क्या वाल्मिकी रामायण के अनुसार विवाह के समय सीता की उम्र छ: वर्ष थी?
हाल में मुसलमानों के पैगंबर की शादी को लेकर उठे विवाद के बाद मुसलमानों ने यह कहना शुरु कर दिया कि सीता का विवाह भी छह साल की उम्र में हुआ था। अभी तेलंगाना के विधायक टी राजा अपने जिस वीडियो के कारण गिरफ्तार हुए थे, उस वीडियो में भी वह एक मौलाना द्वारा सीता पर लगाये गये ऐसे ही आरोप का जवाब दे रहे थे। इस पर मुसलमान एक बार फिर भड़क गये और उन्होंने हैदराबाद में हंगामा कर दिया।

मुसलमानों और उनके हितैषियों ने अब जगह जगह ये कहना शुरु कर दिया है कि सीता का विवाह भी छह साल में हुआ था। इसके लिए वो वाल्मिकी रामायण का उल्लेख करते हैं। आइये देखते हैं कि क्या सचमुच सीता का विवाह छह साल की उम्र में हुआ था? क्या इसका उल्लेख वाल्मिकी रामायण में आता है?
समाज के सामने जब भी कोई श्रेष्ठ मानवीय प्रतिमान रखना होता है तो लोग रामायण की बात करते हैं। रामायण का तात्पर्य उन सर्वोत्तम मानवीय मूल्यों से हैं, जिसकी आज मानव समाज को सर्वाधिक आवश्यकता है। यह बात सप्रमाण कही जा सकती है कि विश्व के किसी भी कोने और भाषा तथा संप्रदाय के पास रामायण जैसा ग्रंथ नहीं है। पर इन दिनों यह बात बिना किसी विचार के साथ उठाई जा रही है कि विवाह के समय भगवान श्रीराम और माता सीता की अवस्था यानी आयु कितनी थी? यह सवाल जब-तब उठता ही रहता है। इस विषय में अनेक विद्वानों ने अनेक बातें कही हैं, जिनका सार यही है कि माता सीता अपने विवाह के समय आज के शब्दों में वयस्क थी। लेकिन इस बातों के बीच पहले यह जानना जरूरी है कि हिंदू धर्म में विवाह का तात्पर्य क्या है?
संसार की सबसे पुरानी पुस्तक ऋग्वेद (10/85/36) की बात की जाए तो उसके अनुसार विवाह का उद्देश्य है गृहस्थ होकर देवों के लिए यज्ञ करना तथा संतानोत्पत्ति करना। वेदों में स्त्री को 'जाया' कहा गया है, क्योंकि पति ने पत्नी के गर्भ से स्वयं ही पुत्र के रूप में जन्म लिया है। ऐतरेय ब्राह्मण (33/1) का कहना है कि पत्नी पति की अर्धांगिनी है, अत: जब तक व्यक्ति विवाह करके संतानोत्पत्ति नहीं करता, वह पूर्ण नहीं है। स्पष्ट है कि धर्म संपत्ति, संतान और रति (यौन तथा अन्य स्वाभाविक आनंदोत्पत्ति) ये तीन विवाह-सम्बन्धी प्रमुख उद्देश्य स्मृतियों एवं निबंधों ने माने हैं।
भारद्वाज-गृह्यसूत्र (1/11) के मतानुसार विवाह करते समय कन्या की चार बातें देखनी चाहिए - धन, सौंदर्य, बुद्धि एवं कुल। कन्या वर से अवस्था में छोटी होनी चाहिए। गौतम, वसिष्ठ एवं याज्ञवल्क्य ने लिखा है कि अक्षतयोनि (जिसका कौमार्य भंग नहीं हुआ हो) कन्या से विवाह करना चाहिए। सीधी बात यह है कि विवाह-संस्कार का महत्त्व था दो व्यक्तियों को आत्मनिग्रह, आत्म-त्याग एवं परस्पर सहयोग की भूमि पर लाकर समाज को चलते जाने देना।
धर्मशास्त्र की बात की जाए तो वहां भी दस वर्ष तक की बालिका को कन्या और सोलह वर्ष तक की बालिका को बाला कहा गया है। कुछ ग्रंथों का मत है कि 16 वर्ष की आयु तक स्त्री कन्या होती है। वहीं अनेक धर्मशास्त्रीय ग्रंथों की मान्यता है कि जब तक विवाह न हो जाए, अविवाहिता स्त्री कन्या होती है। कन्या को लेकर शास्त्रों और शास्त्रकारों के अलग अलग मत हैं। ऐसे में निश्चित तौर पर ये नहीं कहा जा सकता कि कन्या का अर्थ दस वर्ष से छोटी बालिका ही होती है। अविवाहित बालिका भी कन्या होती है, भले ही उसकी उम्र इससे अधिक हो। इसीलिए भारतीय समाज में लड़की के विवाह के लिए कन्यादान शब्द प्रचलन में है। विवाह तो रजस्वला लड़की का ही होता है, तब भी उसके विवाह को कन्यादान इसलिए कहा जाता है क्योंकि अविवाहित लड़कियां कन्या ही होती हैं।
