कौन सा कारण है जो कांग्रेस को घुन की तरह खाये जा रहा है?
कांग्रेस की हालत उस ज्वालामुखीय क्षेत्र जैसी हो गई है, जिसकी धरती रह-रह कर फटती रहती है और वहां के बाशिंदे आए दिन हलकान होते रहते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 में सत्ता गंवाने के बाद 400 से ज्यादा नेता कांग्रेस पार्टी छोड़ चुके हैं।

दो साल पहले तक पार्टी में हताश-निराश और असंतुष्ट नेताओं की फौज कितनी बड़ी हो चुकी थी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक-दो नहीं, 23 बड़े नेताओं ने मिलकर पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखी और संगठनात्मक चुनाव कराने की मांग की। लेकिन उस वक्त इन 23 नेताओं में से अनेक को बीजेपी का एजेंट कहा गया। नतीजा यह हुआ कि इनमें से कपिल सिब्बल, जितिन प्रसाद और योगानंद शास्त्री के बाद अब गुलाम नबी आजाद ने भी पार्टी छोड़ दी है, जबकि मनीष तिवारी, आनंद शर्मा, पृथ्वीराज चौहान और अन्य भी कई नेता ताल ठोंक रहे हैं।
इनके अलावा हिमंत विश्व शर्मा, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कैप्टन अमरिंदर सिंह, आरपीएन सिंह, सुनील जाखड़, अश्विनी कुमार, कुलदीप विश्नोई, हार्दिक पटेल, प्रियंका चतुर्वेदी और जयवीर शेरगिल समेत पार्टी छोड़ने वाले नेताओं की एक लंबी फेहरिस्त है। सवाल है कि वे कौन से कारण हैं, जो पार्टी को घुन की तरह खाए जा रहे हैं। गुलाम नबी आजाद ने तो अपनी चिट्ठी में सीधे राहुल गांधी पर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि ''बीते आठ वर्षो में कांग्रेस नेतृत्व ने एक ऐसे व्यक्ति को पार्टी पर थोपने का प्रयास किया, जो बिल्कुल भी गंभीर नहीं था।'' आजाद के मुताबिक, देश की सबसे पुरानी पार्टी समग्र रूप से नष्ट हो चुकी है और आंतरिक चुनाव के नाम पर इसमें धोखा किया जा रहा है।
गुलाम नबी आज़ाद के मुताबिक, राहुल गांधी का व्यवहार अपरिपक्व और बचकाना है, जबकि उनके सुरक्षा गार्ड और निजी सहायक तक पार्टी के फैसलों में दखल देने लगे हैं। आजाद की बातों की पुष्टि पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी के बयान से भी होती है, जो कहते हैं कि जिस व्यक्ति की हैसियत पार्षद का चुनाव लड़ने की नहीं है और जो कभी पार्टी नेताओं का चपरासी हुआ करता था, आज वह भी हमें ज्ञान देने लगा है।
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान भी पार्टी नेतृत्व पर सीधा हमला करते हुए कहते हैं कि पार्टी को कठपुतली अध्यक्ष की जरूरत नहीं है। पिछले 24 साल से पार्टी के अंदर संगठनात्मक चुनाव नहीं कराए गए हैं, इसलिए अब अध्यक्ष का निर्वाचन विधिवत होना चाहिए।
इस तरह देखा जाए तो कांग्रेस के भीतर यह सारा विद्रोह नेहरू-गांधी परिवार के खिलाफ ही सुलगा हुआ है, पार्टी भले इस कड़वी सच्चाई पर अब भी पर्दा डालने की कोशिश करे। दरअसल, लोकसभा चुनाव 2019 में करारी हार के बाद जब राहुल गांधी ने अध्यक्ष का पद छोड़ा, तब पार्टी के भीतर यह उम्मीद जगी कि नेहरू-गांधी परिवार अब शायद अन्य नेताओं को भी मौका देने के लिए तैयार है।
लेकिन बेटे की छोड़ी हुई कुर्सी पर जब फिर से मां सोनिया गांधी विराजमान हो गयीं, तो पार्टी में बगावत की सुगबुगाहट शुरू हो गई। लेकिन चूंकि सोनिया गांधी 'अंतरिम अध्यक्ष' बनी थीं, इसलिए नेताओं को लगा कि शायद पूर्णकालिक और सक्रिय अध्यक्ष के चुनाव के लिए सोनिया गांधी थोड़ा समय लेना चाहती हैं।
इसलिए कुछ समय और उन्होंने धीरज रखा। लेकिन जब उन्हें लगा कि चुनाव कराने के बजाय सोनिया गांधी "अंतरिम अध्यक्ष" के तौर पर एक्सटेंशन लेती जा रही हैं, तो बगावत तेज़ हो गई। एक तरफ बीमार हालत में भी सोनिया गांधी अध्यक्षी न छोड़ने के बहाने ढूंढ़ती रहीं। दूसरी तरफ, राहुल गांधी न तो खुलकर अध्यक्षी स्वीकार करने को तैयार हैं, न ही किसी अन्य दमदार नेता को अध्यक्ष बनाकर स्वतंत्र रूप से काम करने देने के लिए तैयार हैं।
