इंडिया गेट से: यह दार्जिलिंग समझौता क्या है?
यह बात अब समझ आने लगी है कि जब कांग्रेस ने राष्ट्रपति पद के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार को समर्थन कर दिया था, तो ममता बनर्जी ने उपराष्ट्रपति के चुनाव में कांग्रेस की उम्मीदवार का समर्थन क्यों नहीं किया। मैं यशवंत सिन्हा को तृणमूल कांग्रेस का उम्मीदवार इसलिए कहता हूँ कि वह तृणमूल कांग्रेस के सदस्य हैं, और उनका चयन विपक्षी दलों की बैठक में नहीं हुआ था, बल्कि ममता बनर्जी ने खुद किया था।

उम्मीदवार के चयन की अंतिम बैठक से पहले यशवंत सिन्हा ने ट्विट करके ममता बनर्जी का आभार जता दिया था। जब कांग्रेस ने ममता बनर्जी की ओर से तय राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को समर्थन कर दिया था तो ममता ने कांग्रेस की ओर से तय उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का समर्थन क्यों नहीं किया।
दोनों तरफ से अलग अलग बातें कही जा रही हैं। जब अपने घर विपक्ष की बैठक के बाद शरद पवार विपक्ष के उम्मीदवार का एलान कर रहे थे, तो उनसे पूछा गया था कि बैठक में ममता बनर्जी क्यों नहीं आई? तब शरद पवार ने कहा कि वह कहीं अन्य कार्यक्रम में व्यस्त थीं, लेकिन उनसे बात हो गई है। उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया था कि ममता बनर्जी की किस से बात हुई है। अब कांग्रेस की तरफ से यह बताया जा रहा है कि सोनिया गांधी ने तीन दिन पहले ममता बनर्जी से फोन पर बात की थी।
कांग्रेस का कहना है कि सोनिया गांधी ने 15 जुलाई को ढाई बजे सोनिया गांधी को फोन किया था। तब ममता बनर्जी ने कहा था कि उनके दिमाग में किसी का नाम नहीं है, विपक्ष के बाकी लोग जो भी नाम तय कर लेंगे, उन्हें मंजूर होगा। अगले दिन 16 जुलाई को एनडीए ने जगदीप धनखड़ की उम्मीदवारी का एलान किया, तो सोनिया गांधी ने रात साढ़े आठ बजे ममता को बात करने के लिए संदेश भेजा। इस बार ममता की तरफ से कोई जवाब नहीं आया।
18 जुलाई को जब उम्मीदवार का चयन करने के लिए शरद पवार के घर पर विपक्ष के नेताओं की बैठक हो रही थी, तो न्योते के बावजूद तृणमूल कांग्रेस की तरफ से कोई नहीं आया था, जबकि टीआरएस और शिवसेना का प्रतिनिधि मौजूद था। राष्ट्रपति पद के चुनाव में शिवसेना ने एनडीए को समर्थन का एलान किया था और टीआरएस ने राष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष का उम्मीदवार तय करते समय कांग्रेस से दूरी बना ली थी।
कांग्रेस का दावा है कि बैठक में मारग्रेट अल्वा का नाम तय हो जाने के बाद शरद पवार ने ममता बनर्जी को फोन लगाया, तो उनके आफिस से बताया गया कि मुख्यमंत्री एक बैठक में व्यस्त हैं। आधे घंटे तक ममता के जवाब का इन्तजार किया, सब लोग इन्तजार करते बैठे रहे, लेकिन कोई जवाब नहीं आया तो शरद पवार ने मीडिया के सामने उम्मीदवार का एलान कर दिया।
यह जो बात ऊपर बताई गई है, एक तरफा बात है, ममता बेनर्जी की तरफ से दूसरी बात बताई गई है, जो कांग्रेस के दावे से एक दम अलग है। 21 जुलाई को जब राष्ट्रपति के चुनाव की मतगणना हो रही थी, तो यह खुल कर सामने आ रहा था कि झारखंड, बिहार समेत अनेक राज्यों में कांग्रेस विधायकों ने एनडीए के पक्ष में क्रास वोटिंग की है, यहाँ तक कि सांसदों ने भी क्रास वोटिंग की। इससे ममता बेहद खफा थी।
दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस के सभी 35 सांसदों की बैठक बुलाई गई, जिस में तृणमूल कांग्रेस के महासचिव अभिषेक बनर्जी भी मौजूद थे, इसी बैठक में भविष्य की राजनीति और तृणमूल कांग्रेस की भूमिका पर विचार किया गया। ममता बनर्जी ने अभिषेक बनर्जी को बता कर भेजा था कि क्या करना है।
बैठक के बाद अभिषेक बनर्जी ने उन परिस्थियों का एलान किया, जिनमें तृणमूल कांग्रेस ने वोटिंग से दूर रहने का फैसला किया है। उन्होंने सोनिया गांधी और शरद पवार के इस दावे की पोल खोल कर रख दी कि ममता बनर्जी ने कोई नाम नहीं सुझाया था। अलबत्ता दावा किया गया कि ममता बनर्जी ने तीन-चार नाम सुझाए थे, उन नामों पर विचार विमर्श चल रहा था कि अचानक तृणमूल कांग्रेस को विश्वास में लिए बिना उन्होंने मारग्रेट अल्वा का नाम तय कर लिया।
यहाँ सोनिया गांधी का ईसाई एंगल सामने आता है, सोनिया गांधी ने मारग्रेट अल्वा के नाम पर जिद्द की थी। शरद पवार का भी मारग्रेट अल्वा के प्रति सॉफ्ट कार्नर था। यह बात ममता बनर्जी को किसी और सोर्स से पता चल गई थी। उन्हें पता था कि बैठक में क्या होने वाला है, इसलिए उन्होंने बैठक का बहिष्कार किया। ममता बनर्जी इस बात से भी खफा थीं कि कांग्रेस वामपंथी दलों खासकर सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी को ज्यादा महत्व दे रही हैं, जबकि वामपंथियों के वोट तृणमूल कांग्रेस से बहुत कम हैं।
कांग्रेस ने 2021 का पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव भी वामपंथियों के साथ मिल कर लड़ा था। सांसदों और विधायकों की दृष्टि से तृणमूल कांग्रेस देश में दूसरे नंबर की विपक्षी पार्टी है, इसलिए ममता चाहती हैं कि तृणमूल कांग्रेस को उस की हैसियत के मुताबिक़ अहमियत दी जाए और वामपंथियों को उस की हैसियत के मुताबिक़ ही अहमियत दी जाए। अलबत्ता ममता बेनर्जी की जिद्द है कि 2024 में विपक्षी एकता के लिए वामपंथियों को बाहर रखा जाए, वे तो मजबूरी में साथ आएँगे ही।
विपक्षी एकता के परखचे उड़ने का एक और एंगल है, जिसे अब कांग्रेस ने खुल कर कह दिया है। वह यह कि 18 जुलाई को एनडीए की ओर से उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार तय करने के लिए बुलाई गई भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक से एक दिन पहले 15 जुलाई को असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा दार्जिलिंग पहुंचे थे। जहां राजभवन में राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने उन का स्वागत किया। धनखड़ ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को दार्जलिंग आने का न्योता दिया हुआ था। वहां दोनों मुख्यमंत्रियों और राज्यपाल जगदीप धनखड़ की बंद कमरे में मुलाक़ात हुई। अगले दिन जगदीप धनखड़ को एनडीए का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया।
यानि 15 महत्वपूर्ण तारीख है जब सोनिया गांधी की दिन में ममता बनर्जी से बात हुई। उसी दिन शाम को ममता और जगदीप धनखड़ की मुलाक़ात हुई। फिर उसके बाद ममता ने न सोनिया से बात की, न शरद पवार से। लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी का कहना है कि 15 जुलाई को ही ममता की जगदीप धनखड़ से डील हो गई थी, इसीलिए 18 जुलाई की बैठक में न तो ममता खुद आई थी, न कोई प्रतिनिधि भेजा था। इसी दार्जीलिंग समझौते की चर्चा चलाकर कांग्रेस व वामपंथी ममता बनर्जी पर आरोप लगा रहे हैं कि उनकी मोदी से सांठगांठ है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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