Single Parenting: "हम दो, हमारे दो", के बाद अब "मैं एक, मेरा एक"

भारत में संयुक्त परिवार का चलन था। तीन पीढियां तो एक साथ रहती ही थीं। वह टूटा। शहरी इलाकों में उसकी जगह हम दो हमारे दो का चलन बढ़ा। अब उसके भी आगे निकलकर "मैं एक, मेरा एक" का चलन बढ़ रहा है।

trend of Single Parenting instead of hum do hamare do parents children in india

Single Parenting: पिछले सप्‍ताह देश के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान अकादमी के स्थापना दिवस कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में कहा कि परिवारों में टूटन का बढ़ता चलन, काफी गंभीर बात है। उन्‍होंने आगाह किया है कि अगर इसकी गति पर लगाम नहीं लगाई गई तो वह दिन दूर नहीं, जब समाज से विवाह की संकल्‍पना ही लुप्‍त हो जाएगी।

सिंगल पैरेंटिंग (जहां अलगाव के बाद पति या पत्‍नी अकेले ही बच्‍चों को पालते हैं) वाले परिवारों की बढ़ती संख्‍या वास्‍तव में चिंतनीय है। चिंता बेशक नई न हो, लेकिन एकदम प्रासंगिक है और जायज भी। शहरीकरण के बढ़ते दबाव में संयुक्‍त परिवारों के टूटने की शुरुआत तो बहुत पहले ही हो चुकी थी। मजबूरी में ही सही, लोगों ने और समाज ने इसे स्‍वीकार कर लिया। क्‍यों‍कि इसके पीछे रोजगार, व्‍यापार, आर्थि‍क उन्‍नति जैसे जो कारण पेश किए गए, वे संयुक्‍त परिवार में रहने के सुख से ज्‍यादा अहमियत रखते थे। दशकों पहले ही समाज विज्ञानियों ने चेताना शुरू कर दिया था कि इस प्रकार के विखंडन की परिणीति क्‍या होने वाली है। उनकी यह आशंका, अब एक यथार्थ में बदल चुकी है। यह दीगर बात है कि, अभी हमें मानसिक रूप से इस स्थिति को स्‍वीकार करने में काफी समय लग सकता है।

बढ़ रहे हैं एकल अभि‍भावक

लेकिन, हमारे स्‍वीकार करने या न करने से समस्‍या की गंभीरता कम नहीं हो जाती। वास्‍तविकता तो यही है कि एकल अभिभावक या सिंगल पैरेंटिंग की अवधारणा अब महानगरों की सीमाएं लांघकर, छोटे शहरों में भी नजर आने लगी है। यह चलन कितनी तेजी से बढ़ रहा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हमारे देश में ऐसे परिवारों (ओपीएच यानि वन पैरेंट हाउसहोल्‍ड्स) की संख्‍या आश्‍चर्यजनक रफ्तार से बढ़ रही है, जिनमें एक ही व्‍यक्ति अपने बच्‍चे का पालन-पोषण कर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र ने इस बारे में वर्ष 2015 से 2020 तक 89 देशों से आंकड़े एकत्रित किए। इनके आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट 'द प्रोग्रेस ऑफ द वर्ल्ड्स वीमेन 2019-2020: फैमिलीज़ इन ए चेंजिंग वर्ल्ड' में बताया गया है कि भारत में 2020 तक ओपीएच की संख्‍या 7.5 प्रतिशत हो गई थी। जबकि 2015 में यह इसकी करीब-करीब आधी, सिर्फ 4 प्रतिशत ही थी। इस बढ़ोत्‍तरी के कारण भारत ओपीएच की संख्‍या के मामले में अमेरिका, चीन और जापान के बाद चौथा सबसे बड़ा देश बन गया है। वैश्विक स्‍तर पर ओपीएच की संख्‍या, कुल परिवारों का लगभग 10 प्रतिशत है। जाहिर है कि हम वैश्विक औसत से कुछ ही कदम पीछे हैं।

ऐसे उप-एकल परिवारों के मामले में गौरतलब बात यह है कि इन परिवारों में हर दस में से आठ परिवार ऐसे हैं, जहां महिलाएं सिंगल पैरेंट हैं। यूएन की उपरोक्‍त रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में इस दायित्‍व को संभाल रही महिलाओं की संख्‍या दस करोड़ से भी अधिक है। ऐसे एकल अभिभावकों में विधुर-विधवाएं, तलाकशुदा स्‍त्री-पुरुष और अविवाहित मातृत्‍व का चयन करने वाली महिलाएं प्रमुखता में हैं।

बिना विवाह के बच्‍चे

अब ऐसे सिंगल पैरेंट्स की संख्‍या भी तेजी से बढ़ रही है, जो शादी के बंधन में बंधे बिना ही अडॉप्‍टेशन या सेरोगेसी के जरिए पितृत्‍व या मातृत्‍व का आनंद लेना चाहते हैं। वे इस तथ्‍य से भली-भांति परिचित हैं कि एक बच्‍चे को पालना, एक 'पप्‍पी' या 'किटी' पालने जैसा सरल नहीं है। इसमें बहुत सारी भावनात्‍मक, नैतिक, लीगल और सामाजिक जिम्‍मेदारियां व जवाबदेही जुड़ी होती हैं। इसके बावजूद वे इन बच्‍चों के 'नॉन बायोलॉजिकल' सिंगल डैड या सिंगल मॉम बनकर इस नए शगल को एन्‍जॉय कर रहे हैं।

