Young Stroke: क्या COVID-19 और यंग स्ट्रोक के बीच कोई संबंध है?
आजकल युवाओं में स्ट्रोक के मामले बढ़ रहे हैं। अधिकांश स्ट्रोक 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में होते हैं, लेकिन जब यह 18 से 65 वर्ष की आयु के वयस्कों में होता है, तो इसे यंग स्ट्रोक कहा जाता है।

Young Stroke: पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत में युवाओं में स्ट्रोक मामलों की संख्या में कोई अन्तर नहीं रह गया है। स्ट्रोक के कारण होने वाली मृत्यु की चर्चा हम अपने आसपास करते और सुनते हैं। किंतु इसके विषय में जानकारी बहुत कम लोगों को है। विशेष स्ट्रोक यूनिट्स और थ्रोम्बोलाइटिक थेरेपी की सुविधाएं उपलब्ध होने के बाद भी आम जनता स्ट्रोक से परिचित नहीं है। कुछ ही लोग, या मरीज़ स्वयं ऐसे हैं, जिन्हें इसकी जानकारी होती है और समय रहते वे अपना या अपने करीबियों की मदद कर पाते हैं। इससे मरीज़ को सही इलाज मिल जाता है और जीवन सुरक्षित हो पाता है।
स्ट्रोक के जो ट्रेडिशनल कारण माने जाते हैं, उनके नहीं दिखने पर भी अब युवाओं को स्ट्रोक का ख़तरा हो रहा है। इसे कोविड-19 से जोड़कर देखा जा रहा है। हाल ही में हुए स्ट्रोक के मामलों के अध्ययन से यह पता चला कि कुछ लोगों में कोविड-19 से प्रतिरक्षा प्रोथ्रोम्बोटिक सिंड्रोम (रक्त वाहिकाओं की समस्या) की संभावना बनी है।
फरवरी 2021 के अंत में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और सीरम इंस्टीट्यूट की कोविड वैक्सीन एस्ट्राजेनिका लेने वाले कुछ व्यक्तियों में प्रोथ्रोम्बोटिक सिंड्रोम (रक्त वाहिकाओं की समस्या) देखा गया था। यह एक एडेनोवायरल वेक्टर-आधारित वैक्सीन है। इसके बाद, जॉनसन एंड जॉनसन की जैनसेन वैक्सीन लेने वाले कुछ व्यक्तियों में भी इसी तरह के निष्कर्ष देखे गए। यह भी एक एडेनोवायरल वेक्टर पर आधारित वैक्सीन थी। इस सिंड्रोम को वैक्सीन द्वारा प्रेरित प्रतिरक्षा थ्रोम्बोटिक थ्रोम्बोसाइटोपेनिया (वीआईटीटी) नाम दिया गया।
कई मेडिकल अध्ययन में यह माना गया कि महामारी के साथ ही यंग स्ट्रोक के कुछ अलग प्रकार के मामलों में वृद्धि हुई है। अब यह प्रश्न उठता है कि, क्या COVID-19 और स्ट्रोक के बीच कोई संबंध है?
जर्नल ऑफ न्यूरोइन्वेशनल सर्जरी, अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन न्यूज़ द्वारा प्रकाशित विभिन्न मेडिकल शोधपत्रों में यह बताया गया है कि, जिन वजहों से हृदय की धमनियों को खतरा होता है उसमें और COVID-19 के प्रतिरक्षा कारकों में क्रिया - प्रतिक्रिया होती है। इसके परिणामस्वरूप धमनियों में सूजन होती है, जो रक्त में थक्के जमने का कारण बनता है। इसकी वजह से स्ट्रोक का खतरा बढ़ता है।
ऐसे में चर्चा का विषय यह भी है कि क्या इन स्ट्रोक का कारण कोविड वैक्सीन हो सकता है?
यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है। क्योंकि कोविड-19 टीकाकरण के बाद से ही इस्कीमिक स्ट्रोक (सिर में खून के थक्के जमने के कारण होनेवाला हैमरेज) और रक्तस्रावी स्ट्रोक (नसों के फटने) के मामले पूरी दुनिया में रिपोर्ट किए जा रहे हैं। स्ट्रोक के मामलों में 87% इस्कीमिक स्ट्रोक के ही होते हैं, जब मस्तिष्क को ऑक्सीजन युक्त रक्त पहुँचाने वाली धमनियों में अवरोध हो जाता है, तो धमनियों में रक्त का थक्का बन जाता है। इससे मस्तिष्क तक रक्त नहीं पहुँच पाता। परिणामस्वरुप इस्केमिक स्ट्रोक होता है।
रक्त वाहिकाओं में फैट जम जाना इस स्ट्रोक के आम कारक में है। हाई ब्लड प्रेशर और हाइपर टेंशन भी इसके कारक हैं। ऐसी परिस्थितियों को कोरोना प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया कई गुना बढ़ा सकती है। इसके साथ ही सेरेब्रल वेनस साइनस थ्रॉम्बोसिस (सीवीएसटी) सहित अन्य प्रकार के स्ट्रोक की रिपोर्टें बढ़ रही हैं। इसमें मस्तिष्क की शिरा पर रक्त का थक्का बन जाता है, जो कि रक्त को मस्तिष्क से बाहर आने से रोक देता है। इस स्थिति में मस्तिष्क की रक्त कोशिकाएँ दबाव के कारण ब्रेक हो सकती हैं और रक्त स्राव होता है। इन सभी स्ट्रोक में मुख्य रूप से थ्रोम्बोसिस, थ्रोम्बोसाइटोपेनिया रक्त थक्के ही जिम्मेदार होते हैं।
किसी भी वैक्सीन में उस वायरस को ही अधमरा कर के शरीर में प्रवेश कराया जाता है। वायरस इस तरह से निष्क्रिय करके वैक्सीन बनाई जाती है जिससे वह शरीर को नगण्य क्षति पहुंचा सके और शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र उसे पहचान कर अपना प्रतिरक्षा मैकेनिज्म तैयार कर सके। इस प्रतिरक्षा प्रणाली के कोरोना वायरस से क्रिया - प्रतिक्रिया के दौरान ही सूजन का प्रभाव बढ़ता है, जो कुछ मामलों में स्ट्रोक का कारण बन जाता है।
कोरोना वायरस का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि वैक्सीन इंड्युज्ड इम्युन थ्रोम्बोटिक थ्रॉम्बोसाइटोपीनिया (वीआईटीटी) एक दुर्लभ प्रकार का दुष्प्रभाव है जो कोरोना के टीके की एडीनोवायरस वेक्टर वैक्सीन के साइड इफेक्ट के रूप में देखा गया है। ऐसा तब होता है जब एंटीबॉडीज ब्लड प्रोटीन पर हमला कर देती हैं। प्रतिक्रिया स्वरूप रक्त में प्लेटलेट सक्रिय हो जाता है, और दोनों मिलकर रक्त वाहिकाओं में खून का थक्का बना देते हैं।
आंकड़े बताते हैं कि यंग स्ट्रोक का ख़तरा 0.5% यानी कि दो सौ में से एक व्यक्ति को ही है। हम सभी ने देखा है कि कोरोना वायरस ने अप्रत्याशित रूप से विश्व की बहुत बड़ी आबादी को प्रभावित किया है, इस दृष्टि से 0.5 प्रतिशत की संख्या भी एक बड़ा आँकड़ा है। उनमें से भी 80% लोग वे होते हैं जिनमें पहले से स्ट्रोक के कारक मौजूद हों। जैसे कि उच्च रक्तचाप, हाइपरलिपिडेमिया के रोगी, धूम्रपान करने वाले लोग, या फिर जिन्हें मधुमेह या आर्टरी फाईब्रिलेशन (असमान रक्तचाप) की समस्या पहले से हो।
अभी तक स्ट्रोक के खतरे को संक्रमण या टीकाकरण के 4 से 42 दिनों के भीतर ही प्रासंगिक माना जा रहा था। किन्तु अब मौसम परिवर्तन के साथ दोबारा ऐसे स्ट्रोक के मामले सामने आ रहे हैं। कोरोना वायरस संक्रमण के लक्षण भी अब सामान्य फ्लू की तरह ही देखे जा रहे हैं। ऐसे में अब एहतियातन कोरोना की जांच की आवश्यकता नहीं समझी जा रही है। मौसम बदलाव के साथ आ रहे स्ट्रोक के मामले में व्यक्ति कोरोना संक्रमित हो, इसकी संभावना को नकारा नहीं जा सकता है।
जब हम स्ट्रोक के बारे में बात कर रहे हैं तो यह जानना महत्वपूर्ण है कि क्या समय रहते स्ट्रोक को पहचाना जा सकता है? स्ट्रोक के पूर्व भी कुछ लक्षण होते हैं। कुछ लोगों को गंभीर स्ट्रोक होने से कई दिन पहले सिरदर्द, सुन्नता या झुनझुनी जैसे लक्षणों का अनुभव होता है। स्ट्रोक के 43% रोगियों को एक बड़ा स्ट्रोक होने से एक सप्ताह पहले तक मिनी-स्ट्रोक के लक्षणों का अनुभव होता है।
कुछ लक्षण ऐसे हैं, जिनमें से कोई भी 2 से 7 दिन पूर्व भी दिखाई पड़ सकते हैं। इनके दिखाई देने पर यदि उपचार की मदद मिल सके तो प्राण पर आने वाले संकट को टाला जा सकता है। जैसे - अचानक चेहरे, हाथ या पैर में सुन्नता या कमजोरी। बोलने या समझने में भ्रम या परेशानी। एक या दोनों आँखों से देखने में परेशानी, अचानक चलने में परेशानी, चक्कर आना, या संतुलन की समस्या। बिना किसी ज्ञात कारण के गंभीर सिरदर्द। पेट में अकारण मरोड़, उल्टी- मिचली होना आदि।
यदि पहले से व्यक्ति को कुछ लक्षण आते हैं तो चिकित्सक उन्हें एंटीकोगलेंट्स अर्थात्त रक्त को पतला करने वाली दवाएं दे सकते हैं। इन्हें थक्कारोधी भी कहा जाता है, जो रक्त के थक्कों को बड़ा होने से रोकने में मदद करती हैं। इससे स्ट्रोक का ख़तरा कम हो जाता है। आपातकालीन परिस्थिति में ब्लड क्लॉट, ब्लीडिंग - क्लॉटिंग डिस्ऑर्डर के विशेषज्ञ या आपात चिकित्सा विभाग में स्कैनिंग कर सम्भावित उपचार दिया जाता है, जिससे जीवन रक्षा सम्भव है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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