Udhayanidhi Stalin: द्रविड़ राजनीति को नये आसमान पर ले जाने की चाहत
Udhayanidhi Stalin: डीएमके नेता और करुणानिधि के पोते उदयनिधि का सनातन धर्म को समाप्त करनेवाला एक बयान इस समय विवादों में है। यह बयान उन्होंने चेन्नई में 2 सितंबर को तमिलनाडु प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन की ओर से आयोजित एक सम्मेलन में दिया है। कम्युनिस्ट पत्रकारों की इस एसोसिएशन द्वारा जिस सम्मेलन का आयोजन किया गया उसका नाम था "सनातन उन्मूलन कान्क्लेव"। इसमें बोलने के लिए प्रमुख रूप से जो वक्ता आमंत्रित थे उसमें डीएमके पार्टी के उदयनिधि के अलावा उनकी ही पार्टी के नेता पोनमुडी, द्रविड़म कजगम के वीरामणि, कम्युनिस्ट पार्टी के मधुकर रामलिंगम, कांग्रेस के पीटर अल्फांस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के एस वेंकटेशन के अलावा रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला भी थी।
दिन भर चले इस कॉन्क्लेव में कुल 8 विषय रखे गये थे जिसमें सनातन धर्म का खतरनाक इतिहास, सनातन और महिला, तमिल जीवन और सनातन, जाति और षड्यंत्र, तमिल संगीत और सनातन, मीडिया में सनातन प्रभुत्व का विरोध, धर्म और राजनीति के स्तर पर सनातन का बहिष्कार और 'सनातन धर्म को नष्ट करने के हथियार' शामिल थे।

इसी कान्क्लेव में बोलते हुए उदयनिधि ने कहा कि "इस सम्मेलन का शीर्षक (सनातन धर्म उन्मूलन) बहुत अच्छा है। आपने इसे सनातन विरोधी सम्मेलन न कहकर सनातन उन्मूलन सम्मेलन कहा है जिसके लिए मैं आपकी प्रशंसा करता हूं। कुछ चीजों को खत्म करना ही होगा। जैसे डेंगू, मलेरिया, कोरोना इन्हें खत्म करना ही होगा। सनातन धर्म भी ऐसा ही है।" इसके बाद आगे बोलते हुए उदयनिधि ने कहा कि "सनातन क्या है? सनातन नाम संस्कृत से आया है। सनातन समानता और सामाजिक न्याय के खिलाफ है। सनातन का मतलब है कि वह स्थिर है और उसे बदला नहीं जा सकता। उस पर सवाल नहीं उठाये जा सकते।"
स्वाभाविक है उनका यह बयान पढ़कर कोई भी समझ सकता है कि उन्हें सनातन धर्म की कोई समझ ही नहीं है। फिर भी उदयनिधि ने जो कुछ बोला है बहुत सोच समझकर एक जिम्मेदार नेता और मंत्री के तौर पर बोला है। इसीलिए विवाद होने के बाद ट्विटर पर एक बार उन्होंने लिखा कि "मैं किसी भी कानूनी कार्रवाई का सामना करने के लिए तैयार हूं। मैं भगवा धमकियों से डरनेवाला नहीं हूं। मैं इसे आज, कल और परसों कहता रहूंगा। हम द्रविड़ भूमि से सनातन धर्म को समाप्त करना चाहते हैं और इसके लिए हम जरा भी नहीं झुकेंगे।" साफ है पिता स्टालिन के मंत्रिमंडल में युवा और खेल मंत्री उदयनिधि हिन्दू धर्म विरोधी बयान देकर द्रविड़ राजनीति को एक नये आसमान पर ले जाना चाहते हैं।
लेकिन यहां एक तथ्य समझने की जरूरत है कि डीएमके की राजनीति जितने मुखर रूप से हिन्दी विरोधी रही है उतना मुखर होकर उन्होंने हिन्दू विरोध नहीं किया। पेरियार की हिन्दू विरोधी परंपरा का वाहक होने के बावजूद करुणानिधि बाद के दिनों में सनातन धर्म विरोधी बयान नहीं दिया करते थे। हां सामाजिक न्याय के नाम पर उनके नेतृत्व में ब्राह्मणों का तमिलनाडु में उत्पीड़न जरूर किया गया। सरकारी संस्थानों से संस्कृत को लगभग समाप्त कर दिया गया। लेकिन समूचे हिन्दू धर्म या सनातन धर्म पर कभी हमला नहीं किया। मृत्यु से तीन साल पूर्व अप्रैल 2015 में तो उन्होंने सफाई भी दी थी कि वो "हिन्दू धर्म के कट्टरपंथियों के खिलाफ हैं, हिन्दू धर्म के नहीं।"
91 साल की उम्र में उन्होंने अपने ही उपनाम पर चलनेवाले टीवी चैनल 'कलइग्नर' के लिए रामानुजाचार्य सीरियल का डायलॉग भी लिखे थे। जब इस पर उनसे सवाल पूछा गया तो उन्होंने साफ कहा कि रामानुजाचार्य ने महान विचार दिया। उन्होंने वर्गभेद और जातिभेद का विरोध किया था। करुणानिधि ने उस समय सफाई दी थी कि इस सीरियल में लिखे डायलॉग के जरिए वो 'रामानुजाचार्य के प्रगतिशील विचारों' को आगे लाना चाहते थे। रामानुजाचार्य दक्षिण के महान वैष्णव संत थे जिन्होंने जाति पांति से ऊपर उठकर सबको धर्म और भक्ति की शिक्षा दी थी।