इन दोनों के बीच में प्रियंका गांधी के आ जाने से कांग्रेस नेताओं के सामने और भी अजीब स्थिति पैदा हो गई। तीन-तीन नेताओं से तालमेल बिठाने में उन्हें परेशानी होने लगी। खासकर तब और भी ज्यादा, जबकि उनमें से एक लगातार बीमार चल रही हों और दो अपरिपक्व, बचकाने और तेज़-विहीन हैं। उन्हें महसूस होने लगा कि कांग्रेस नेतृत्व को आज पार्टी और लोकतंत्र की चिंता नहीं है, बल्कि केवल अपना ढहता हुआ किला बचाए रखने की चिंता है।
एक तो दिशाहीन वंशवादी नेतृत्व, ऊपर से नीतियों के स्तर भी दिवालियापन। इसके कारण जमीनी मुद्दों पर जनता के साथ संघर्ष करने की बजाय पार्टी नकारात्मक राजनीति अधिक करने लगी है। पिछले आठ साल में ऐसे कई उदाहरण दिये जा सकते हैं। जैसे- पार्टी ने गुजरात और हरियाणा सहित कई राज्यों में आरक्षण की मांग वाले जातीय और हिंसक आंदोलनों को शह दी। रोहित वेमुला आत्महत्या कांड जैसे मुद्दों और एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर दलितों के मन में विद्वेष पैदा करने की कोशिश की। फिर जब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया, तो अगड़ों को उकसाने की कोशिश की। यानी देश में जातीय तनाव पैदा करने के लिए डबल गेम खेला।
कर्नाटक में लिंगायतों को हिन्दुओं से अलग करने का सांप्रदायिक कार्ड खेला। सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर पर सुनवाई को लटकाए रखने के लिए हर संभव चालें चलीं, ताकि देश में सांप्रदायिक तनाव का एक मुद्दा अनंत काल तक कायम रहे। यूं हिन्दू जनभावनाओं की कद्र किए बिना हिन्दू वोटों के लिए मंदिर-मंदिर भटकने का उपक्रम खूब हो रहा। साथ ही, हिन्दुत्व पर ज्ञान भी खूब दिया जा रहा।
जेएनयू में एक राष्ट्रविरोधी घटना के अभियुक्तों का साथ दिया गया, जिसके कारण देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसी कई घटनाएं घटित हुईं। पीओके और बालाकोट में किए गए सर्जिकल स्ट्राइकों पर संदेह प्रकट करके सेना तक को राजनीति में घसीटने की कोशिशें की गईं।
संसद में खड़े होकर कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने का विरोध किया गया, जबकि यही संसद तीन मौकों पर हमारे वाले कश्मीर की कौन कहे, पीओके तक को भारत का अभिन्न अंग बताने वाले प्रस्ताव पारित कर चुकी थी। नागरिकता संशोधन कानून सीएए के मुद्दे पर भी देश के अल्पसंख्यकों को गुमराह किया गया, जबकि इस कानून से उनका दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था। परिणामस्वरूप दिल्ली को एक भयावह सांप्रदायिक दंगे की त्रासदी झेलनी पड़ी।
राफेल मामले में सनसनी पैदा करने के लिए राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट तक के नाम का मिथ्या इस्तेमाल किया, जिसके लिए बाद में उन्हें कोर्ट से माफी भी मांगनी पड़ी। जब भारत डोकलाम और गलवान में चीन की चालों का करारा जवाब दे रहा था, तब भी कांग्रेस ने असहयोगात्मक रवैया अपनाया। डोकलाम विवाद के समय राहुल गांधी की चीनी राजदूत से गुपचुप मुलाकात सुर्खियों में रही, जबकि गलवान विवाद पर बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में सोनिया गांधी के रुख से विपक्षी दल भी हैरान थे।
साफ है कि नेतृत्व-विहीन कांग्रेस जनभावनाओं को समझे बिना लगातार गलतियां करती चली जा रही है। इसी कारण देश के लोगों को अब उसकी नीयत पर भी भरोसा नहीं होता। पार्टी समझती है कि वह नरेंद्र मोदी या भाजपा की लकीर को छोटी करके फिर से लोगों के मन में अपने लिए समर्थन पैदा कर सकती है, लेकिन सच यह है कि एक सच्चे लोकतंत्र में किसी भी ज़िम्मेदार विपक्ष को हमेशा एक बड़ी लकीर खींचने के बारे में सोचना चाहिए।
कांग्रेस का सत्ता में वापसी का सपना अब तभी पूरा हो सकता है, जब पहले वह विपक्ष के रूप में अपनी भूमिका का सही निर्वाह करके दिखाए, लेकिन दुर्भाग्य यह कि वह इसमें भी लगातार फेल होती जा रही है। ऐसे में, यदि लोकसभा चुनाव 2024 से पहले पार्टी में भगदड़ और भी तेज़ हो जाए तो आश्चर्य नहीं।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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