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West Bengal Elections: पश्चिम बंगाल में चुनावों का अनिवार्य हिस्सा क्यों हो गयी है हिंसा?

West Bengal Elections: पिछले कई दशकों से पश्चिम बंगाल की राजनीति हिंसक होती जा रही है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में चुनावी हिंसा की जड़ें इतनी गहरे बैठ गई हैं कि शांतिपूर्ण चुनाव करवाना ही संभव नहीं हो रहा है। पश्चिम बंगाल का राजनीतिक इतिहास बताता है कि जब-जब सत्तारूढ़ पार्टी को विपक्ष से कड़ी चुनौती मिलती है, चुनावी हिंसा में बढ़ोतरी होती है। चाहे वह वाम मोर्च के सत्ता में रहते पहले कांग्रेस से टकराव हो या फिर बाद में तृणमूल कांग्रेस से।

अब जब पश्चिम बंगाल में भाजपा मजबूती से उभर रही है और कांग्रेस-सीपीएम गठजोड़ अपनी खोई जमीन वापस पाने का प्रयास कर रहे हैं तब इतिहास खुद को दोहराता नजर आ रहा है। 2018 के पंचायत चुनाव में अधिकांश सीटों पर तृणमूल कांग्रेस का निर्विरोध जीतना हिंसा के कारण ही संभव हुआ था। 2021 विधानसभा चुनाव में हुई हिंसा पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच करने का आदेश दिया था।

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इस बार बंगाल पंचायत चुनाव में प्रमुख रूप से सात जिलों मुर्शिदाबाद, कूचबिहार, दक्षिण दिनाजपुर, मालदा, पूर्व बर्दवान, नादिया और दक्षिण 24 परगना में मतदान के दिन हिंसा, आगजनी, फर्जी मतदान और बूथ कैप्चरिंग का जो नजारा देखने को मिला उसने साल 2018 में हुई पंचायत चुनावी हिंसा को भी पीछे छोड़ दिया है। इसी हिंसा के बीच हुए पंचायत चुनाव में शनिवार को 80.71 प्रतिशत मतदान हुआ। ये 2018 के 82.15 प्रतिशत से थोड़ा कम है। हिंसा को देखते हुए 697 बूथों पर पुनर्मतदान का आदेश भी दिया गया है।

बहरहाल, पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव में जमकर हुई हिंसा ने केन्द्र और राज्य सरकार को एक बार फिर आमने सामने खड़ा कर दिया है। केन्द्र सरकार की हिंसा रोकने की तमाम कोशिशों के बाद भी नामांकन भरने के दिन से लेकर मतदान के दिन तक 32 लोग मारे गए। वही बंगाल के गवर्नर सीवी आनंद बोस ने रविवार को कानून व्यवस्था और हालात का जायजा लेने के बाद कहा कि चुनाव में जो हिंसा हुई है, वह बेहद परेशान करने वाली है। बंगाल के गवर्नर हालात की जानकारी गृह मंत्री को देने दिल्ली पहुच गए हैं।

गृह मत्रांलय ने राज्य सरकार से हिंसा को लेकर रिपोर्ट मांगी है। वही टीएमसी ने पूछा है कि हिंसा के वक्त केन्द्रीय बल कहां थे? केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने देर रात साफ कर दिया कि उनके तैनाती वाले बूथों पर कोई हिंसा नहीं हुई। गृह मंत्रालय का आरोप है कि राज्य चुनाव आयोग ने संवदेनशील बूथों पर केन्द्रीय सुरक्षा एजेंसियों को तैनात ही नहीं किया। केन्द्रीय गृह मंत्रालय का कहना है कि राज्य चुनाव आयोग ने केन्द्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती के लिए देर से डिमांड भेजी जिसके कारण 822 कंपनियों की बजाय 649 कंपनिया ही भेजी जा सकी। विपक्ष का आरोप है कि 1.70 लाख से ज्यादा पुलिस कर्मियों की तैनाती में भी राज्य सरकार ने भेदभाव किया जिसके कारण हिंसा पर नियंत्रण नहीं रहा।

लोकसभा चुनाव के ठीक 9 महीने पहले हुए इस पंचायत चुनाव में प्रदेश में राज कर रही तृणमूल कांग्रेस, विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा और अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रही कांग्रेस और वामदलों के लिए लोकसभा चुनाव की तैयारी के रूप में देखा जा रहा था। भाजपा ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लोकसभा चुनाव के तर्ज पर लिया और अपनी पूरी ताकत झोंक दी। प्रदेश संगठन से लगातार अमित शाह संपर्क में रहे। भाजपा ने इसे कितना गंभीरता से लिया इसका इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पंचायत चुनाव बंगाल में थे लेकिन उसकी पूरी रणनीति दिल्ली में बनी।

इस बार भाजपा जहां सबसे ज्यादा सीटें जीतने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है, वही सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने अपने विधायकों और सांसदों से साफ कह दिया था कि उनके क्षेत्र में तृणमूल का प्रदर्शन आने वाले चुनाव में उनके टिकट का सबसे बड़ा पैमाना होगा। ममता बनर्जी ने खुद प्रचार अभियान की कमान संभाली और अपने सभी सांसदों, मंत्रियों और विधायकों को मैदान में उतार दिया था।

ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद के चुनाव के लिए दाखिल किए गए नामांकन में राज्य में सरकार चला रही तृणमूल कांग्रेस सबसे आगे रही। 22 जिलों की 63,229 ग्राम पंचायत सीटों के लिए सबसे ज्यादा टीएमसी के 61,591 उम्मीदवारों ने पर्चा भरा जो करीब 97 प्रतिशत है। दूूसरे नंबर पर भाजपा है जिसने 60 प्रतिशत सीटों पर 38,475 उम्मीदवार उतारे। सीपीआईएम ने 56 प्रतिशत सीटों पर 35,411 प्रत्याशी उतारे। हालांकि ग्राम पंचायत में प्रत्याशियों के मामले में कांग्रेस निर्दलीय उम्मीदवारों से भी पीछे रह गई, जहां 16,335 निर्दलीय ने नामांकन भरा है जबकि कांग्रेस की ओर से 11,774 नामांकन दाखिल हुए।

पंचायत समिति की कुल 9,730 सीटों के लिए टीएमसी ने 9419, भाजपा ने 7032, सीपीआईएम ने 6572, निर्दलीय ने 3935 और कांग्रेस ने 2197 उम्मीदवार उतारे। इसी तरह जिला परिषद की कुल 928 सीटों के लिए टीएमसी ने 928, भाजपा ने 897, सीपीआईएम ने 747, निर्दलीय 518 और कांग्रेस ने 644 उम्मीदवार मैदान में उतारे। बंगाल की कुछ सीटों पर कांग्रेस सीपीएम ने एक दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारे। इसी तरह आम आदमी पार्टी ने भी टीएमसी के हाथ मजबूत करने के लिए उम्मीदवार नहीं उतारे।

इस बार के पंचायत चुनाव में चुनाव से पहले ही तृणमूल कांग्रेस को एक तरह से तगड़ा झटका लगा है। इस बार टीएमसी के 12 प्रतिशत उम्मीदवार ही निर्विरोध चुने गए, जबकि 2018 के पंचायत चुनाव में टीमएसी के 34 प्रतिशत प्रत्याशी निर्विरोध चुने गये थे। पिछले पांच साल मे पंचायत चुनाव में निर्विरोध टीएमसी को मिलने वाली सीटों में 22 प्रतिशत की गिरावट हुई है। 2018 में तृणमूल कांग्रेस ने ज्यादातर निर्विरोध सीटें बीरभूम, मुर्शिदाबाद, बांकुडा और दक्षिण 24 परगना से जीती थी और इन क्षेत्रों में ही सबसे ज्यादा हिंसा हुई थी। हिंसा का एक बड़ा कारण तृणमूल को मिली ये चुनौती भी है।

भाजपा इस बार तृणमूल कांग्रेस को तगड़ी चुनौती देने की स्थिति में है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मदद से और अपने खुद के संगठन के दम पर भाजपा ने पं बंगाल में अपने संगठन को मजबूत करने के साथ पश्चिम बंगाल के हर जिले में पहुंचा दिया है। आज से दस साल पहले 2013 के बंगाल पंचायत चुनाव में भाजपा सिर्फ 18 प्रतिशत सीटों पर ही उम्मीदवार उतार सकी थी और भाजपा का खाता भी नहीं खुला था। वही पांच साल बाद 2018 के पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव में भाजपा ने कुल 48 प्रतिशत सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और पंचायत में 5500 सीटों पर भाजपा जीती थी।

भाजपा 18 प्रतिशत वोट हासिल करके मुख्य विपक्षी पार्टी बनकर उभरी थी। 2018 के भाजपा के 18 प्रतिशत वोट के मुकाबले कभी पश्चिम बंगाल की ताकत रहे वाममोर्चा को 4.5 प्रतिशत और कांग्रेस को 3.3 प्रतिशत वोट मिलें। 2018 में पुरूलिया में भाजपा ने बेहद शानदार प्रदर्शन किया था। पुरूलिया क्षेत्र में भाजपा को 602 सीटें मिली थी और तृणमूल कांग्रेस को 726 सीटें मिली थी। पुरूलिया पंचायत चुनाव में भाजपा के शानदार प्रदर्शन के बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह दिल्ली से विशेष रूप से पुरूलिया जनता का धन्यवाद अदा करने गये थे। 2018 में भाजपा के अच्छे प्रदर्शन के पीछे कांग्रेस और वाम दलों के सिकुड़ते जनाधार को प्रमुख कारण माना गया था। वाम और कांग्रेस का एक बड़ा वोट बैक भाजपा की और शिफ्ट हो गया था।

लेकिन 34 साल तक बंगाल में राज करने वाली सीपीएम इस पंचायत चुनाव में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कर रही है। ग्रामीण इलाकों में मजबूत हो रही भाजपा को सीपीएम कड़ी चुनौती दे सकती है। अभी बंगाल में सीपीएम का ना कोई विधायक है और न सांसद, लेकिन वामदल फिर से अपने कैडर को वापस लाने में सफल हो रहे हैं। मुर्शिदाबाद जिले की एक सीट पर बीते मार्च में हुए उपचुनाव में कांग्रेस सीपीएम गठजोड़ उम्मीदवार की जीत ने सीपीएम की उम्मीदों को जगा दिया है।

फिलहाल भाजपा 10 जिलों में मजबूत विपक्ष के तौर पर नजर आ रही है, तो 10 पर सीपीएम कांग्रेस गठजोड़ मजबूत दिख रहा है। उत्तर और दक्षिण 24 परगना जिले में सीपीएम तृणमूल से बेहद मजबूत है। बहरहाल हिंसा और बूथों की लूटपाट के बीच संपन्न हुए पंचायत चुनाव के बाद बंगाल भाजपा ने जहां राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है वहीं कांग्रेस ने हिंसा के खिलाफ कोर्ट जाने की घोषणा की है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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