Death by Hanging: सभ्य समाज के गले में फंसी 'फांसी' की फांस
बदलते समय के साथ इस बात पर बहस बढ़ी है कि किसी अपराधी को मृत्युदंड देने का तरीका क्या हो? फांसी के तरीकों पर होने वाली बहस सभ्य समाज के गले में एक फांस की तरह फंसी हुई है।

Death by Hanging: देश में लंबे समय से मृत्युदंड को लेकर अक्सर एक बहस का माहौल बनाया जाता रहा है। इसमें तीन धड़े मुख्य तौर पर मुखर नजर आते हैं। एक कहता है कि संभावित अपराधियों में भय बना रहे, इसके लिए मौत की सजा बहुत जरूरी है। दूसरा कहता है कि मौत की सजा की आधुनिक समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। तीसरे वर्ग को मौत की सजा से समस्या नहीं है, बल्कि इसके तरीके से समस्या है। उसका कहना है कि फांसी अमानवीय है, दर्दनाक है। मृत्युदंड रहे, लेकिन इसके लिए फांसी की जगह कोई और तरीका इस्तेमाल किया जाना चाहिए, जिसमें मरने वाले को कम कष्ट हो।
इसी हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस बारे में डेटा मांगा है कि क्या फांसी के स्थान पर मृत्युदंड के लिए कोई और दर्द रहित या कम दर्द वाला तरीका अपनाया जा सकता है। कोर्ट ने यह कदम एक जनहित याचिका के जवाब में उठाया है। 2017 में दायर इस याचिका में मांग की गई थी कि फांसी की बजाए, इससे कम दर्दनाक तरीकों जैसे लीथल इंजेक्शन, गोली मारने, बिजली के झटके या गैस चैंबर में डालकर मौत की सजा दी जाए।
दुनिया के अलग-अलग देशों में अपराधी को मृत्युदंड देने के लिए अलग-अलग तरीके प्रचलित हैं। गोली मारकर मौत के घाट उतारने को इनमें सबसे कम दर्दनाक माना जाता है, क्योंकि इससे व्यक्ति की तुरंत मृत्यु हो जाती है। यह तरीका दुनिया के करीब अस्सी देशों में इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा इलेक्ट्रोक्यूशन (बिजली की कुर्सी पर बिठाकर बिजली का घातक झटका देना), जहर का इंजेक्शन, अपराधी को एयरटाइट गैस चैंबर में हाइड्रोजन सायनाइड के बीच रखना भी मृत्युदंड के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले उपायों में से हैं। सऊदी अरब में गला काटकर तो अफगानिस्तान और सूडान जैसे कुछ देशों में गंभीर अपराधों के लिए अभी भी पत्थर मार-मार कर मौत के घाट उतार देने की पुरानी प्रथा जारी है।
जहां तक फांसी की सजा का प्रश्न है, तो अभी भी भारत समेत दुनिया के लगभग साठ देश इसे ही मृत्यु देने का सबसे बेहतर तरीका मानते हैं। इसके पक्ष में तर्क दिया गया है कि फांसी देते वक्त इंसान की गर्दन टूट जाती है। इस वजह से उसके मष्तिष्क का शेष शरीर से संपर्क टूट जाता है और उसकी मृत्यु हो जाती है। कहा जाता है कि इस तरीके में इंसान को मृत्यु के समय कम दर्द होता है। जबकि याचिका में दावा किया गया है कि फांसी की प्रक्रिया बहुत ही दर्दनाक होती है। इसके पूरा होने में आधा-पौन घंटा लग जाता है। यह व्यक्ति के, भले ही वह अपराधी क्यों न हो, गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार का हनन करता है।
यह बहस कोई आज की नहीं है, दुनिया भर में इस पर समय-समय पर काफी लंबी बहसें हुई हैं और कई जगह फांसी की जगह दूसरे विकल्प अपनाए गए हैं। भारत में भी यह मुद्दा, पिछले पॉंच-छह दशकों से बहस का केंद्र रहा है। पहली बार इस सवाल को 1967 में आई 35 वें विधि आयोग की रिपोर्ट में उठाया गया था कि क्या फांसी के स्थान पर मृत्युदंड के लिए कोई और तरीका अपनाया जा सकता है, जो अधिक मानवीय और कम कष्टदायी हो। लेकिन, इस प्रश्न को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया गया।
1983 में एक मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने खुद फांसी की सजा को सबसे बेहतर माना था। लेकिन 6 अक्टूबर 2017 को जब इस याचिका के संदर्भ में कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी किया तो उसमें साफ किया था कि हमने बेशक इसे सही ठहराया था, लेकिन पिछले 34 सालों में बहुत कुछ बदल चुका है। इसलिए जो पहले सही था, वह अब गलत भी हो सकता है।
