BSP: बसपा के सामने भविष्य का संकट
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर बसपा सुप्रीमो मायावती ने लखनऊ में बुधवार को एक बैठक बुलाई थी। इसमें पार्टी के जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के पदाधिकारी शामिल हुए। बैठक में मायावती के भाई आनंद कुमार और भतीजे आकाश आनंद भी मौजूद थे। इस दौरान मायावती ने पार्टी पदाधिकारियों के सामने आकाश आनंद को अपने पास बुलाकर आशीर्वाद भी दिया।
मायावती के इस राजनीतिक आशीर्वाद से बसपा के भविष्य के नेतृत्व का संदेश भले मिल गया हो लेकिन उससे बड़ा सवाल यह है कि खुद बसपा का भविष्य क्या है? क्या बसपा इस साल विधानसभा चुनावों सहित 2024 के लोकसभा चुनाव में कुछ खास कर पायेगी? यह सवाल हर उस व्यक्ति के जेहन में उठ रहा है, जिसकी राजनीति में तनिक भी दिलचस्पी है। ट्विटर तक सिमट चुकी मायावती की राजनीति, लगातार घटना जनसमर्थन, जातीय जनाधार वाले नेताओं के पलायन तथा कम होता प्रतिनिधित्व खुद बसपा के भविष्य को सवालों के घेरे में खड़ा कर रहा है।

दरअसल, कांशीराम के अवसान के बाद दलित आंदोलन के दौलत आंदोलन में परिवर्तित हो जाने के बाद दलित एवं पिछड़ी जातियों का बसपा से लगातार मोहभंग होता चला गया। कांशीराम ने डीएस-फोर के दौर से ही तमाम दलित एवं अति पिछड़ी जातियों को गोलबंद करके बसपा का गठन किया था। उन्होंने सभी जातियों से लीडरशिप पैदा कर हाशिये पर पड़े वर्ग को एक साथ जोड़ा था। सवर्णों के खिलाफ आक्रामक एवं उत्तेजक नारों के जरिए कांशीराम ने कमजोर जातियों में चेतना पैदा की। मायावती के हाथों में बसपा की बागडोर आने के बाद पार्टी ने 2007 में अपने उरूज को छुआ, लेकिन जातीय क्षत्रपों के धीरे-धीरे बसपा से निकलने और निकाले जाने के बाद पार्टी कमजोर होती चली गई।
कुछ समय पूर्व तक अटकलें लगाई जा रही थीं कि मायावती बसपा को मजबूत करने के लिये इंडिया गठबंधन का हिस्सा बन सकती हैं। बहरहाल, लखनऊ में बसपा के जिलाध्यक्ष से लेकर जोनल एवं नेशनल कोआर्डिनेटरों की राज्य स्तरीय समीक्षा बैठक में सुप्रीमो मायावती ने स्पष्ट कर दिया है कि 2024 की लड़ाई पार्टी अकेले अपने दम पर लड़ेंगी। दरअसल, कांग्रेस नेतृत्व यूपी में बसपा से गठबंधन करने की पहल कर रहा है लेकिन कांग्रेस फिलहाल इंडिया गठबंधन का हिस्सा है जिसमें सपा भी शामिल है।
कांग्रेस का यूपी में इतना जनाधार नहीं है कि वह सपा पर दबाव बनाने वाली स्थिति में हो। लिहाजा सीट बंटवारे को लेकर सपा-कांग्रेस में मामला फंसने की आशंका है। कांग्रेस इसीलिये सपा की बजाय बसपा से गठबंधन का प्रयास कर रही है ताकि वह ज्यादा सीटों पर लड़ सके। कांग्रेस यूपी में जितनी ज्यादा सीटें जीतेगी, केंद्र में उसकी संभावना उतनी ज्यादा मजबूत होगी।
राजनीतिक तौर पर बसपा को गठबंधन की जरूरत दिख रही है, लेकिन समीक्षा बैठक में मायावती ने कार्यकर्ताओं को संदेश दे दिया है कि वह अकेले चुनाव की तैयारी में जुट जाएं। मायावती ने कहा कि गठबंधन होने पर बसपा अपना वोट सहयोगी दल को ट्रांसफर करा देती है, लेकिन दूसरे दल का वोट बसपा को नहीं मिलता है। गठबंधन से बसपा को फायदा नहीं होता है।
मायावती पार्टी को बचाये रखने के लिये अन्य राज्यों में भी अपनी पुरानी रणनीति को बदलने जा रही हैं। मायावती ने संकेत दिया है कि सत्ता से दूरी बनाये रखने वाली बसपा दूसरे राज्यों में भी सरकार में शामिल होने की संभावना तलाशेंगी तथा सत्ता संतुलन के जरिये कमजोर वर्ग का उत्थान करेगी।
