Bengal Poll Violence: बैलट पेपर से चुनाव क्यों चाहता है विपक्ष
Bengal Poll Violence: असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा ने ट्विट किया है कि बंगाल में पंचायत चुनावों के दौरान हुई हिंसा के शिकार परिवारों के 133 सदस्यों ने असम के धुबरी जिले में शरण ली है| पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने बंगालियों को शरण देने के लिए उनका आभार जताया है| ममता बनर्जी ने पंचायत चुनावों में भी अपना दबदबा दिखाया है| ग्राम पंचायतों की कुल 63,229 सीटों में से तृणमूल काग्रेस ने 40,000 से ज्यादा पर जीत हासिल की है, 10,000 से ज्यादा सीटें जीत कर भाजपा ने दूसरे नंबर की स्थिति बनाए रखी है| जबकि करीब 3000 और 2500 सीटें जीत कर कम्युनिस्ट और कांग्रेस तीसरे और चौथे नंबर पर रहे|
बंगाल में हुए पंचायत चुनावों से एक बात साफ़ हो गई है कि सभी विपक्षी पार्टियां बैलट पेपर से चुनाव क्यों करवाना चाहती हैं| बैलट पेपर से हुए चुनावों ने कई पुरानी यादें ताज़ा कर दीं| जब बैलट बॉक्स लूट लिए जाते थे, बदल दिए जाते थे, बैलट पेपर जला दिए जाते थे| बंगाल के पंचायत चुनावों में यह सब दुबारा देखने को मिला, जैसे कोई पुरानी फिल्म दुबारा दिखाई जा रही हो| उसी तरह बैलट बॉक्स लूटे गए, बदले गए और उसी तरह बैलट पेपर जलाए गए| ढेरों सबूत हर जिले में दिखाई दिए| कई दशकों तक इसी तरह कांग्रेस चुनाव जीता करती थी, फिर बिहार और यूपी में लालू और मुलायम इसी तरह जीतने लगे| बंगाल में आतंक और हिंसा के सहारे कई दशकों तक कम्युनिस्ट राज करते रहे। अब तृणमूल कांग्रेस भी वही कर रही है|

सिर्फ दो महीने पहले की बात है| दिल्ली में शरद पवार के घर पर विपक्षी दलों की एक बैठक हुई थी, बैठक में कांग्रेस की ओर से दिग्विजय सिंह गए थे| बैठक खत्म होने के बाद दिग्विजय सिंह ने बताया था कि बैठक में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीने बंद करके बैलट पेपर से चुनाव करवाने की मांग पर सहमति बनी है, इस संबंध में चुनाव आयोग को ज्ञापन दिया जाएगा| ममता बनर्जी ने बैलट पेपर से पंचायत चुनाव करवा कर साबित कर दिया कि यदि बैलट पेपर से चुनाव हों, तो भाजपा को किस तरह से हराया जा सकता है|
विपक्ष के सभी नेता पिछले 8-9 साल से लोकतंत्र को खतरे की बात कह रहे हैं। बंगाल के चुनाव हर बार उनकी बात को सही साबित कर रहे हैं| पंचायत चुनावों में जो कुछ हुआ, उसे लेकर कांग्रेस भी चिंतित है और वामपंथी दल भी| बंगाल में कम्युनिस्टों ने लोकतंत्र को जिस तरह लाठी से हांका, उसी तरह 11-12 साल से अब तृणमूल कांग्रेस लोकतंत्र को हांक रही है|

पंचायत चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के सामने एक तरफ कांग्रेस और कम्युनिस्ट थे, तो दूसरी तरफ भाजपा थी| एक तरफ से तिकोना मुकाबला था| चुनाव के बाद कांग्रेस और कम्युनिस्ट दोनों कह रहे हैं कि ममता बनर्जी ने गुंडागर्दी से चुनाव जीता| पर वे वहां लोकतंत्र को खतरे में नहीं बता रहे, जिस तरह भाजपा बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने या कम से कम 355 लगाने की मांग कर रही है, वैसे कांग्रेस और कम्युनिस्ट नहीं कर रहे|
बंगाल चुनावों में 45 लोगों की हत्या के बावजूद वे सब एनजीओ भी राष्ट्रपति शासन की मांग नहीं कर रहे, जो मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग कर रहे हैं| ममता बनर्जी खुद मणिपुर में राष्ट्रपति शासन की मांग कर रही है, क्योंकि उनके अनुसार वहां क़ानून का राज स्थापित नहीं हो रहा| लेकिन बंगाल में वह खुद लाशों पर जीत का जश्न मना रही हैं|
