Swarved Mahamandir: काशी की धर्म भूमि पर साधना मार्ग का स्वर्वेद
साधना मार्ग में स्वास को स्वर कहते हैं। स्वर या स्वास जैसी चलती है वैसी मनुष्य की गति होती है। इसलिए साधना मार्ग में स्वास को अनुभव करने पर सबसे अधिक जोर दिया जाता है। जितनी भी साधना पद्धतियां प्रचलन में हैं उन सबका मूल स्वर अर्थात स्वास ही है।
संभवत: इसलिए सदाफलदेव महाराज ने स्वर्वेद को सर्वोच्च वेद मानते हुए एक नयी ध्यान विधि विहंगम योग का प्रचलन शुरु किया होगा। आज प्रधानमंत्री मोदी ने उसी के सबसे बड़े ध्यानकेन्द्र स्वर्वेद महामंदिर का लोकार्पण किया।

यह मंदिर पूरी तरह से उन साधकों और शिष्यों को समर्पित है जो योगमार्ग से स्व का साक्षात्कार करना चाहते हैं। इसलिए सदाफलदेव महाराज के उत्तराधिकारी इसे भारत का सबसे बड़ा ध्यान केन्द्र बता रहे हैं जिसमें एकसाथ 20 हजार लोग बैठकर ध्यान कर सकते हैं। लगभग उन्नीस साल में बनकर तैयार हुए इस ध्यान मंदिर की चर्चा इसके उद्देश्य से अधिक इसकी बनावट को लेकर हो रही है जो कि गलत भी नहीं है।
बनारस गोरखपुर रोड पर लगभग 15 किलोमीटर दूर इस मंदिर की विशेषता यह है कि इसे किसी इष्ट या देवता को केन्द्र में रखकर नहीं बनाया गया है। इसके केन्द्र में मनुष्य का स्व है जिसे अनुभव करने की प्रेरणा यह पंथ देता है। इसलिए इसे मंदिर की बजाय महामंदिर कहा गया है। इसकी भव्यता के साथ ही इस मंदिर में जीवन की गति का संदेश भी निहित है कि कर्मों के कारण मनुष्य को कौन कौन सी अवस्था से गुजरना पड़ता है और कैसे वह ध्यान मार्ग पर चलते हुए इन कर्मफलों से अपने आपको मुक्त कर सकता है।
स्वामी सदाफलदेव महाराज वैसे तो कोई चर्चित संत नहीं रहे हैं लेकिन इस मंदिर के कारण उनका नाम और पंथ दोनों चर्चा में आये हैं। सद्गुरु सदाफलदेव महाराज का जन्म एक भूमिहार परिवार में 1888 में यूपी के बलिया जिले में हुआ था। परिवार पहले से धार्मिक प्रवृत्ति का था इसलिए बचपन से बालक सदाफल अध्यात्म मार्ग की ओर प्रवृत्त हो गया। हिमालय में जाकर तपस्या भी की और 1920 में स्वतंत्रता आंदोलन में भी हिस्सा लिया। हिमालय में साधना के दौरान उन्होंने शास्त्र की रचना भी की, जिसे विहंगम योग के अनुयायी अपने लिए पथ प्रदर्शक ग्रंथ मानते हैं।
1954 में सदाफलदेव महाराज का शरीर शांत होने के बाद भी उनके अनुयायियों की आध्यात्मिक यात्रा निरंतर जारी है। भारत के गुजरात क्षेत्र में भी उनका प्रभाव है और देश के बाहर कई देशों में भी विहंगम योग केन्द्र संचालित हो रहे हैं। सदाफल देव के अनुयायी ॐकार की बजाय 'अ' अकार को अपना पवित्र शब्द मानते हैं और उनके झंडों पर भी यही 'अ' लिखा रहता है।
अपने शिष्यों को स्वामी सदाफल देव का उपदेश था कि "इस मानव-शरीर या किसी भी चेतन प्राणी के शरीर की रचना भी उसी पंचभूतों से हुई है। इस शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जिहना और त्वचा), पाँच कर्मेन्द्रियाँ (हाथ, पाँव, गुदा, लिंग और वाणी), पंच प्राण (प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान) के अतिरिक्त चतुष्टय अन्तःकरण ( मन, बुद्धि, चित और अहंकार) हैं।
