाजपा 182 से घट कर 138 पर आ गई, और कांग्रेस 114 से बढ़ कर 145 हो गई। इसकी वजह यह थी कि डीएमके, टीडीपी, लोजपा और रालोसपा एनडीए छोड़ गई थी। ये सब कांग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़ रहे थे, इसके बावजूद कांग्रेस के सहयोगी सिर्फ 73 सीटें जीत सके थे, जिनमें सबसे ज्यादा आरजेडी की 24 और डीएमके की 16 और एनसीपी की 9 सीटें थीं। इसलिए न एनडीए को बहुमत मिला था, न कांग्रेस गठबंधन को।

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चुनाव के बाद यूपीए बना, जिसमें कांग्रेस के पुराने सहयोगियों के अलावा पीडीपी, टीआरएस, एआईएमआईएम, तृणमूल कांग्रेस, झारखंड विकास मोर्चा, केरल का जनता दल डेमोक्रेटिक, एमडीएमके, टीआरएस, पीएमके और बसपा शामिल हुए। लेकिन इन सब की संख्या भी कुल मिला कर 218 ही हुई थी, तब वामपंथी दलों के 59 सांसदों और समाजवादी पार्टी के 36 सांसदों के बाहरी समर्थन से यूपीए की सरकार बनी थी।

क्या 2024 में एनडीए के मुकाबले नया विपक्षी गठबंधन बनने से 2004 वाली स्थिति पैदा हो सकती है? जैसे वाजपेयी के शासनकाल में देश ने इन्फ्रास्ट्रक्चर और आर्थिक क्षेत्र में उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन जैसे इन उपलब्धियों के बूते वाजपेयी 2004 में नहीं जीत पाए थे, वैसे इन उपलब्धियों के बूते मोदी 2024 में नहीं जीत पाएंगे। कहा जा रहा है कि "इंडिया" नाम से जो नया गठबंधन बना है, उससे ज्यादा नहीं तो 2004 वाले नतीजे तो आ ही जाएंगे। लेकिन यह याद रखना चाहिए कि नए गठबंधन में शामिल हुए दलों ने ही 2004 से 2014 तक कांग्रेस को समर्थन देकर सरकार बनवाई थी, और इन्हीं सब दलों को 2014 और 2019 में देश ने ठुकराया था।

विपक्षी दल इस बात से बहुत खुश हैं कि कुछ वोट उन्हें "इंडिया" नाम से ही मिल जाएंगे। लेकिन "इंडिया" के घटक दलों से वे लोग ज्यादा खुश हैं, जो 2014 में मान ही नहीं रहे थे कि एनडीए स्पष्ट बहुमत लेकर आएगा। जो लीग जमीनी हकीकत को दरकिनार करके पक्षपाती होकर विश्लेषण करते हैं, वे बार बार गलत साबित हो जाते हैं|

ऐसा नहीं है कि नया विपक्षी गठबंधन भाजपा का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा, लेकिन वे लोग जो 2024 की तुलना 2004 से कर रहे हैं, वे जमीनी हकीकत से बहुत दूर हैं। तब भाजपा ने कभी 200 का आंकड़ा पार नहीं किया था, जबकि अब भाजपा 300 का आंकड़ा पार कर चुकी है। इनमें से 224 सीटों पर भाजपा ने 51 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल किया था, जो यह साबित करता हैं विरोधी दल मिल कर भी 224 सीटों पर भाजपा से पीछे हैं।

इंडिया नाम का विपक्षी गठबंधन मोदी को चुनौती जरुर देगा, लेकिन वह चुनौती 2004 जैसी नहीं हो सकती। हालांकि इस नए गठबंधन में वही सभी दल हैं, जिन्होंने 2004 में यूपीए की सरकार बनवाई थी, लेकिन इस बीच गंगा में बहुत पानी बह चुका है। 18 जुलाई को जब यूपीए भंग हुआ, तब उसमें उद्धव ठाकरे की शिवसेना समेत 19 राजनीतिक दल और लोकसभा में 108 सांसद थे। 18 जुलाई को बने इंडिया नाम के गठबंधन में यूपीए के 19 दलों के अलावा समाजवादी पार्टी, आरएलडी, दो कम्युनिस्ट पार्टियां, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और जेडीयू शामिल हुई हैं। इन सभी दलों के लोकसभा में 43 सदस्य हैं।

