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Super Dancers: क्या अब शिल्पा शेट्टी, अनुराग बासु और गीता कपूर पर लगेगा ‘पॉक्सो’?

इसी 24 जुलाई को सोनी एंटरटेनमेंट टेलीवीजन पर एक डांस रीयलिटी शो 'सुपर डांसर्स' का एक एपिसोड प्रसारित हुआ था। उस शो के जज थे शिल्पा शेट्टी, निर्देशक अनुराग बासु और कोरियोग्राफर गीता कपूर।

उस शो में इतनी बदतमीजियां हुईं कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने जजों के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत कानूनी कार्यवाही करने के लिए सभी को लीगल नोटिस भेज दिया है। आयोग ने इसे बच्चे के साथ अश्लीलता बताया है।

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आयोग ये एक्शन नहीं लेता अगर उसे एक वीडियो के बारे में पता नहीं चलता। दरअसल ये वीडियो इतना ज्यादा वायरल हुआ कि तमाम लोग सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा कर रहे थे। धीरे धीरे लोगों में आक्रोश फैलना शुरू हो गया और कई सोशल मीडिया यूजर्स ने इसको लेकर शो के निर्माताओं ही नहीं बल्कि शिल्पा शेट्टी, अनुराग बासु और गीता कपूर को भी निशाने पर लेना शुरू कर दिया। उनमें से ही कई ने इस वीडियो को राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और उसके अध्यक्ष को भी टैग कर दिया।

अब आयोग ने सुपर डांसर्स शो के तीनों जजों, सोनी एंटरटेमेंट टेलीवीजन चैनल और निर्माताओं के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के सेक्शन 3 के तहत कानूनी कार्यवाही करने का ऐलान कर दिया है। आयोग ने इन सभी को कानूनी नोटिस भेज दिया है, जिसमें लिखा है कि शो की क्लिप से पता चलता है कि एक बच्चे से टीवी पर इतने वल्गर और सेक्सुअल नेचर के सवाल जजों ने पूछे हैं, जो कि किसी भी दृष्टि से उपयुक्त नहीं हैं। इस शो ने जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) एक्ट और इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 के प्रावधानों का उल्लंघन किया है। आयोग के मुताबिक इनके अलावा चैनल ने ये शो प्रसारित करके बाल अधिकार संरक्षण आयोग की गाइडलांस का भी उल्लंघन किया है।

'सुपर डांसर्स' बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय शो है और इसे घर घर में देखा जाता है। ये इस शो का तीसरा चैप्टर या सीजन चल रहा है। तीनों ही जज काफी जाने पहचाने चेहरे हैं। लेकिन आगे बढ़ने से पहले जान लीजिए कि उस शो में ऐसा क्या हुआ था कि उसका वीडियो वायरल हो गया। दरअसल वीडियो क्लिप में अनुराग बासु एक बच्चे से पूछ रहे हैं कि तुम्हारी कच्छी (Underwear) ज्यादा अच्छी है या पापा की? वो मासूमियत से जवाब देता है कि, "मेरी अच्छी है लेकिन पापा की कच्छी इतनी गंदी है कि उसमें बदबू आता है"।

उसकी इस बात पर जजों समेत सभी हंसने लगते हैं, लेकिन सामने बैठे बच्चे के पापा झेंप जाते हैं। यहां तक होता तब भी ठीक था। शिल्पा शेट्टी अगला सवाल हंसते हुए पूछती हैं कि, "बेटे, आप अपने पापा के कच्छे को क्यों सूंघने गए थे?" शोर में बच्चा फिर एक फनी कमेंट करता है कि, "मैं बदबू सूंघ-सूंघ कर मर जाता हूं"। पापा चेहरा छुपा लेते हैं, सारे जज पापा का मजाक बनाते हैं। बच्चे को लगता है वो कुछ ऐसा अच्छा बोल रहा है, जिससे सबको मजा आ रहा है, तो वो बोलना बंद नहीं करता। इस बार तो वो बम विस्फोट ही कर देता है, "और मेरी मम्मी पेंट खोलकर पापा को पिछवाड़े में मारती है"। ये तो शॉकिंग था, मम्मी भी झेंप जाती है।

