Nitish Kumar: फिर पलटने की तैयारी में हैं नीतीश बाबू?
भारतीय जनता पार्टी के नेता के घर छठ का प्रसाद खाने के बहाने नीतीश के जाने से साफ है कि बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यू के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।

Nitish Kumar: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चैत्र छठ व्रत के ठीक एक दिन पहले भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय मीडिया टीम के सह प्रभारी और विधान परिषद सदस्य संजय मयूख के घर प्रसाद खाने पहुंच गए। नीतीश कुमार की पूरी राजनीतिक यात्रा पर जिनकी गहरी निगाह है, उन्हें पता है कि उनका हर कदम सोची-समझी रणनीति के तहत होता है।
तो क्या बिहार में एक बार फिर नीतीश कुमार पलटने की तैयारी में हैं? नीतीश के इस कदम के बाद सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या नीतीश कुमार का मन महज सात महीने में ही अपने पुराने नेता लालू यादव की पार्टी और उनके बेटों से मोहभंग हो गया है? ऐसा नहीं है कि नीतीश लालू यादव के साथ पहली बार मिलकर सरकार चला रहे हैं। पिछली बार लालू यादव के साथ उनका साथ चार साल तक चला। लेकिन लगता है कि इस बार वे जल्दी ही राष्ट्रीय जनता दल की राजनीति से उब गए हैं।
वैसे तो यह पूरे बिहार को पता है कि राष्ट्रीय जनता दल के कोर वोट बैंक की सोच क्या है और सत्ता में आते ही वह किस तरह सोचता है, उसके कदम कैसे होते हैं? ऊपरी तौर पर तेजस्वी यादव लाख कहें कि नीतीश कुमार को राष्ट्रीय राजनीति करनी है और उनके आशीर्वाद वे बिहार की सेवा करेंगे। लेकिन हकीकत यह है कि नीतीश कुमार पर बिहार के मुख्यमंत्री का पद छोड़ने का दबाव आरजेडी की ओर से तभी से बनने लगा है, जब से उन्होंने आरजेडी के साथ सरकार बनाई है।
पिछले दिनों विधानसभा में जिस तरह एक मंत्री ने ही खुलकर सरकार की धज्जियां उड़ाईं, उसके संकेत अगर जनता दल यू का नेतृत्व ना समझता हो तो उसे नासमझ ही माना जा सकता है। आए दिन आरजेडी के विधायक नीतीश कुमार से तेजस्वी को गद्दी सौंपने की मांग करते ही रहते हैं। जिस तरह नीतीश की मर्जी के बिना बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर ने बयानबाजी करके राज्य का तनाव बढ़ाने की कोशिश की, और आरजेडी कोटे के उस मंत्री को तेजस्वी ने रोका भी नहीं। आरजेडी के नेताओं के तेवर और बयान राजनीति के वितान पर लिखे साफ संदेश रहे हैं, संदेश यह कि नीतीश कुमार रास्ता साफ करें और वानप्रस्थी बनें।
नीतीश कुमार इससे अंदरूनी तनाव में हैं। जिस तरह हाल में उन्होंने विधान परिषद में संकेतों को अंग्रेजी में लिखे होने को लेकर विधान परिषद सभापति को झाड़ पिलाई, उससे साफ है कि नीतीश अंदर से स्थिर नहीं है। वैसे भी भले ही वे मुख्यमंत्री हों, लेकिन सदन में अध्यक्ष ही सर्वोपरि होता है। उसके खिलाफ बोलना या उस पर सीधे सवाल उठाना, दरअसल अध्यक्ष पद की अवमानना करना है। नीतीश ने ऐसा पहली बार नहीं किया है। भाजपा के साथ रहते हुए भाजपा कोटे से विधानसभा अध्यक्ष रहे विजय सिन्हा को भी खरी-खोटी सुना दी थी। तब भी माना गया था कि नीतीश अंदर से स्थिर नहीं हैं, इसलिए वे ऐसी हरकत कर रहे हैं।
नीतीश कुमार इन दिनों के एक और चर्चित मामले पर चुप हैं। इस चुप्पी के जरिए भी उन्होंने अपने सत्ता सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस, दोनों को संदेश दिया है। राहुल की गांधी की सदस्यता खारिज होने को लेकर नीतीश ने अब तक चुप्पी साध रखी है। जबकि उनका सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल इस मुद्दे पर मुखर है।