2004 के बाद यूपीए में रही बहुजन समाज पार्टी, टीआरएस, एआईएमआईएम और जेडीएस नए बने इंडिया गठबंधन में शामिल नहीं हैं। अब सवाल यह है कि जो सात नए दल नए यूपीए में शामिल हुए हैं, उनकी अपने अपने राज्यों में क्या स्थिति है। कम्युनिस्ट पार्टिया बंगाल और त्रिपुरा में खत्म हो चुकी हैं, केरल में भी पिछली बार सिर्फ एक लोकसभा सीट जीती थी, बाकी सारे देश में भी उसका प्रभाव खत्म हो चुका है।

तृणमूल कांग्रेस का जरुर पश्चिम बंगाल में पलड़ा भारी है, पिछली बार वह कांग्रेस, कम्युनिस्टों और भाजपा को हरा कर 42 में से 22 सीटें जीती थी, जबकि भाजपा 18 सीटें जीती थी, कांग्रेस 2 सीटें जीती थी। बंगाल में अगर तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस मिल कर लड़ते हैं तो जरुर भाजपा के साथ कड़ा मुकाबला होगा और इंडिया गठबंधन की दो-चार सीटें बढ़ भी सकती हैं, लेकिन ममता कम्युनिस्टों को समझौते में कोई सीट नहीं छोड़ने वाली।

चौथी पार्टी है समाजवादी पार्टी, जो बसपा से गठबंधन के बावजूद पिछली बार 5 लोकसभा सीटें जीत पाई थी। बसपा से गठबंधन टूटने के बाद अखिलेश यादव ने जब विधानसभा सीट जीतकर अपनी लोकसभा सीट खाली की तो उपचुनाव में अपनी खुद की लोकसभा सीट नहीं बचा पाए। आजम खान के इस्तीफा देने से खाली हुई मुस्लिम बहुल रामपुर सीट भी उपचुनाव में नहीं बचा पाए। सपा की सहयोगी आरएलडी के पल्ले कुछ भी नहीं है, उसके अध्यक्ष जयंत चौधरी बसपा, सपा का समर्थन होने के बावजूद खुद ही चुनाव हार गए थे। जाटों के किसान आन्दोलन के बावजूद आरएलडी विधानसभा की 33 सीटें लड़ कर सिर्फ आठ जीत पाई थी। इस बीच ओम प्रकाश राजभर समाजवादी पार्टी का साथ छोड़कर एनडीए में जा चुके है, जिससे अखिलेश यादव 2019 और 2022 से काफी कमजोर हुए हैं|

अब बची जेडीयू और आम आदमी पार्टी। जेडीयू पिछली बार भाजपा के साथ गठबंधन करके 16 सीटें जीती थी, 2014 में उसका भाजपा से गठबंधन नहीं था, तो वह बिहार में साफ़ हो गई थी। विधानसभा चुनावों में भाजपा के साथ गठबंधन के बावजूद उसकी सीटें घट गई। अभी हाल ही के दो महीनों में उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी जेडीयू का साथ छोड़कर एनडीए में चले गए हैं। राजद और जेडीयू के गठबंधन के चलते मुकाबला कड़ा जरुर हो जाएगा, लेकिन बिहार में भी भाजपा का पलड़ा हर हाल में भारी है, क्योंकि 2014 के उसके गठबंधन के साथी एनडीए में लौट आए हैं।

अब रही आम आदमी पार्टी, तो याद रखना चाहिए कि 2013 और 2015 में आम आदमी पार्टी दिल्ली में जीती थी, इसके बावजूद 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में उसे दिल्ली में एक भी सीट नहीं मिली थी। पंजाब में उसकी ताकत जरुर बढ़ी है, वहां एनडीए के पास पहले भी सिर्फ चार सीटें थी, जिनमें दो भाजपा की और दो अकाली दल की थी। पंजाब में आम आदमी पार्टी भाजपा की कीमत पर नहीं, कांग्रेस की कीमत पर विधानसभा चुनाव जीती है। पंजाब में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का गठबंधन होगा, तो उसका फायदा भाजपा को होगा।

इस बीच महाराष्ट्र में पुराने यूपीए और नए "इंडिया" के दोनों घटक शिवसेना के उद्धव ठाकरे और एनसीपी के शरद पवार 2019 जैसे ताकतवर नहीं रहे। इन दोनों दलों का दो-तिहाई एनडीए में जा चुका है। इसलिए एनडीए 2004 की तरह कमजोर नहीं हुआ है, 2014 से ज्यादा मजबूत हुआ है। कांग्रेस ने यूपीए को इंडिया बना कर अपने आप कुछ मजबूत जरुर किया है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में आम आदमी पार्टी उसके मुकाबले खड़ी नहीं होगी, तो वह इन राज्यों से कुछ सीटें निकाल लेगी, लेकिन सौ के पार तो वह भी नहीं जाएगी।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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