इंडिया गेट से: असंसदीय भाषा पर सदन के बाहर भी लगे रोक
तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने एक बार फिर लोकतांत्रिक गरिमा को तार तार कर दिया है।
नई दिल्ली: तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने एक बार फिर लोकतांत्रिक गरिमा को तार तार कर दिया है। 10 जुलाई को हैदराबाद की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने देश के प्रधानमंत्री को "धोखेबाज" और "शैतान" करार दिया है। इसी तरह बंगाल में एक विधायक ने पीएम पद और राष्ट्रपति पद की गरिमा के खिलाफ बयान दिया है। सवाल ये है कि क्या संघीय व्यवस्था के प्रभावी संचालन के लिए केंद्र और राज्यों में सद्भाव जरूरी नहीं रह गया है जो मुख्यमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति प्रधानमंत्री के लिए कुछ भी बोल रहे हैं?

संविधान के अनुच्छेद 245 से 293 केन्द्र राज्य संबंधों से ही संबंधित हैं। इन अनुच्छेदों के अंतर्गत संविधान केंद्र और राज्यों के बीच विधायी, कार्यकारी और वित्तीय सभी शक्तियों को विभाजित करता है। लेकिन ये संवैधानिक प्रावधान ही काफी नहीं है। बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों को सह-अस्तित्व की भावना से काम करना चाहिए, राजनीतिक विद्वेष से नहीं।
आज़ादी के शुरुआती सालों तक केंद्र और राज्यों के संबंध सौहार्दपूर्ण थे क्योंकि सभी राज्यों में कांग्रेस सरकारें हुआ करती थीं। भारत में पहली बार 1957 में केरल में ईएमएस नम्बूदरीपाद के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार चुनी गई थी। केंद्र और राज्यों में राजनीतिक तनाव की शुरुआत यहीं से शुरू हुई।
जवाहरलाल नेहरू को राजनीतिक सह-अस्तित्व का उदाहरण प्रस्तुत करना था लेकिन नेहरू ने राज्य में मुक्ति संग्राम के बहाने कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त कर दिया। इसके बाद मानों सिलसिला ही चल पड़ा। केंद्र में बैठी कांग्रेस द्वारा विरोधी दलों वाली राज्य सरकारों को भंग करने का लंबा इतिहास है। देश में कई बार केंद्र व राज्यों के संबंधों पर चर्चा हो चुकी है। बोम्मई बनाम केंद्र सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के फैसले के बाद राज्यों में राष्ट्रपति राज लगाना अब आसान नहीं रह गया है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद केंद्र और राज्यों की विरोधी सरकारों के मुखियाओं की राजनीतिक लड़ाई भी सड़कों पर दिखने लगी है।
नीतियों को लेकर केंद्र की आलोचना अलग बात है। जैसे नीतीश कुमार भी राज्यों को वित्तीय अधिकार कम होने के मुद्दे पर केंद्र सरकार के खिलाफ बोलते रहते हैं। पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र ने अपने अपने राज्यों में संघीय ढांचे की भावना के खिलाफ जाकर कुछ समय पहले सीबीआई पर अंकुश लगाया था। कह सकते हैं कि यह उनका संवैधानिक अधिकार था। लेकिन बंगाल के बाद अब तेलंगाना के मुख्यमंत्री भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ व्यक्तिगत टिप्पणियाँ करते दिखाई देते हैं।
आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में भी गैर भाजपा दलों के मुख्यमंत्री हैं लेकिन दोनों मुख्यमंत्रियों का प्रधानमंत्री के साथ वैसा तनाव कभी देखने को नहीं मिला जैसा बंगाल और तेलंगाना के मुख्यमंत्रियों का बना हुआ है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के साथ भी प्रधानमंत्री के साथ कामचलाऊ सह-अस्तित्व के संबंध बने हुए हैं। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी प्रधानमंत्री के खिलाफ टिप्पणियाँ करते रहते हैं लेकिन वह हमेशा मर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते हैं। महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना में भारी तनाव और विद्वेष में उद्धव सरकार बनी थी, लेकिन उद्धव ठाकरे ने कभी भी प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत हमले नहीं किए जबकि बंगाल और तेलंगाना के मुख्यमंत्रियों पर राजनीतिक मर्यादा की बात लागू ही नहीं हो रही।
राजनीतिक विरोधी के तौर पर आलोचना तो समझ में आती है, लेकिन संवैधानिक पदों पर बैठे हुए व्यक्तियों को एक दूसरे के खिलाफ व्यक्तिगत आलोचनाओं से बचना चाहिए। इससे संघीय ढाँचे पर सवाल खड़े होते हैं। क्या मुख्यमंत्रियों को देश के सर्वोच्च निर्वाचित पद पर आसीन प्रधानमंत्री और संवैधानिक पद पर तैनात राज्यपाल की व्यक्तिगत आलोचना शोभा देती है? बंगाल और तेलंगाना के मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री और राज्यपालों के खिलाफ जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं उससे राजनीति शास्त्र के युवा विद्यार्थियों को भारत के संविधान, लोकतंत्र और राजनीतिक व्यवस्था का क्या संदेश जाता होगा?
यह बात सही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में वंशवाद की राजनीति पर कटाक्ष किया और बाद में भाजपा की रैली में कहा था कि अब तेलंगाना भी डबल इंजन की सरकार चाहता है। प्रधानमंत्री की ओर से भाजपा के मंच से वंशवाद की राजनीति के खिलाफ बोलना किसी भी हालत में गलत नहीं है। लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं हो जाता कि राहुल गांधी की तरह तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव व्यक्तिगत टिप्पणियां करने पर उतर आयें? चंद्रशेखर राव प्रधानमंत्री मोदी से अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी दिखाने का कोई मौका नहीं चूकते। प्रधानमंत्री जब भी तेलंगाना जाते हैं, मुख्यमंत्री सामान्य प्रोटोकाल का पालन तक नहीं करते।
राहुल गांधी ने भी चुनाव के समय पीएम मोदी को चोर तक कह दिया था। बंगाल में तो जैसे मोदी पर व्यक्तिगत टिप्पणियां राजनीतिक उपलब्धि बन गयी है। वहां के मंत्री, सांसद और विधायक पीएम मोदी पर व्यक्तिगत हमला करना अपना संवैधानिक अधिकार ही समझते हैं। अब तृणमूल कांग्रेस के विधायक इदरीस अली का बयान ही देखिए। उन्होंने कहा है कि "भारत का हाल श्रीलंका से भी बुरा होगा। जैसे श्रीलंका के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भागे, वैसे ही नरेंद्र मोदी भी भागेगा।" निश्चय ही ऐसी टिप्पणियां पीएम पद पर बैठे व्यक्ति की राजनीतिक आलोचना नहीं बल्कि व्यक्तिगत हमला है।
अब वक्त आ गया है कि संसद की तर्ज पर राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों, विधायकों, सांसदों पर संसद और विधानसभाओं के बाहर भी असंसदीय भाषा बोलने पर रोक लगे। ऐसे बयानों पर होने वाली शिकायतों की सुनवाई के लिए चुनाव आयोग को प्राधिकारी बनाया जाए और दोषी पाए जाने पर ऐसे नेताओं को एक निश्चित अवधि के लिए किसी भी राजनीतिक जिम्मेदारी का वहन करने से रोका जाए। भारत के संघीय ढांचे की गरिमा को बनाये रखने में अगर राजनीतिक दल और उसके नेता अक्षम साबित हो रहे हैं तो इस पर संवैधानिक तरीके से ही रोक लगाने की जरूरत है।
(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)
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