BJP and Muslims: क्या मुसलमानों के बारे में बदल गया भाजपा का चिंतन?

भारतीय जनता पार्टी और मुसलमानों का रिश्ता तिलिस्म की तरह रहा है। लेकिन अब जिस तरह मोदी मुसलमानों को अपना मित्र बनाने का अभियान चला रहे हैं, उससे मान लेना चाहिए कि मुसलमानों को लेकर भाजपा का चरित्र और चिंतन बदल गया है।

what BJP concern about Muslims is now changed

BJP and Muslims: एक विधान-एक निशान, गोहत्या बंदी, धर्मान्तरण, राम मंदिर आंदोलन, धारा-370 ऐसे मुद्दे थे जिन्होंने मुस्लिमों को धुर दक्षिणपंथी राजनीतिक दल भाजपा या फिर पूर्व की जनसंघ से जुड़ने में अवरोध उत्पन्न किया। अपेक्षाकृत अधिक धर्मनिरपेक्ष पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी भी अपनी छवि के अनुरूप मुस्लिम समाज में भरोसा पैदा नहीं कर पाए। 2014 में नरेन्द्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने तो उनके विरोधियों द्वारा मुस्लिम समाज में यह डर फैलाया गया कि अब मुस्लिमों को देश में ही टिकने नहीं दिया जाएगा।

2016 तक भाजपा और मुस्लिम समाज के बीच अबोला सा रिश्ता रहा जहाँ दोनों ही पक्ष एक-दूसरे को संशय से देखते रहे किन्तु इसके बाद प्रधानमंत्री जनधन योजना, उज्ज्वला योजना, आवास योजना, मुद्रा योजना, लोन योजना जैसी तमाम लोकप्रिय योजनाओं का लाभ जब मुस्लिम समुदाय को भी प्राप्त हुआ तो संशय के बादल छटने लगे। हालांकि कट्टरपंथी मौलवियों द्वारा आज भी मुस्लिम समुदाय को भाजपा से जोड़ दिए गए सांप्रदायिक चरित्र से डराया जाता है और उनका वोटों के माध्यम से एकमुश्त विरोध दिख भी जाता है किन्तु अब स्थिति में बदलाव शुरू हुआ है।

तीन तलाक निषेध कानून के बाद मुस्लिम महिलाओं ने भाजपा से जुड़ने में दिलचस्पी दिखाई वहीं शिया समुदाय भी खुद को भाजपा के करीब पाने लगा। कोरोना कालखंड में फ्री राशन योजना, सब्सिडी वाला राशन सहित स्वास्थ्य बीमा, खाते में पैसा डालने की योजना का लाभ भी मुस्लिम समुदाय को मिला। साथ ही मुस्लिम लड़कियों की शादी में सरकारी सहायता मिली, वहीं रोजगार और कौशल विकास योजना में भी मुस्लिम समाज के लोगों को लाभ मिला है। मुस्लिम छात्रों को छात्रवृति का सर्वाधिक लाभ हुआ।

नुपुर शर्मा प्रकरण के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पार्टी के सभी नेताओं से मुस्लिम समुदाय के प्रति अमर्यादित शब्दों के प्रयोग पर रोक लगाने की अपील की। वहीं इस वर्ष की शुरुआत में कर्नाटक की एक रैली में उन्होंने पसमांदा मुस्लिम, बोहरा मुस्लिम, सूफी मुस्लिमों तक पार्टी कार्यकर्ताओं की पहुंच बनाने का आग्रह किया। कुल मिलाकर भाजपा या मोदी ये संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि मुस्लिम समाज को लेकर उनकी पार्टी का चाल, चेहरा और चरित्र बदल रहा है। किन्तु क्या पूरे देश में मुस्लिम समुदाय का भाजपा के प्रति प्रेम है या यह वर्तमान राजनीति के चलते "गिव एंड टेक" का मामला है?

दोस्ती के बढ़ते हाथ के पीछे अपना हित साधने की कवायद!