कुछ देर बाद अनुराग बासु ये भी बच्चे से पूछते हैं कि आप देते हो मम्मी को किस्सी.. क्या पापा भी देते हैं मम्मी को किस्सी? बच्चा जबाव देता है, "नहीं, पापा तो मम्मी को बैंड बजाके उठाते हैं.."। और कोई जगह होती तो ये मम्मी पापा बच्चे को बीच में ही रोक देते, लेकिन इतने सेलेब्रिटीज के बीच वो उसे आंख भी नहीं दिखा पा रहे थे। मान लो मजाक में ये घटना हो भी गई, कोई लाइव तो प्रसारण हो नहीं रहा था, लेकिन टीआरपी लेने के लिए चैनल ने ये सारे हिस्से ऑन एयर कर दिए। यूट्यूब पर भी अपलोड कर दिए। अब पूरा देश इस युगल का मजाक बना रहा है।

ये शायद पहला वाकया है देश में कि इतना बड़ा लीगल एक्शन, वो भी पॉक्सो के तहत लेने की बात कही गई है। बात इसलिए क्योंकि सेलेब्रिटीज जजों पर इसका कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है। शिल्पा शेट्टी अपने योगा, फैमिली और मस्ती के वीडियोज रोज सोशल मीडिया पर शेयर कर रही हैं। इन तीन दिनों में उन्होंने कोई भी सफाई या प्रतिक्रिया इस वीडियो पर नहीं दी है। अनुराग बासु ने तो 14 जुलाई के बाद कोई ट्वीट ही नहीं किया है। गीता कपूर और चैनल की तरफ से भी अभी तक कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। जबकि पॉक्सो एक्ट अगर वाकई में लगा तो इन तीनों की जमानत होना मुश्किल हो जाएगी।

क्या फिल्में, क्या टीवी और क्या ओटीटी, बच्चों की चिंता किसी को नहीं

अगर आप बच्चों की कार्टून फिल्में भी टीवी पर देखेंगे तो पाएंगे कि बॉयफ्रेंड, गर्लफ्रेंड जैसे शब्द तो आम हो गए हैं। कार्टून कैरेक्टर चाहे भालू हो या शेर उसकी एक गर्लफ्रेंड या वन साइड लव तो दिखाया ही जाता है। ना 'हैरी पॉटर' जैसी फिल्मों को छोड़ा गया है और ना ही 'लॉयन किंग' जैसी फिल्मों को। यूट्यूब अश्लीलता पर लगाम रखता है लेकिन जितने गेम खेलने के वीडियोज होते हैं, उनके एंकर अपने ऑडियो में फट्टू, फट गई, एल लग गए जैसे शब्दों को सामान्य तौर पर इस्तेमाल करते हैं। जाहिर है, तीन चार साल के बच्चे भी इन्हें देखते हैं। जितने भी विदेशी कार्टून सीरीज हिंदी में डब करके ऑनएयर किए जा रहे हैं, उनमें तमाम शब्द ऐसे डाल दिए जाते हैं, जिनको बच्चे बोलने लगते हैं। एक डायलॉग जानिए, "खुद को सनी लियोनी समझती है क्या?" जाहिर है जब बच्चों को मम्मी का मोबाइल हाथ में लगेगा तो वो सबसे पहले सनी लियोनी के बारे में ही सर्च करेगा या फिर स्कूल में अपने साथ की किसी भी लड़की को ये डायलॉग बोल सकता है।

ओटीटी में तो और भी खासी मुश्किल है। वहां का कंटेंट भारत का सेंसर बोर्ड या कोई भी संस्था नियमन नहीं करती है। नए सिनेमेटोग्राफ एक्ट में कहा जा रहा है कि कुछ प्रावधान किए गए हैं, लेकिन वो भी शायद एज ग्रुप में ही बांटने की बात है। तब तक हर ओटीटी पर बस इतना किया गया है कि या तो आप बच्चों के एकाउंट अलग बना दें, या फिर फिल्मों के साथ लिखा होता है कि ये 7 प्लस है, 13 प्लस या 16 प्लस।

