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इंडिया गेट से: धर्मस्थल क़ानून पर फैसले की बारी

अयोध्या के बाद मथुरा काशी के मुक्त होने की भी शुरुआत हो गई है। लगता है अयोध्या की तरह इन दोनों हिन्दू तीर्थ स्थलों का फैसला भी कोर्ट से आएगा। वैसे लंबी अदालती लड़ाई लड़ी जाएगी, लेकिन अच्छी बात यह हुई है कि मुस्लिम पक्ष के शुरू से ही सुप्रीम कोर्ट चले जाने से केस ने एक कदम आगे बढा लिया।

Time to change Religious Places Act

यह केस सिर्फ ज्ञानवापी मस्जिद में स्थित शृंगार गौरी के दर्शनों का था। 1993 तक हिन्दू शृंगार गौरी की रोजाना पूजा अर्चना करते थे। तब उतर प्रदेश में मुस्लिम तुष्टिकरण वाली समाजवादी पार्टी की सरकार थी, जिसने ज्ञानवापी मस्जिद के चारों तरफ लोहे की ग्रिल लगवा दी। इस तरह हिन्दुओं के शृंगार गौरी मन्दिर जाने का रास्ता बंद हो गया।

1991 में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने भारतीय जनता पार्टी के विरोध और वाकआउट के बाद संसद से धर्मस्थल बिल पास करवा लिया था कि 1947 में आज़ादी के समय जो धर्म स्थल जैसा था, वैसा ही रहेगा। सिर्फ अयोध्या को इस क़ानून से बाहर रखा गया था। तब विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवानी ने सरकार से कहा था कि अयोध्या के साथ मथुरा काशी को भी क़ानून के दायरे से बाहर रखा जाए। लेकिन मुसलमानों, वामपंथियों और तथाकथित सेक्यूलर दलों के दबाव में कांग्रेस इसके लिए तैयार नहीं हुई तो भाजपा ने वाकआउट कर दिया था।

भाजपा के वाकआउट के बाद बिल पास हुआ था। इस क़ानून से हिन्दुओं के मन में गुस्सा था, क्योंकि उन्हें अदालत से इन्साफ लेने से रोका गया था। यह कांग्रेस सरकार का सब से बड़ा एकतरफा मुस्लिम तुष्टिकरण था। जिसका नतीजा यह निकला कि 1996 में भाजपा 161सीटें जीत कर सब से बड़ी पार्टी के रूप में उभरी।

इसी धर्मस्थल क़ानून के कारण मथुरा काशी के मुकद्दमें या तो अदालतों से खारिज होते रहे या लंबित रखे जाते रहे। इसी साल शृंगार गौरी का मुकद्दमा कोर्ट में गया, तो मुस्लिम पक्ष ने वही धर्मस्थल क़ानून का हवाला देकर केस को खारिज करने की गुहार लगाई। लेकिन यह केस अलग था क्योंकि 1991 तक ज्ञानवापी परिसर में शृंगार गौरी मन्दिर में रोजाना पूजा होती थी। इसलिए सिविल कोर्ट ने ज्ञानवापी मस्जिद की वीडियोग्राफी करवाने का आदेश दे दिया।

वीडियोग्राफी रुकवाने की मुस्लिम पक्ष की सारी दलीलें कोर्ट ने खारिज कर दी। इसी वीडियोग्राफी ने मस्जिद की पोल खोल कर रख दी, जब मस्जिद के भीतर स्वास्तिक और वजूखने में शिवलिंग मिल गया। हालांकि मुस्लिम पक्ष ने इस शिवलिंग को फव्वारा कहा है। केस की आगे सुनवाई रुकवाने के लिए मुस्लिम पक्ष ने उसी धर्मस्थल क़ानून का हवाला दिया था, लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को कोई राहत देने की बजाए इतना ही कहा था कि आगे की सुनवाई जिला अदालत करेगी, और वह तय करेगी कि केस चलने लायक है या नहीं।

मुस्लिम पक्ष की एक और दलील थी कि औरंगजेब ने यह जमीन मुसलमानों को मस्जिद बनाने के लिए दी थी, इस लिए इस केस को वक्फ बोर्ड ही सुन सकता है। वक्फ बोर्ड के कानूनी अधिकार भी न्याय की सामान्य प्रक्रिया के खिलाफ हैं, इसे भी सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी गई है। 12 सितंबर 2022 को जिला अदालत ने मुसलमानों की सारी दलीलें खारिज करते हुए अभी सिर्फ इतना ही फैसला किया है कि केस सुने जाने लायक है। लेकिन अब सिर्फ शृंगार गौरी में पूजा के अधिकार का मामला नहीं है। अब सारी ज्ञानवापी मस्जिद पर सवाल है।
हिन्दू पक्ष सारी ज्ञानवापी मस्जिद वापस चाहते हैं, ताकि सैंकड़ों सालों से टकटकी लगाए बैठा नन्दी शिवलिंग के दर्शन कर सके। स्वाभाविक है कि अंजुमन इंतजामिया मसजिद कमेटी इस फैसले के दूरगामी नतीजे जानता है, इसलिए वह हाईकोर्ट में चुनौती देगा और केस सुप्रीमकोर्ट तक जाएगा।

अभी तीन दिन पहले ही सुप्रीमकोर्ट ने धर्मस्थल क़ानून को चुनौती दिए जाने वाली याचिका स्वीकार करके केंद्र सरकार को नोटिस देकर पूछा है कि इस पर उस की क्या राय है। भाजपा के नेता अश्विनी कुमार और सुब्रहमन्यम स्वामी की अपील पर ही यह नोटिस जारी हुआ है। इन दोनों ने अपनी याचिका में कहा है कि यह क़ानून न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है, क्योंकि यह क़ानून लोगों को अदालत में जाने से रोकता है। कोई क़ानून किसी को अदालत में जाने से कैसे रोक सकता है, और 1947 की सीमा कैसे तय की जा सकती है। उस से पहले मुगल काल में हजारों मन्दिर तोड़े गए, देश आज़ाद हुआ है तो क्या हिन्दुओं को इन्साफ मांगने का हक नहीं है।

अब जब कि भाजपा की लगातार दूसरी बार सरकार बनी है, तो उसे अपनी विचारधारा के मुताबिक़ कई ऐतिहासिक गलतियाँ सुधारनी हैं। जिनमें धर्मस्थल बिल भी एक है। भाजपा के लिए संयोग की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने संसद की गलती सुधारने का मौक़ा दे दिया है। मोदी सरकार जल्द ही इस पर स्टैंड ले लेगी और स्वाभाविक है कि वह 1991 में संसद में लिए गए स्टैंड के अनुरूप होगा। तब विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने सरकार से कहा था कि वह बिल में मथुरा और काशी को अलग कर दे तो भाजपा बिल का समर्थन करेगी।
भाजपा सरकार के पास दो विकल्प हैं। पहला यह कि सुप्रीमकोर्ट को अपनी राय बता कर इस क़ानून को अदालत को खारिज करने दे। दूसरा विकल्प यह है कि संसद में बिल पेश करके इस क़ानून को रद्द कर दे, जैसे सैंकड़ों पुराने क़ानून रद्द किए गए हैं। देखते हैं मोदी सरकार इस पर क्या निर्णय लेती है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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