इससे पहले 2003 में, 187वें विधि आयोग ने भी मृत्युदंड के लिए लीथल इंजेक्शन जैसे विकल्पों की सिफारिश की थी, लेकिन सरकार ने तब भी इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। हालांकि इंजेक्शन के जरिए मृत्यु प्रदान करने को लेकर भी मतैक्य नहीं है। विधि आयोग के पास इससे संबंधित कोई अध्ययन नहीं है कि इसमें वाकई में कम दर्द होता है। क्योंकि जहर को लेकर हर व्यक्ति की शारीरिक प्रक्रिया अलग-अलग हो सकती है। इसमें भी व्यक्ति को जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष करना पड़ सकता है।
अगर हम 19वीं सदी से पहले भारत और बाकी देशों में प्रचलित मृत्युदंड के लिए आजमाए जाने वाले तरीकों को याद करें तो सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। हाथी के पैरों तले कुचलवा देना, जलाकर मारना, पत्थर मारकर मौत के घाट उतारना, सूली पर लटकाना, सिर धड़ से अलग कर देना, गिलोटिन आदि के बारे में सोचकर देखिए, तकलीफ और अमानवीयता के मामले में फांसी तो उनके सामने कहीं भी नहीं ठहरती।
सवाल यह है कि फांसी क्या वाकई इतना बड़ा मुद्दा है, जिस पर इतने मंथन की आवश्यकता है? हां या नहीं में जवाब देने से पूर्व हमें यह स्मरण करना होगा कि हमारे देश में किन परिस्थितियों में फांसी की सजा सुनाई गई है और कितने लोगों को सुनाई गई है... उनमें से भी कितने लोगों को फांसी दी गई है। भारत में मौत की सजा सुनाते समय 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर (दुर्लभतम)' सिद्धांत का अनुसरण किया जाता है। इसके आधार पर आजादी के बाद से अभी तक 1000-2000 लोगों को ही फॉंसी दी गई है। इस बारे में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी और नेशनल लॉ कमीशन के ऑंकड़ों में विभेद है।
एनएलयू का दावा है कि आजादी के बाद से, 2014 तक कुल 755 लोगों का फांसी दी गई थी। वहीं, लॉ कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक 1954 से 1963 के एक दशक के भीतर ही 1400 लोगों को फांसी दे दी गई थी। वास्तविक आंकड़े चाहे जो हों, लेकिन इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता कि फांसी की सजा पाने वाले, भारतीय दंड संहिता के अनुसार, इस सजा के पात्र अपराधों की संख्या में नगण्य है। वर्ष 2000 से 2014 तक भारत में 1810 लोगों को मौत की सजा सुनाई गई थी, इनमें 975 की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया और 443 को ऊपर की अदालतों में बरी कर दिया गया। कुछ ने सजा माफी की अपील की हुई थी। इन चौदह सालों में जितने लोगों को असल में फंसी पर लटकाया गया, उनकी संख्या थी सिर्फ चार।
इतनी कम संख्या के बावजूद यह एक राष्ट्रीय बहस का विषय है तो इसकी वजह यह है कि हमारी संवैधानिक व्यवस्था हर व्यक्ति को गरिमापूर्ण ढंग से जीने का अधिकार देती है। इस अधिकार में गरिमामय मृत्यु भी शामिल है। भले ही उसका अपराध कितना ही जघन्य या अमानवीय क्यों न हो, हम चाहते हैं कि उसे मृत्यु भी मिले तो उसमें एक मानवीयता हो, सम्मान हो, गरिमा हो। क्योंकि यह उसके बारे में नहीं, यह हमारे बारे में है। हम सभ्य हैं, इसलिए हमने उन्नीसवीं सदी से पहले प्रचलित तरीकों से छुटकारा पाया है। इसलिए फांसी की जगह मानवीय और कष्ट रहित उपाय अपनाने पर विचार कर रहे हैं।
अब गेंद एक बार फिर केंद्र सरकार के पाले में है। मामले की अगली सुनवाई 2 मई को होगी। देखते हैं, तब तक ऊंट किस-किस करवट बैठता है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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