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Rahul Gandhi Case: राहुल गांधी की सजा पर स्टे से कांग्रेस को मिली दोहरी खुशी

Rahul Gandhi Case: राहुल गांधी के मानहानि मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट के स्टे से कांग्रेस बहुत खुश है और देश के तमाम कानूनविद इस बात से आश्वस्त हुए हैं कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने भारतीय न्यायिक इतिहास में एक दाग लगने से बचा लिया। उनका मानना है कि यदि उच्चतम न्यायालय ने भी गुजरात के न्यायालयों की तरह सजा बरकार रखी होती तो यह न केवल एक जनप्रतिनिधि के तौर पर राहुल गांधी के साथ अन्याय होता बल्कि देश की न्यायपालिका की छवि भी दुनिया भर में खराब होती।

कांग्रेस ने इस खुशी को औपचारिक रूप से अभिव्यक्त भी किया है। देशभर में उसके कार्यकर्ताओं व नेताओं ने तरह-तरह से खुशियाँ मनायीं। सोशल मीडिया पर तो कांग्रेस के नेता क्या, कार्यकर्ता भी 'सत्यमेव जयते' का नारा लगाते नजर आये। यही नहीं, राहुल गांधी अपने वकील अभिषेक मनु सिंघवी के साथ कांग्रेस मुख्यालय आये जहाँ उन्होंने पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, जयराम रमेश व अधीर रंजन चौधरी के साथ एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया। इस दौरान राहुल बहुत संतुलित और शांत नजर आये। उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों सत्य की जीत होती ही है। मैं स्पष्ट हूँ कि मुझे क्या करना है। कुल मिलाकर कहें तो उन्होंने यह दिखाया कि वह अधिक प्रफुल्लित नहीं हैं बल्कि समभाव में काम करते रहेंगे। अन्य नेताओं ने अलबत्ता मुकदमे के इर्दगिर्द राजनीति और षडयंत्रों के अंदेशे जरूर दुहराए।

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कांग्रेस इसलिए भी बहुत खुश है क्योंकि राहुल गांधी न अपने बयान से पलटे और न ही उन्होंने माफी मांगी। यानि उन्होंने अप्रैल 2019 की कोलार की जनसभा में जो कहा था उस पर वे आज भी टिके हुए हैं। बचाव पक्ष के वकील ने बार-बार दुहराया कि राहुल गांधी ने जो कहा था उसमें मोदी समाज के अपमान की बात है ही नहीं। पूर्णेश मोदी की जाति खोजी गयी और सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि वह तो उस समुदाय से संबंध ही नहीं रखते फिर वो मुकदमे के वादी क्यों बने हुए हैं? राहुल गांधी के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि आरोपी पक्ष ने षड्यंत्र के तहत यह मुकदमा दर्ज करवाया और उनके बयान का नाहक वह अर्थ निकाला जो उसमें निहित ही नहीं है।

परंतु राहुल गांधी के वकीलों को सुनने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा है कि राहुल गांधी का बयान निरापद था। उल्टे उन्हें कुछ नसीहतें भी दीं। इससे आरोपी पक्ष और भाजपा के नेता यह कह रहे हैं कि उनका पक्ष भी सही सिद्ध हुआ है। उन्होंने मोदी समाज का अपमान किया था। वे इसमें यह भी जोड़ रहे हैं कि राहुल गांधी सजा से बरी नहीं हुए हैं बल्कि गुजरात के सेशन कोर्ट द्वारा दी गयी और गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा संस्तुत सजा पर केवल रोक लगी है।

जब उच्चतम न्यायालय ने राहुल गांधी को उनके बयान से बरी नहीं किया और उन्होंने माफी भी नहीं माँगी तो फिर क्यों उच्चतम न्यायालय ने उनकी सजा पर रोक लगाई? इस सवाल का उत्तर जानने से पहले यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि न्यायिक प्रक्रिया के तहत मुकदमा चलता रहेगा और यह सुनवाई मुकदमे से बरी करने के लिए नहीं बल्कि सजा पर रोक लगाने की याचिका पर थी। जैसा कि राहुल गांधी के वकील ने कहा भी है कि राहुल गांधी अभी भी इस मामले में दोषी हैं और अब आगे निचली अदालतों में लड़ाई जारी रहेगी। इसीलिए उच्चतम न्यायालय ने कोई अंतिम फैसला नहीं दिया बल्कि सजा पर रोक लगा दी।