चुनाव नतीजों का एक दूसरा पहलू भी है, जो कांग्रेस और कम्युनिस्टों के लिए चिंता की बात होना चाहिए| कांग्रेस और कम्युनिस्टों के साथ गठबंधन में एक तीसरी पार्टी भी थी, इंडियन सेक्यूलर फ्रंट| जिस तरह हैदराबाद की आल इंडिया मजलिस-ए-इतेहादुल मुसलमीन, असम की आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट, केरल की मुस्लिम लीग और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया आदि मुस्लिम पार्टियां हैं, उसी तरह पिछले विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी से नाराज चल रहे मुसलमानों ने पश्चिम बंगाल के एक इलाके में इंडियन सेक्यूलर फ्रंट का गठन किया था|
2021 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दकी ने इसका गठन किया था| फुरफुरा शरीफ में हजरत अबु बकर सिद्दीकी की दरगाह बंगाली मुसलमानों में पवित्र मानी जाती है| मुसलमान अजमेर शरीफ के बाद इस दरगाह को मानते हैं| वैसे तो आईएसएफ ने 2021 के विधानसभा चुनावों में 38 उम्मीदवार खड़े किए थे, लेकिन सिर्फ अब्बास सिद्दकी का भाई नौशाद सिद्दकी ही जीता| आप हैरान होंगे कि वोटिंग वाले दिन जो 20 लोग मारे गए थे, उनमें से 15 मुसलमान थे| बंगाल में हिन्दुओं के बाद अब मुसलमान तृणमूल कांग्रेस की हिंसा का शिकार हो रहे हैं, क्योंकि हिन्दुओं के बाद अब मुसलमानों का भी ममता से मोहभंग हो रहा है|
पंचायत चुनावों से पहले मुस्लिम बहुल सागरदीघी विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस का उम्मीदवार हार गया था और कांग्रेस का उम्मीदवार जीत गया था| यह अलग बात है कि कांग्रेस के उम्मीदवार ने चुनाव जीतने के बाद तृणमूल कांग्रेस ज्वाइन कर ली थी| सागरदीघी में हार को खतरनाक संकेत मानते हुए ममता बनर्जी अब कांग्रेस से गठजोड़ करना चाहती हैं|
सागरदीघी चुनाव के बाद कर्नाटक चुनावों ने भी संदेश दिया कि 1992 के बाद से दूसरे राजनीतिक दलों में बिखर चुका मुस्लिम वोट कांग्रेस की तरफ लौटने लगा है| आने वाले दिनों में अगर हिन्दू वोट भाजपा की तरफ ज्यादा जाता है और मुस्लिम वोट कांग्रेस की तरफ चला जाता है, तो यह ममता बनर्जी के लिए खतरे की वजह हो सकता है| सागरदीघी और कर्नाटक के बाद ही ममता विपक्षी एकता में शामिल होने को तैयार हुई, नहीं तो उससे पहले गैर कांग्रेस गैर कम्युनिस्ट तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश कर रही थीं|
तीसरा मोर्चा बनाने के लिए उन्होंने हैदराबाद, पटना, मुम्बई, लखनऊ और दिल्ली की यात्राएं करके गैर भाजपा, गैर कांग्रेस दलों के नेताओं से मुलाक़ातें भी की थीं| अब वह सिर्फ कम्युनिस्टों से गठबंधन नहीं करना चाहती, हालांकि पटना में विपक्षी दलों की उस बैठक में शामिल हुई थीं, जिसमें कम्युनिस्ट भी शामिल थे| वह 17 जुलाई को बेंगलुरु भी जाएँगी और अगली बैठक के लिए कोलकाता आने का न्योता भी दे सकती हैं|
देखना होगा कि बंगाल पंचायत चुनावों की हिंसा के बाद बेंगलुरु बैठक में ममता बनर्जी या कोई और नेता वोटिंग मशीनों की बजाए बैलट पेपर से चुनाव करवाने की मांग का प्रस्ताव रखेंगे, जैसा कि शरद पवार के घर पर हुई बैठक में प्रस्ताव पास किया गया था|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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