Cooperatives: सहकारिता से बढ़ सकती है समृद्धि
Cooperatives: हाल ही में केंद्र सरकार ने "सहकारिता के क्षेत्र में विश्व की सबसे बड़ी अन्न भंडारण योजना" के लिए एक अंतर-मंत्रालयी समिति के गठन को मंजूरी दी है। यह पहल केन्द्र सरकार की उस नीति का हिस्सा है जिसके तहत 02 सितंबर, 2022 को "सहकार से समृद्धि" विज़न को साकार करने के लिए एक समिति का गठन किया गया था। इस समिति को सहकारिता पर नई राष्ट्रीय नीति तैयार करने का काम दिया गया था। समिति के सदस्यों ने सहकारिता से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में काम किया है। "सहकार से समृद्धि" के दृष्टिकोण को साकार करने, देश में सहकारी आंदोलन को मजबूत करने, जमीनी स्तर तक इसकी पहुंच को गहरा करने और सहकारी समितियों के प्रदर्शन, उत्पादकता और लाभप्रदता को बढ़ाने के लिए, सहकारिता मंत्रालय द्वारा भी विभिन्न पहल की गई हैं।
विगत 25 जुलाई 2023 को प्रेस रिलीज के माध्यम से जो जानकारी मंत्रालय ने दी उसके अनुसार प्राथमिक सहकारी समितियों को पारदर्शी और आर्थिक रूप से जीवंत बनाने के लिए 14 पहल, शहरी और ग्रामीण सहकारी बैंकों को मजबूत बनाने के लिए 9 पहल, आयकर अधिनियम में सहकारी समितियों को राहत देने के लिए 6 पहल, सहकारी चीनी मिलों के पुनरुद्धार के लिए 4 पहल, राष्ट्रीय स्तर पर तीन नई बहु-राज्य सोसायटी बनाने के लिए 3 पहल, सहकारी समितियों में क्षमता निर्माण के लिए 3 पहल, 'व्यवसाय करने में आसानी' के लिए सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग के सम्बन्ध में 2 पहल की गयी है।

इसके अलावा प्रामाणिक और अद्यतन डेटा भंडार के लिए नया राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस, नई राष्ट्रीय सहकारी नीति का निर्माण, बहु-राज्य सहकारी सोसायटी (संशोधन) विधेयक 2022, जेम पोर्टल पर सहकारी समितियों को 'खरीदार' के रूप में शामिल करना, राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम का विस्तार, कृषि और ग्रामीण विकास बैंकों (एआरडीबी) का कम्प्यूटरीकरण, सहारा ग्रुप ऑफ सोसाइटीज के निवेशकों को रिफंड जैसी अन्य कई पहल भी की गई हैं। पहल के तहत प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पीएसीएस) परियोजना का कम्प्यूटरीकरण भी किया गया है।
सहकारी नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में सहकारिता मंत्रालय द्वारा राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेश के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से नियमित बैठकें आयोजित की जाती हैं। यदि कोई फीडबैक हो तो उसका विश्लेषण कर सुधार किया जाता है। मंत्रालय द्वारा शीर्ष से लेकर जिला सहकारी रजिस्ट्रार के स्तर तक विभिन्न स्तरों पर राज्य सरकारों को नियमित संचार भी स्थापित किया जाता है। इसके अलावा, भारत सरकार के अन्य मंत्रालयों के साथ उनकी योजनाओं को लागू करने हेतु समन्वय और कठिनाइयों को दूर करने के लिए बैठकें आयोजित की जाती हैं ताकि सहकारी समितियों के प्रदर्शन, उत्पादकता और लाभप्रदता को बढ़ाया जा सके।
यह तो हुआ सरकार के स्तर पर सहकार से समृद्धि का प्रयास। अब समाज की बात करें तो भारतीय समाज सहजीवन और सहअस्तित्व में विश्वास करता है जिसका प्रबंधित स्वरुप ही है सहकारिता। भारत के दक्षिण या पश्चिम के राज्य अगर पूरब के राज्य से समृद्ध हैं तो इसमें सहकारिता का बड़ा योगदान है।