2024 के आम चुनावों में एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति में अपना दबदबा बनाने की कोशिश में जुटी भारतीय जनता पार्टी के लिए नीतीश का यह कदम बेहतर लग सकता है। हो सकता है कि भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व नीतीश के बढ़ते कदम को थामने के लिए कोई सैद्धांतिक आधार तैयार कर ले। लेकिन यह भी सच है कि भारतीय जनता पार्टी का कोर वोटर नीतीश कुमार को कम से कम राज्य की राजनीति में बड़ा भाई मानने या उनकी वैसी भूमिका को पचाने को तैयार नहीं है।
भारतीय जनता पार्टी का कोर सवर्ण वोटर नीतीश कुमार को पिछली ही बार पचा नहीं पा रहा था। विजय सिन्हा पर उनके हमले को भी भाजपा के कोर वोटर ने खुद पर हमला माना था। 10 अगस्त 2022 के पहले तक की सरकार को लेकर भाजपा के कोर वोटरों की धारणा सही नहीं थी। कुढ़नी के उपचुनाव में जनता दल यू पर भारतीय जनता पार्टी की जीत दरअसल भाजपा के कोर वोटरों की ओर से नीतीश कुमार से किया गया पुराना हिसाब- किताब था।
वैसे आज की राजनीति में सत्ता सबसे बड़ा साध्य हो गई है। यही वजह है कि राजनीतिक दल सत्ता हासिल करने के लिए अपने लिए ऐसे गठबंधन की तलाश करते रहते हैं। जब बात बन जाती है तो उस गठबंधन की नई सैद्धांतिकी गढ़ ली जाती है। कार्यकर्ताओं को हर दल अपने पार्टी अनुशासन के नाम पर चुप करा देते हैं। कई बार गठबंधन को राष्ट्रीय मजबूरी तो कई बार जरूरत बताया जाता है।
कुछ ऐसा ही करने की कोशिश में नीतीश भी हो सकते हैं। लेकिन इस बार माहौल बदला हुआ है। यह नहीं भूलना चाहिए कि अब वोटर बदल चुके हैं। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि नौजवान वोटरों की एक ऐसी पीढ़ी आ गई है, जो सूचनाओं से अपनी पिछली पीढ़ी की तुलना में कहीं ज्यादा लैस है। अब वह राजनीतिक दलों की ही सिखाई राजनीति से अलहदा भी सोचने लगा है। विशेषकर बिहार जैसे राज्यों में ऐसे मतदाता बढ़े हैं। इसे संयोग कहें या कुछ और, भारतीय जनता पार्टी के कोर वोटरों में ऐसी सोच समझ रखने वाले वोटरों की संख्या कहीं ज्यादा है।
जब स्थापित सिद्धांतों और परंपरा के खिलाफ कभी कोई जाने या अनजाने में कदम उठता है तो सबसे ज्यादा उसका विरोध उसके समर्थक ही करते हैं। 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव में भाजपा की हार की वजह भाजपा के खिलाफ मजबूत गठबंधन को माना गया था, लेकिन यह आसान विश्लेषण था। उस वक्त भाजपा के कोर वोटर, विशेषकर भूमिहार समुदाय ने अपने प्रभाव वाले इलाकों में भाजपा का साथ नहीं दिया था। भाजपा की हार की एक बड़ी वजह यह भी रही थी। सच तो यह है कि राज्य में भारतीय जनता पार्टी का कोर वोटर अब नीतीश कुमार को पसंद नहीं करता। ऐसे में अगर भाजपा फिर से नीतीश के साथ जाती है तो उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है।
बार-बार पलटने की वजह से नीतीश कुमार भी अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं। इसका असर उनके अपने गांव में भी दिखता है। इसलिए तय है कि अब नीतीश अपनी आखिरी पारी ही खेलने की तैयारी में हैं। 2005 और 2010 जैसी विश्वसनीयता वे शायद ही हासिल कर पाएं।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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