13 प्लस में वो सभी फिल्में आती हैं, जिनमें प्रेम कहानियां, हलकी फुलकी गाली गलौज और चुम्बन के सीन आम होते हैं। जो एकाउंट्स भी बच्चों के लिए बनते हैं, उनके लिए कोई रोक नहीं है कि अगर मम्मी पापा घर पर नहीं हैं, तो वो उनके एकाउंट में जाकर फिल्में नहीं देख सकते। क्योंकि कोई पासवर्ड सिस्टम अलग अलग एकाउंट मे जाने का नहीं होता है।

क्रिएटिव फ्रीडम और अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला

बीच-बीच में ओटीटी कंटेंट को लेकर हंगामा होता है तो तमाम फिल्म स्टार और फिल्म मेकर बयान देने लगते हैं कि क्रिएटिव फ्रीडम तो होनी ही चाहिए। मां बाप अपने बच्चों को रोकें। कोई कहता है कि जब 18 साल की उम्र बच्चों के वोट देने की हो सकती है, तो वो कुछ भी देख सकता है। लेकिन किसी भी ओटीटी में 18 साल का चक्कर ही नहीं है, 16 साल पर ही सबकुछ देख सकता है। ऐसे में उन माता पिता की बड़ी दिक्कत है जो ऑनलाइन पढ़ाई के चलते सारे गजेट्स तक बच्चों की पहुंच रोक नहीं सकते, और ये क्रिएटिव फ्री थिंकर्स भी मानने, समझने को तैयार नहीं।

ऐसे में हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों से भी ऐसे सभी तत्वों को हौसला मिल जाता है। चार साल पहले का मामला है, सेंसर बोर्ड या कहें तो केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने बच्चों की फिल्म 'चिड़ियाखाना' को यूनिवर्सल (यू) सर्टिफिकेट देने के लिए कुछ सीन कट करने की मांग की थी। चिल्ड्रन फिल्म सोसायटी ऑफ इंडिया इस फैसले के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट चली गई। सेंसर बोर्ड के सदस्यों को उम्मीद भी नहीं रही होगी कि इतना बुरा सुनने को मिलेगा। हाईकोर्ट ने सीधे पूछा कि, "क्या आप शुतुरमुर्ग हैं? अपना सर रेत में घुसाए बैठे हो और ऐसे जता रहे हो जैसे कुछ है ही नहीं"। कोर्ट ने ये तक कहा कि आपको यह नैतिक अधिकार किसने दिया है कि आप तय करें कि लोग क्या देखें या क्या नहीं देखें?

बच्चों के कंटेट को लेकर भी मोटे तौर पर स्वनियमन की व्यवस्था ही है, लेकिन धीरे धीरे जिस तरह से उनके लिए रोमांटिक प्लॉट तैयार किए जा रहे हैं, उनकी खाने पीने की आदतों को फिल्म या कार्टून्स में कुछ सींस डालकर बिगाड़ने की कोशिश की जा रही है उसके लिए तो कोई तो व्यवस्था होनी ही चाहिए। विविधता की बात करने वाले शो निर्माताओं को बाकी समाज की विविधता को भी तो ध्यान रखना होगा, अपनी सोच को दूसरे पर थोपने से भी बचना होगा।

आम भारतीय परिवार अपने बच्चों को एक निश्चित उम्र तक बड़ों के मामलों से दूर ही रखना चाहता है। सो ऐसे में अगर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग कोई कड़े कदम उठाता है, नए सिनेमेटोग्राफ बिल के तहत सूचना प्रसारण मंत्रालय इस तरह की हरकतों पर लगाम लगाकर अभिभावकों की कुछ जायज चिंताओं का निराकरण करता है, तो ऐसे कदम स्वागत योग्य होने चाहिए।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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