दरअसल, बसपा के छिटपुट विधायक कई राज्यों में जीत हासिल करते रहे हैं, लेकिन बसपा कभी किसी सरकार में शामिल नहीं हुई। इस रणनीति का नुकसान यह होता है कि विधायक बसपा से पल्ला झाड़ सत्ताधारी दल में शामिल हो जाते हैं। माना जा रहा है कि कार्यकर्ताओं को बसपा से जोड़े रखने के लिये मायावती ने सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करने का निर्णय लिया है। आने वाले दिनों में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में विधानसभा चुनाव होने हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में बसपा को राजस्थान में छह, मध्य प्रदेश में दो, छत्तीसगढ़ में दो तथा मिजोरम में एक सीट पर जीत मिली थी।
तेलगांना में 2018 में खाता नहीं खुला था, लेकिन बसपा 2013 के विधानसभा चुनाव में दो सीटें जीती थी। इस बार भी बसपा को उम्मीद है कि इन राज्यों में वह कुछ सीटें जीत लेगी। इन राज्यों में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो बसपा सरकार में शामिल होने की संभावना तलाशेगी। बसपा जोरशोर से तैयारियों में जुटी हुई है।
राजस्थान में मायावती के भतीजे एवं नेशनल कोआर्डिनेटर आकाश आनंद लीड कर रहे हैं। राजस्थान में बसपा को संभावना दिख रही है। सड़क के आंदोलनों से परहेज करने वाली बसपा के नेशनल कोआर्डिनेटर आकाश आनंद राजस्थान के 150 विधानसभा क्षेत्र से गुजरने वाली साढ़े तीन हजार किलोमीटर की 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय बहुजन अधिकार यात्रा' निकाल रहे हैं।
आंदोलनों एवं रैलियों से दूरी बना चुकी मायावती ने समीक्षा बैठक में आकाश आनंद के कंधे पर हाथ रखकर यह भी संकेत दे दिया है कि बसपा का भविष्य कौन है। मायावती आकाश को जिस तरीके से आगे बढ़ा रही हैं, उससे स्पष्ट है कि आने वाले समय में बसपा की बागडोर वह अपने भतीजे के हाथ में देने की तैयारी कर रही हैं। राजस्थान में अपनी यात्रा बीच में रोककर आकाश आनंद राज्य स्तरीय समीक्षा बैठक में पहली बार भाग लेने पहुंचे थे। आकाश के कंधों पर पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की तैयारियों की जिम्मेदारी भी है। लेकिन बसपा की राह में सबसे बड़ा रोड़ा आजाद पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर भी हैं। चंद्रशेखर अपना जनाधार जिस तेजी से बढ़ा रहे हैं, उसका सीधा नुकसान बसपा को ही है।
इसलिए मायावती बसपा को अपने भतीजे के हाथों में सौंपने के साथ दलित वर्ग को चंद्रशेखर के मुकाबले का युवा नेतृत्व देने की तैयारी कर रही हैं। हालांकि आकाश आनंद के लिये यह परीक्षा आसान नहीं है। राजस्थान समेत पांच राज्यों के चुनावी नतीजों से आकाश की क्षमता का आंकलन भी होगा। अगर इन राज्यों में बसपा उम्मीद के अनुरूप प्रदर्शन करती है और किसी राज्य में सरकार में शामिल होती है तो पार्टी के भीतर आकाश आनंद का कद एवं स्वीकार्यता दोनों बढ़ेगी।
बहरहाल, पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव में भी मायावती, आकाश आनंद तथा बसपा के जनाधार की परीक्षा होनी है। अगर पार्टी यूपी में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं करती है तो निश्चित ही बसपा और आकाश आनंद दोनों का भविष्य अधर में लटक जायेगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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