स्वयं मुख्यमंत्री स्टालिन ने भी कभी खुलकर इस तरह से सनातन धर्म के खिलाफ बात नहीं की जैसी उदयनिधि ने की है। स्टालिन की पत्नी दुर्गा एक धार्मिक महिला है और परिवार की नास्तिक परंपरा के उलट उनकी वैष्णव भक्ति अटूट है। अभी पिछले महीने 11 अगस्त को उन्होंने केरल के गुरुवायूर कृष्ण मंदिर में 14 लाख रूपये मूल्य का सोने का मुकुट दान किया है। इसके अलावा उन्होंने एक चंदन घिसने की मशीन भी दी जिसकी कीमत दो लाख रूपये है। मंदिर में उनके ससुराल से तो कोई साथ नहीं आया था लेकिन उनकी बहनें उनके साथ थीं।
लेखन जगत से जुड़ी रही दुर्गा भी उसी तरह तमिलनाडु के अन्य पिछड़ा वर्ग से आती हैं जैसे करुणानिधि का परिवार आता है लेकिन परिवार की परंपरा के उलट वो धार्मिक स्वभाव की हैं। लेकिन जैसा कि आमतौर पर भारतीय हिन्दू परिवारों में होता है कि पति पत्नी या बच्चों के बीच इतनी स्वतंत्रता रहती है कि धर्म के मामले में कोई किसी पर दबाव नहीं डालता। भारतीय परिवार व्यवस्था की यह एक उदात्त परंपरा है कि यहां एक ही परिवार में नास्तिक और आस्तिक दोनों पूरे अपनेपन के साथ मिलजुलकर रह सकते हैं। करुणानिधि का परिवार भी इससे अछूता नहीं है।
लेकिन उदयनिधि उस परिवार में पहले ऐसे व्यक्ति बनकर उभर रहे हैं जो धार्मिक कट्टरता की बजाय सीधे सनातन धर्म को ही खत्म करने की चुनौती दे रहे हैं। उसकी तुलना डेंगू, मलेरिया और कोरोना से कर रहे हैं। और ऐसा उन्होंने कोई पहली बार नही किया है। पिछले साल क्रिसमस से पहले चेन्नई में वो अपनी क्रिश्चियन पत्नी किरुथिगा के साथ एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे। उन्होंने उस समय कहा था कि "मुझे अपने आप को ईसाई कहने पर गर्व होगा।" क्रिसमस के पहले आयोजित इस कार्यक्रम में उन्होंने 'हल्लेलुइया' को वास्तविक द्रविड़ियन मॉडल तक बता दिया था।
ऐसे में इन बयानों के जरिए जहां वो द्रविड़ राजनीति को नया उभार देना चाहते हैं वहीं चर्च और ईसाई मतदाताओं को भी "खुश" करना चाहते हैं। आधिकारिक रूप से प्रदेश में भले ही 6.12 प्रतिशत ईसाई हों लेकिन अनाधिकारिक तौर पर इनकी संख्या इससे अधिक हो सकती है। सेन्टर फॉर पालिसी स्टडीज के एक अध्ययन के अनुसार तमिलनाडु इकलौता ऐसा राज्य है जहां मुस्लिम समुदाय के मुकाबले में ईसाई समुदाय की ग्रोथ अधिक है।
तमिलनाडु के तटवर्ती जिले कन्याकुमारी में सर्वाधिक ईसाई आबादी रहती है जहां जिले की कुल जनसंख्या में 46.85 प्रतिशत ईसाई हैं। 1921 में 1.5 लाख से बढकर 2011 में इस जिले में ईसाई जनसंख्या 8.8 लाख हो गयी है। इसी से सटे तिरुनेलवेली और थूथुकुडी में ईसाई जनसंख्या 11.12 तथा 16.88 प्रतिशत है। तमिलनाडु के ये तटवर्ती जिले द्रविण राजनीति के गढ़ हैं और यहां अपनी पकड़ बनाये रखने के लिए उन्हें कुछ न कुछ ऐसा बोलना या करना पड़ेगा जिससे चर्च उनके 'सेकुलर विचारों' से खुश रहे।
सनातन धर्म को समाप्त कर देने जैसे बयान उदयनिधि किसी वैचारिक पू्र्वाग्रह से दे रहे हैं या राजनीतिक दृष्टिकोण से यह तो वही जानें, फिलहाल ऐसे बयानों का उन्हें या उनकी पार्टी को कोई राजनीतिक नुकसान होता हुआ नहीं दिखता। जहां विरोध हो रहा है वहां डीएमके का कोई नामलेवा नहीं है, जहां वो है वहां ऐसी हिन्दू विरोधी बातों का विरोध करनेवाले ही बहुत कमजोर हैं। शायद इसीलिए उदयनिधि देश में हुए राजनीतिक बवाल के बाद भी द्रविड़ भूमि से सनातन धर्म को समाप्त करने के बयान पर कायम हैं। हां, अगर भाजपा ने मुखरता से इस मुद्दे को उठाया तो तमिलनाडु के बाहर इसका नुकसान ताजा ताजा बने 'इंडिया' गठबंधन को हो सकता है क्योंकि डीएमके भी इस गठबंधन की अहम भागीदार है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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