श्रीराम और सीता के विवाह की बात से पहले बात करते हैं महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण की। रामायण विभिन्न भाषाओं में लिखी सारी रामकथाओं की आधार-ग्रंथ है। प्राय: लोग रामायण (अरण्यकाण्ड 7/10-11) के अनुसार वे राम एवं सीता की विवाह के समय अवस्थाएं क्रमश: 13 एवं 6 वर्ष की बता डालते हैं। परंतु सारे प्रामाणिक विद्वानों के मत से रामायण के नाम से चलाई गई यह बात प्रक्षिप्त यानी झूठी है, क्योंकि बालकांड में श्रीराम के विवाह के बाद के श्लोकों (77/14-15) में आया है कि सीता तथा उनकी अन्य तीन बहनें विवाह के बाद ही अपने पतियों के साथ 'एकांत' में रहने लगी थी - रेमिरे मुदिता: सर्वा भर्तृभि: सहिता रह:। यहां 'एकांत' में रहने से स्पष्ट है कि सीता विवाह के समय छह वर्षीया बालिका नहीं हो सकती।
दूसरी बात है कि सीता का विवाह स्वयंवर पर आधारित था। सीता के लिए स्वयंवरा (स्वयं वरण करने वाली) या पतिंवरा शब्द प्रयुक्त हुआ हैं। स्वयंवर में वर चुनने की स्वतंत्रता लड़की के पास होती है। विवाहार्थी पुरुष को कन्या के आगे नुमाइश की तरह पेश होना है। कन्या द्वारा खारिज किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराने का अधिकार भी पुरुषों को नहीं है। वर शब्द का अर्थ ही होता है - ʻचुना गयाʼ। ऐसे में क्या छह साल की सीता अपने लिए स्वयंवर में वर चुन रही थी? वह एक वयस्क युवती थी, जो यह जानती थी कि शिव धनुष तोड़ने का सामर्थ्य कौन रखता है और वह कौन है। स्पष्ट है कि सीता का विवाह स्वयंवर की परिणति थी और विवाह के समय सीता यह विवेक प्राप्त कर चुकी थी कि उन्हें अपनी वरमाला से किसे चुनना है। सीता ने धनुर्भंग के बाद राम का वरण किया था। स्पष्ट है राम और सीता, दोनों पूरी तरह से परिपक़्व युवा थे।
एक बात और रहस्य की है कि वन में ऋषिपत्नी अनसूया ने जब माता सीता से स्वयं के बारे में बताने को कहा तो उन्होंने खुद के लिए एक विशेष शब्द का प्रयोग किया। यह शब्द है - 'पतिसंयोगसुलभा' अर्थात पति से संयोग के लिए समर्थ। ऐसे में रामायण के इस शब्द से समझा जा सकता है कि अनसूया को यह बात बताने वाली सीता अपने विवाह से समय परिपक्व थी नाबालिग नहीं।
गोस्वामी तुलसीदास की 'रामचरितमानस' में तो श्रीराम से पुष्प वाटिका में मिलने से पूर्व सीता सखियों के साथ गौरी मंदिर जाती है और माता पार्वती से योग्य पति के लिए प्रार्थना करती है। माता सीता के अकथनीय स्वरूप को देखकर श्रीराम का यह कथन 'मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही' बता रहा है कि उस समय तक श्रीराम अपने तरुणावस्था को पा चुके हैं और किसी बालिका को नहीं बल्कि युवती को देख रहे हैं। यहां तक कि अयोध्या आए महर्षि विश्वामित्र को महाराज दशरथ कहते हैं - "राम तो अभी सोलहवें साल में चल रहा है, यह भयंकर राक्षसों से कैसे लड़ेगा?" इस हिसाब से मिथिला जाने तक राम 16 साल की आयु पूरी कर चुके थे।
जिन लोगों को राम और सीता के विवाह की आयु के बहाने हिंदू संस्कृति और परंपराओं का उपहास करना है, उनकी समस्या सीता और राम का विवाह नहीं, बल्कि कुछ ओर है। हिंदू-विरोध की दुर्वासना उन्हें इस स्तर तक गिरा देती है, यह सोचने का विषय है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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