इस ट्रेंड को हवा देने में सेलिब्रिटीज का बहुत बड़ा हाथ रहा है। इसे सोशल सर्विस कहें या स्व मनोरंजन, दुनिया भर में बहुत सारी मशहूर हस्तियों ने ऐसे बच्‍चों को गोद लिया है और बड़ा किया है, जिनके वे जैविक माता या पिता नहीं हैं। इन हस्तियों में अम्‍बर हर्ड, मिंडी केलिंग, चार्लीज थेरॉन, मेग रेयान, डायने कीटन, एडी फालको, जीन स्‍मार्ट, कॉनी ब्रिटन, सांद्रा बलॉक, डेनिस रिचर्ड्स, एलिजाबेथ हर्ले, शेरिल क्रो, लूसी लियु, मैडोना, शेरोन स्‍टोन, क्रिस्‍टीन डेविस, सुष्मिता सेन, करन जौहर आदि शामिल हैं।

चुनौतियां और सहूलियतें

अक्‍सर यह सवाल उठता है कि एकल अभिभावक के रूप में एक बच्‍चे को बड़ा करना किसके लिए ज्‍यादा चुनौतीपूर्ण होता है। एक पुरुष के लिए या एक स्‍त्री के लिए। नब्‍बे के दशक तक, फिल्‍मों में सिंगल मॉम का स्‍ट्रगल बहुत महिमामंडित किया जाता था। लेकिन, नए दौर का बॉलीवुड नैरेटिव इस मामले में अधिकतर पुरुषों के संघर्ष को भी दिखाता है। फिल्‍मों में तो फिर भी 'अंत भला तो सब भला' वाला पैटर्न सब कुछ व्‍यवस्थित कर देता है, लेकिन वास्‍तविक जीवन में यकीनन यह इतना आसान नहीं होता।

दरअसल, एकल अभिभावक के संघर्ष और चुनौतियों का निर्धारण उसके लिंग से नहीं होता, बल्कि उन परिस्थितियों से होता है, जिनमें रहकर उसे अपने बच्‍चे को बड़ा करना है। एकल अभिभावक स्‍त्री हो या पुरुष, उसके पास कुछ सहूलियतें और कुछ सीमाएं हमेशा मौजूद रहती हैं। पुरुषों के लिए आर्थिक संसाधन जुटाना अपेक्षाकृत सरल होता है तो महिलाओं में बच्‍चों को बड़ा करने की अत्‍यंत विलक्षण नैसर्गिक सामर्थ्‍य होती है। शायद इसीलिए, परिवार की हमारी संकल्‍पना में स्‍त्री-पुरुष, दोनों को एक-दूसरे का पूरक माना गया है।

लेकिन, अब एक पूरी जमात है, जो विवाह नाम की हमारी संस्‍था को नए सिरे से परिभाषित करना चाहती है। न सिर्फ व्‍यक्तिगत स्‍तर पर, बल्कि अपनी नवरचित परिभाषाओं को सामाजिक व संवैधानिक स्‍वीकृति दिलाने के लिए भी एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। पिछले हफ्ते से हम सुप्रीम कोर्ट में इसी तरह की चर्चाएं देख रहे हैं, जहॉं परिवार तो चाहिए, लेकिन वैसा नहीं जैसा हमारी परम्परा या समाज ने निर्धारित किया था।

लोग मशहूर हस्तियों का अनुकरण और अनुसरण करते हैं। इस मामले में भी कर रहे हैं। लेकिन, इसमें दो समस्‍याएं हैं। एक तो आम लोगों को वे सब सहूलियतें और विशेषाधिकार हासिल नहीं होते, जो सेलिब्रिटीज को होते हैं। और दूसरे, फैशन के साथ एक बड़ी मुश्किल यह है कि‍ इसका भूत बहुत जल्‍दी उतर जाता है। जहां बच्चे के साथ जैविक या आनुवांशिक रिश्ता है वहां ब्लड रिलेशन का जुड़ाव रहता है लेकिन जहां एडॉप्टेड चाइल्ड है वहां बचपन बीतने के साथ एक दूसरे के बीच विभिन्न प्रकार की भिन्नता उत्पन्न होने का खतरा पैदा हो जाता है। इसके बाद ऐसे बच्‍चों का क्‍या हो सकता है, इस बारे में भी अभी से विचार शुरू कर देना चाहिए।

अकेला रहना या अकेले हो जाना ये असामाजिक अवधारणा है। मनुष्य को अंतत: परिवार और समाज का साथ चाहिए होता है। लेकिन जिस तरह से अकेले हो जाने को महिमामंडित किया जा रहा है और "मैं एक, मेरा एक" का सिद्धांत प्रचारित किया जा रहा है वह न केवल स्त्री या पुरुष के लिए बल्कि उस बच्चे के लिए भी एक त्रासदी ही होगी जो ऐसे सिंगल पैरेन्ट के साथ पलता बढ़ता है। ऐसी बातों को महिमामंडित करने की बजाय इसकी मुश्किलों की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहिए तभी इसकी सच्चाई सामने आयेगी।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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