भारत में वैसे तो त्रिस्तरीय शासन व्यवस्था का प्रावधान है, लेकिन अगर आप पश्चिम के राज्य गुजरात, महाराष्ट्र एवं दक्षिण के राज्य कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना एवं केरल का अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि वहां चार स्तर की व्यवस्था है। केंद्र सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय निकाय एवं सहकारी समितियां। इन राज्यों में सहकारी समितियां चौथी ईकाई के रूप में काम करती हैं। इसीलिए इन राज्यों का विकास, जीवन स्तर, रहन सहन और नागरिक सुरक्षा का स्तर ऊँचा है।
इसमें जो सबसे महत्वपूर्ण पहलू है वह यह है कि पश्चिम एवं दक्षिण के राज्यों में सहकारिता वहां के जनजीवन में स्वीकार्य और समावेशित है। वहां हर चीज आपको व्यवस्थित और सुसज्जित मिलेगी। सामान्यतया लोग सहकारी व्यवस्था के नियमों को स्वीकारते और पालन करते हुए मिलेंगे। यदि कभी नियम भंग हो जाता है तो कानून भी सहकारी व्यवस्था के साथ मजबूती से लागू होता है।
वहां निवास, औद्योगिक उत्पादन या फिर कृषि में सहकारी समिति बनी हुई है। प्रत्येक वर्ष इन समितियों का चुनाव होता है। देश और राज्य के संगत कानूनों से मेल खाता इनका कानून होता है और यह प्रति वर्ष चुनी गई समिति ही उस आवासीय परिसर, कारखाने या खेत की बसावट का पूरा रखरखाव एवं ख्याल रखती है, जिससे बाकी सदस्य आराम से अपना कार्य एवं जीवन यापन कर सकें। चूँकि प्रतिवर्ष चुनाव होते हैं तो जिम्मेदारी भी बंटती जाती है। सहकारिता इन राज्यों के जनमानस के रग रग में बसी है।
लेकिन उत्तर भारत में इसका अभाव दिखता है। दिल्ली में भी रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) बनाये गए लेकिन वो भी सहकारिता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं। पश्चिम और दक्षिण के शहरों में सोसायटी कल्चर होने से जहां सामूहिकता में एक दूसरे का हित साधने का भाव होता है वहीं उत्तर में व्यक्तिगत मकान बनाने से व्यक्तिगत वैमनस्य ही दिखाई देता है। उनके मोहल्ला कल्चर में वो सुरक्षा, स्वच्छता और सामूहिकता नहीं होती जो दक्षिण और पश्चिम के शहरों के सोसायटी कल्चर में दिखाई देती है।
अगर उत्तर के अन्य राज्यों को विकसित होना है तो वहां के लोगों को सहकारिता के मॉडल को अपनी जीवनचर्या में, अपनी मानसिकता में और अपने कार्यक्षेत्र में उतारना पड़ेगा और स्वीकार करना पड़ेगा। तभी जाकर वह निश्चिंत हो पाएंगे, उनका परिवार सुरक्षित हो पायेगा और उनकी संताने सुव्यवस्था के प्रति जिम्मेदार बन पाएंगी।
आवास और व्यवसाय के अलावा उत्तर के राज्यों में कृषि भी व्यक्तिगत ही है। छोटी जोत होने के बावजूद लोग सामूहिक या सहकारी खेती नहीं कर पाते हैं। इससे लागत भी अधिक आती है और लाभ भी नहीं मिल पाता है। यदि इसकी जगह वह सहकारिता को अपना ले तो इसके माध्यम से ना केवल उनकी कृषि लागत कम हो जाएगी वरन बाजार में एक बड़े आपूर्तिकर्ता के रूप में वे स्थापित हो जाएंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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