Silkyara Tunnel: अंत भला तो भी सब नहीं भला
Silkyara Tunnel: आधुनिकतावादी मनुष्य जो पूरी तरह से यूरोप की औद्योगिक क्रांति की पैदावार है, वह प्रकृति की जटिल संरचना पर विजय पताका फहराने को अपना विकास समझता है। दुरुह और दुर्गम परिस्थितियों में तकनीकी कौशल और विकास के जरिए उस पर विजय प्राप्त कर लेना उसके लिए महान उपलब्धि है। लेकिन सिलक्यारा सुरंग में फंसे 41 कामगारों को निकालने में मानो इस सारी तकनीकी और साइंटिफिक समझ का अतिक्रमण हो गया।
वह आर्नाल्ड डिक्स जो टनल एक्सपर्ट के नाम पर ऑस्ट्रेलिया से बुलाये गये थे, वो आते ही बाबा बौखनाग की शरण में जाकर बैठ गये। बाबा बौखनाग का आनन फानन में जो अस्थाई मंदिर बनाया गया था, रोज वहां जाकर ध्यान पूजा करते। राहत एवं बचाव कार्य में जिस तरह के व्यवधान आ रहे थे उससे राहत पाने के लिए शायद वो बाबा बौखनाग से ही किसी चमत्कार की उम्मीद कर रहे थे। वो रोज पूजा अर्चना करने लगे तो देखादेखी वहां काम कर रहे भारत के पढ़े लिखे लोग भी काम शुरु करने से पहले बाबा बौखनाग का आशीर्वाद लेने लगे।

हमारा साइंटिफिक और बिजनेस माइंड सब काम देखादेखी ही करता है। उसका अपना आत्मविश्वास इतना कमजोर हो गया है कि उसे लगता ही नहीं कि भारत के अपने तरीके भी किसी काम के लिए हो सकते हैं। हम उसी को बेहतर मानने लगे हैं जिसका उद्गम यूरोप या अमेरिका में होता है। हम कौन हैं और प्रकृति, तकनीकी और विकास को देखने का हमारा अपना दृष्टिकोण क्या है, यह या तो हम जानते नहीं और जानते भी हैं तो उस पर हमें भरोसा नहीं रहा। हम यूरोप की औद्योगिक क्रांति से उपजी उसी मानसिकता के शिकार हो गये हैं, जो प्रकृति की पराजय में अपनी जय देखता है।
लेकिन आर्नाल्ड डिक्स जैसा कोई व्यक्ति जिसे हम चोटी का विशेषज्ञ मानते हैं, वह भारतीय तरीकों पर भरोसा जताता है तब अचानक से हमें याद आता है कि हमारे अपने पास भी कुछ है। सिलक्यारा सुरंग में जब सभी विदेशी तकनीकी और मानसिकता असफल हो गयी तब हमारे अपने पास जो है वही भारतीय मानसिकता और तकनीकी काम आयी। वह बहुप्रचारित अमेरिकन ऑगर मशीन जिससे सारी उम्मीदें लगाई गयी थी, वह बार बार असफल होती रही और उम्मीदों पर पानी फेरती रही। सिलक्यारा सुरंग में मानों पहाड़ हमें कुछ और ही संकेत दे रहा था कि जिसे तुम सर्वोच्च उपलब्धि मान बैठे हो वह यहां के लिए तुच्छ है।
इसी असफलता ने ही संभवत: बाबा बौखनाग के प्रति आस्था भी बढ़ाई जिनका मंदिर तोड़कर सुरंग की जमीन तैयार की गयी थी। हमारे यहां नारद भक्ति सूत्र में कहा गया है कि जब मनुष्य की तर्कबुद्धि खत्म होती है तब भक्ति का जन्म होता है और जब भक्ति का जन्म होता है तब संसार की हर बाधा दूर हो जाती है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि मनुष्य अपनी तर्कबुद्धि का विकास या इस्तेमाल न करे। लेकिन तर्कबुद्धि को सर्वोच्च माननेवालों के लिए भारतीय दर्शन एक संकेत देता है कि आखिरकार इससे उबरना ही होगा तभी जीवन के जटिलतम सवालों का समाधान संभव है। हमारी अपनी बुद्धि के परे बहुत कुछ है जिसे हम जानते तो नहीं लेकिन अनुभव जरूर कर सकते हैं। श्रद्धा और भक्ति इसी अनुभव पर भरोसे का दूसरा नाम है।
सिल्क्यारा में जब तकनीकी दक्षता और तर्कबुद्धि ने समर्पण कर दिया तब समाधान का रास्ता भी निकलने लगा। आखिर यह कैसे हो सकता है कि डीआरडीओ की थर्मल इमेजिंग टेक्नॉलाजी यह बता रही है कि अगले पांच मीटर तक कोई अवरोध नहीं है और एक सवा मीटर पर ही ऑगर मशीन इतनी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गयी कि उसका विकल्प ही त्यागना पड़ा? वर्टिकल ड्रिलिंग से सरकारी मशीनरी बच रही थी क्योंकि वह सुरंग को बचाना चाहती थी। एक बार वर्टिकल ड्रिलिंग हो जाने के बाद सुरंग को छोड़ना पड़ता। लेकिन आनन फानन में वह रास्ता भी अपनाया गया और 40 मीटर तक वर्टिकल ड्रिलिंग भी की गयी।