सजा पर केवल रोक लगी है तो इस पर फैसला भी आएगा देर-सबेर। फिर इसमें कांग्रेस क्यों खुश है? कानून के जानकार क्यों राहत की सांस ले रहे हैं? और अंततः उच्चतम न्यायालय ने रोक लगाई ही क्यों? इन सभी सवालों के जवाब गुजरात न्यायालय के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की इस आपत्ति से मिल जाता है कि सजा अधिकतम दो वर्ष की क्यों दी गयी? इसका कोई स्पष्ट उत्तर सजा सुनाने वाले जज ने नहीं दिया था। राहुल गांधी को मानहानि के मामले में अधिकतम सजा 'न भूतो न भविष्यति' समान है। मानहानि के मामलों में देश के इतिहास में अधिकतम सजा आज तक किसी को नहीं दी गयी है। फिर राहुल गांधी को ही क्यों? वह भी तब जब अपने भाषण में उन्होंने कहीं नहीं कहा कि 'सारे मोदी चोर हैं'। जैसा कि प्रचारित किया जा रहा है।

इसी सवाल का संतोषजनक उत्तर न पाने के कारण ही कांग्रेस भी इस पूरे मामले को राहुल गांधी को फंसाने के षड्यंत्र के रूप में देख रही थी, और देश का एक बड़ा तबका भी। कांग्रेस जहाँ एक तरफ मामले को न्यायिक अनुशासन के तहत लड़ रही थी, वहीं दूसरी तरफ वह इसे राहुल गांधी को चुप कराने के एक राजनीतिक षड्यंत्र के रूप में भी देख रही थी। उसके नेता बेबाकी से यह कहते रहे हैं कि संसद में अडानी और मोदी के रिश्तों पर सवाल उठाने के लिए उन्हें सजा दी गयी है। मोदी के खिलाफ वे एक सशक्त आवाज हैं, इसलिए उन्हें फंसाया जा रहा है।

अब सवाल यह है कि राहुल गांधी सजा से बरी नहीं हुए, न मुकदमा खारिज करने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया, उल्टे उन्हें भी कुछ नसीहत ही दी है तो फिर उन्हें सुप्रीम कोर्ट से इस क्षणिक व तात्कालिक राहत के सिवा और क्या हासिल हुआ? सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें भले ही बरी नहीं किया और नसीहतें देकर मूल आरोप पर प्रकारांतर से अपनी सहमति भी दे दी फिर भी राहुल गांधी को उसने बड़ी राहत दी है। पहली राहत यही दी है कि सजा पर रोक लगने से उनकी लोकसभा सदस्यता समाप्त होने से जुड़ी प्रक्रिया निष्प्रभावी हो जाएगी। परिणामस्वरूप वे फिर से एक सांसद के रूप अपनी राजनीतिक भूमिका निभा पाएँगे और आवास, वेतन व भत्ते जैसी सुविधाएं हासिल कर सकेंगे।

सबसे बड़ी बात यह कि वे अब लोकसभा का चुनाव लड़ सकते हैं और प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में सामने आ सकते हैं जिससे विपक्ष को मोदी के मुकाबले एक दमदार चेहरा मिल सकेगा। 2024 के चुनावों में यदि भाजपा राहुल को परे धकेलकर विपक्ष को नेतृत्व विहीन दिखाने की रणनीति पर विचार कर रही होगी तो उसे फिर से इस पर विचार करना पड़ेगा और राहुल गांधी को रोकने की नई रणनीति खोजनी होगी। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें एक और राहत दी है जो मुकदमे के अंतिम फैसले के लिए सीमा और दिशानिर्देश की तरह काम करेगी। वह यह कि मानहानि की सजा के प्रावधान के तहत निर्धारित अधिकतम दो वर्ष की सजा उन्हें अब नहीं मिलेगी।

इसके अतिरिक्त राजनीतिक मल्लयुद्ध में कांग्रेस और राहुल गांधी को स्वयं को सही बताने और जनता से सहानुभूति पाने का अवसर भी मिलेगा। उन्हें यह दुहराने का अधिकार भी मिलेगा कि संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता नष्ट हो गयी है तभी उन्हें केंद्र सरकार फंसाने की कोशिश कर पा रही थी। इसलिए संविधान व संवैधानिक संस्थाओं को बचाने के लिए जनता उन्हें चुने।

इस तरह देखें तो उच्चतम न्यायालय ने राहुल गांधी और कांग्रेस को न केवल कानूनी पचड़े में फँसने से बचाया है बल्कि प्रकारांतर से उनके राजनीतिक पक्ष को भी मजबूत होने का अवसर दिया है। इसके अलावा देसी और पश्चिमी मीडिया में यह स्पष्ट संदेश भी दिया है कि भारत की न्यायप्रणाली अभी भी निष्पक्ष है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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