तमाम सरकारी योजनाओं में लाभार्थी बनने के बावजूद मुस्लिम समुदाय अब अधिक लाभ लेने की कवायद कर रहा है। हाल ही में लखनऊ के ऐतिहासिक बड़े इमामबाड़े में शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जव्वाद ने शिया सम्मेलन के जरिए सियासी दलों को अपनी ताकत दिखाते हुए कहा कि शियाओं को हर सरकार ने ठगा है और वे आज भी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से पिछड़े हुए हैं। मौलाना जव्वाद ने मांग किया कि पारसी समुदाय की तरह शिया समुदाय के लिए भी संसद में आरक्षण की व्यवस्था हो। वहीं जमात उलेमा-ए-हिंद के मौलाना महमूद मदनी ने फरवरी में दिल्ली में लाखों की भीड़ जुटाकर अपनी ताकत दिखाते हुए पसमांदा मुसलामानों के लिए धारा 341 को समाप्त कर आरक्षण की मांग कर डाली।

इसके अलावा उन्होंने समान नागरिक संहिता पर उठ रहे सवालों पर भी सरकार से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की। इसके अलावा तमाम मुस्लिम संगठन भी आपसी मतभेदों को भुलाकर एक मंच पर आ रहे हैं और सरकार के सामने अपने एजेंडे को बिना लाग-लपेट रख रहे हैं ताकि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले मुस्लिमों को लेकर भाजपा के मंतव्य की थाह पाई जा सके।

भाजपा ने शुरू किया मुस्लिम संपर्क महाभियान

भाजपा में इस बात पर सर्वसम्मति है कि कश्मीर घाटी और देश के बाकी हिस्सों के बीच दूरी को पाटने की जरूरत है और इस काम में मुस्लिमों को साथ लिए बिना आगे बढ़ा नहीं जा सकता। यही कारण है कि 10 मार्च से पार्टी के अल्पसंख्यक मोर्चे ने मुस्लिमों को साधने के लिए संपर्क अभियान प्रारंभ किया है जिसके पहले चरण के अंतर्गत कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर में फैले 64 जिलों का चयन किया गया है। इसके अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जहां मुस्लिमों की आबादी सर्वाधिक है, वहां ईद के बाद 'स्नेह मिलन' सम्मेलन आयोजित करने की योजना है। इसके अंतर्गत मुसलमान जाट, मुसलमान गुर्जर, मुसलमान राजपूतों को जोड़ने और एक मंच पर लाने का प्रयास किया जाएगा।

भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चे ने इसी कड़ी में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में 'मोदी मित्र' बनाने का एलान भी किया है जो मुस्लिम समुदाय के घर-घर तक जाकर भाजपा से उनकी दूरी पाटने का काम करेंगे। इसके साथ ही इस वर्ष के अंत तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में मुसलमानों के लिए एक मेगा आउटरीच कार्यक्रम भी आयोजित करने का खाका तैयार किया गया है जिसका उद्देश्य मुस्लिम समुदाय से सीधा संपर्क स्थापित कर दोनों पक्षों के बीच संवाद को बढ़ावा देना होगा।

भाजपा के लिए मुस्लिम समुदाय इतना आवश्यक क्यों?

2024 में जब लोकसभा चुनाव होंगे तो मोदी सरकार को 10 वर्ष हो चुके होंगे। इन 10 वर्षों की सत्ता में अब सरकार किसी भी कमजोर कड़ी का आरोप विपक्ष पर मढ़कर निकल नहीं सकती क्योंकि इन 10 वर्षों में पूर्ण बहुमत की सरकार ने हर वो कार्य किया है जो वह करना चाहती थी। फिर लोकतंत्र में सभी को संतुष्ट करना आसान भी नहीं है। ऐसे में जनता की सभी आकांक्षाओं की पूर्ति संभव नहीं है और यही एंटीइन्कंबेंसी को भी जन्म देगी।

लगभग 17 करोड़ मुस्लिम मतदाता जो अब तक विपक्ष का सबसे बड़ा वोट बैंक रहे हैं, मोदी सरकार उन्हीं को अपनी ओर मोड़कर अपने संभावित कटने वाले वोटों की भरपाई करना चाहती है। इतना ही नहीं, मुस्लिम समुदाय का समर्थन हासिल करने की कोशिशों में जुटी भाजपा मात्र मुस्लिम मतदाताओं को ही लुभाने की रणनीति पर काम नहीं कर रही है, बल्कि अल्पसंख्यक बहुल सीटों पर ऐसे मुस्लिम उम्मीदवारों की तलाश भी जारी है जो पार्टी को जीत दिला सकें।

भाजपा को लगता है कि ऐसा करने पर उसे इस आरोप से निजात मिलेगी कि पार्टी मुस्लिम समुदाय को उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं देती। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 'सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास-सबका प्रयास' के नारे की असली परीक्षा भी मुस्लिम समुदाय के साथ जुड़ने से ही होगी। इसे भाजपा नेतृत्व समझ चुका है और उसी दिशा में वह कदम भी बढ़ा रहा है। अब यह मुस्लिम समुदाय को तय करना है कि उसकी दशा और दिशा की गति क्या रहती है?

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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