लेकिन होरिजोन्टल ड्रिलिंग के जरिए इतने करीब पहुंच चुके थे कि उस विकल्प को छोड़ा नहीं जा सकता था। इसलिए अब मशीन का भरोसा छोड़ श्रद्धा और विश्वास के साथ मनुष्य के हाथों को आजमाने का निर्णय लिया गया। दिल्ली की ट्रेन्चलेस इंजीनियरिंग सर्विसेस प्राइवेट लिमिटेड के उन कामगारों को बुलाया गया जो हाथ से सुरंग खोदने के जानकार थे। मानों सभी आधुनिक तकनीकी, चोटी के विशेषज्ञ हार गये तो साधारण लोगों को बचाने का भार साधारण लोगों को ही सौंप दिया गया। और साधारण लोगों ने असाधारण तरीके से काम करते हुए मात्र 24 घण्टे के अंदर वह चार मीटर की बाधा खत्म कर दी, जो फंसे हुए कामगारों और बाहर की दुनिया के बीच अवरोध बन कर खड़ी थी।
साधारण कामगारों ने जो असाधारण काम किया उसके बाद उन्होंने यह भी कहा कि अगर उन्हें पहले ही बुलाया जाता तो पांच दिन पहले ही कामगार बाहर होते। लेकिन उन पर भरोसा तो मशीनों पर भरोसा टूटने के बाद किया गया। साधारण कामगारों ने जो किया उसे रैट माइनिंग कहा जाता है, जिसे खतरनाक मानकर एनजीटी बैन कर चुका है। साधारण लोगों की इस तकनीकी में जैसे चूहा कुतरकर बिल बनाता है ठीक उसी तरीके से सुरंग बनायी जाती है। वही काम यहां भी किया गया। मतलब मनुष्य की तर्कबुद्धि से विकसित तकनीकी हार गयी तो चूहे की तकनीकी को अपनाना पड़ा।
निश्चय ही चूहा प्रकृति प्रदत्त अपने गुणों के इस्तेमाल से अपना जीवन जीता है। वह सुरंग नहीं खोद सकता क्योंकि वह उसकी जरूरत नहीं है। उसे बिल की जरूरत होती है इसलिए प्रकृति ने उसे बिल खोदने की नैसर्गिक समझ दी है। भारत का मन मानस इस बात को जानता समझता है इसीलिए भारत में जिस तकनीकी और कला का विकास हुआ है उसे हमने अधिकतर प्रकृति के जीवनसाथी जानवरों से ही सीखा है। भारत में यांत्रिक उपकरणों का उतना ही विकास हुआ जितने से प्रकृति सम्मत जीवन जीने में बाधा न आये और वो यंत्र मनुष्य की पकड़ से बाहर न जाएं।
लेकिन यूरोप और अमेरिका के नये तकनीकीवाद से हम भी आक्रांत हो चले हैं। हमारी अपनी परंपरागत समझ और ज्ञान को हमने पिछड़ापन और दकियानूसी मान लिया है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय टनल एक्सपर्ट साधारण लोगों की इस तकनीकी से चमत्कृत हों और इसे सबसे बड़ा चमत्कार बता रहे हों लेकिन हमारा अपना ही भरोसा इन पर नहीं रहा। आर्नाल्ड ने साफ कहा कि जो कोई विशेषज्ञ नहीं कर पाया वो काम इन साधारण लोगों ने बहुत सहज तकनीकी से कर दिखाया। लेकिन तेज गति के विकास ने हमें एक ऐसी रैट रेस में धकेल दिया है जहां धरती, प्रकृति और परमात्मा किसी का घोषित अघोषित सिद्धांत हमारे लिए उपयोगी नहीं रहा। सिलक्यारा सुरंग का हादसा हो या केदारनाथ आपदा। ये उसी अतिक्रमण से उपजी चेतावनियां हैं जिसे न हमने कल सुना था और न ही शायद आज सुनेंगे।
सड़क परिवहन मंत्री नितिन गड़करी कह जरूर रहे हैं कि एनएचएआई द्वारा बनायी जा रही सभी सुरंगों की सुरक्षा जांच होगी लेकिन विषम प्राकृतिक परिस्थितियों को तकनीकी के जरिए सम बनाने का प्रयास जारी रहेगा। अगर सिलक्यारा सुरंग हादसे को गौर से समझें तो वहां इसी मानसिकता की हार हुई है। सिल्कयारा सुरंग में मानों मनुष्य की बुद्धि और प्रकृति के बीच कोई युद्ध चल रहा था, जिसमें आखिरकार प्रकृति के आगे मनुष्य को घुटने टेकने पड़े। प्रकृति विजयी हुई। 17 दिन के संकट का अंत हुआ। हिमालय ने अपने पास जिन 41 कामगारों को 'सुरक्षित' रखा था उन सभी को सकुशल वापस कर दिया है।
लेकिन आज नहीं तो कल, पहाड़ हो या मैदान, औद्योगिक विकास को लेकर भारतीय तरीकों से विचार करना ही होगा। अगर पाश्चात्य प्रेरित हमारी सरकारी मशीनरी इस दिशा में थोड़ा भी सोच विचार शुरु करे तो यही सिलक्यारा सुरंग हादसे से मिली सच्ची सीख कही जाएगी। वरना इस हादसे का अंत भला जरूर हुआ है लेकिन आगे भी सब भला होगा, यह भरोसे से कोई नहीं कह सकता।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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