इस तरह कुल चौबीस तत्त्वों का संयोग इस शरीर में है, लेकिन ये सभी अपने आप में जड़ हैं और इनमें जो जीवन देने वाली शक्ति है उसे ही आत्मा कहते हैं। मरने के पश्चात शरीर अपने सभी उपयोगकर्ताओं के साथ पड़ा रह गया है, लेकिन जीवनी शक्ति नहीं रहती है। उसी जीवनी शक्ति को आत्मा के नाम से माना गया है। जिस तरह से विद्युत के उपकरण बिजली के प्रवाह से चलायमान हो जाते हैं, उसी तरह शरीर में स्थित कई यन्त्र इस आत्मा की चेतना के प्रवाह से क्रियाशील रहते हैं।" इसीलिए इस महामंदिर को किसी इष्ट को समर्पित न करके स्व को समर्पित किया गया है।
इसी मूल शिक्षा को केन्द्र में रखकर जो स्वर्वेद महामंदिर बना है उसमें सदाफल देव महाराज के वचनों को भी दीवारों पर उकेरा गया है। मंदिर की कारीगरी और नक्काशी दोनों ही कुछ समय से स्थानीय लोगों के लिए चर्चा का विषय बनी हुई है। लगभग 3 लाख वर्ग फुट क्षेत्र में बने इस मंदिर के कलश पर 125 पत्तों वाला कमल दल है जो ब्रह्मरंध्र के जागरण का संकेत करता है। मंदिर परिसर में 101 फाउण्टेन लगाये गये हैं और जीवन की गति को दर्शाने के लिए दीवारों पर अलग अलग खूबसूरत नक्काशी भी की गयी है। इस महामंदिर को बनाने में लाल पत्थर और सफेद संगमरमर का इस्तेमाल किया गया है जिसे मुख्यत: राजस्थान से मंगाया गया है। इस मंदिर की चित्रकला और सजावट को देखकर भी राजस्थान की लोककलाएं जीवंत नजर आती है। मंदिर का बाहरी हिस्सा हो या भीतरी हिस्सा हर जगह राजस्थान के कलाकारों की छाप साफ दिखाई देती है।
कहा यह भी जाता है कि एक हजार करोड़ की लागत से बननेवाले इस मंदिर को बनवाने का जिम्मा गुजरात के दो अनुयाइयों ने अपने ऊपर लिया था। हालांकि इसके बनने में स्वामी सदाफल देव के सभी शिष्यों ने अपना योगदान दिया है लेकिन मुख्य भूमिका में गुजरात के ही दो भक्त हैं जिन्होंने इस मंदिर को साकार रूप देने में अहम भूमिका निभाई है।
बताया यह भी जाता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का परिवार भी स्वामी सदाफल देव महाराज की परंपरा से जुड़ा हुआ है। उनकी मां और भाई स्वामी सदाफल देव की शिष्य परंपरा से जुड़े बताये जाते हैं। संभवत: इसीलिए आज उद्घाटन से पहले एक बार 2021 में भी वो यहां आ चुके थे, जब मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा था। हालांकि आज प्रधानमंत्री मोदी द्वारा उद्घाटन के बाद यह मंदिर देश भर में चर्चा में आ गया।
बहरहाल, भगवान सदाशिव की भूमि काशी पुरातन रूप से धर्मभूमि है। यहां पर साधना मार्ग और भक्ति मार्ग दोनों की धाराएं बहती रही हैं। काशी गोरखपुर महामार्ग पर बने स्वर्वेद महामंदिर के अस्तित्व में आने से उनके अनुयायियों के लिए भी काशी महत्वपूर्ण हो गयी है। ठीक वैसे ही जैसे कबीर और रविदास के अनुयाइयों के लिए है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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