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Story of a Kinnar: किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर पवित्रानंद नीलगिरी की कहानी, उन्हीं के शब्दों में

Story of a Kinnar: मेरा नाम पवित्रानंद नीलगिरी है। मैंने जूना अखाड़े के हरिगिरी महाराज से दीक्षा ली और संन्यासी बन गई। अब मैं किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर हूं। आज मैं आपको अपनी कहानी बताती हूं। इस कहानी के साथ साथ मैं हिजड़ा कहे जानेवाले किन्नर समाज के बारे में कुछ ऐसा भी बताऊंगी जिसे शायद आप नहीं जानते होंगे।

Story of Mahamandaleshwar Pavitranand Nilgiri of Kinnar Akhara

यह सब मैं आपको इसलिए बता रही हूं क्योंकि हमारे समाज के बारे में लोग बहुत कम जानते हैं। शायद वो जानना भी नहीं चाहते। उनकी नजर में हम नाचने गाने और बख्शीश मांगनेवाले लोग होते हैं जो कई बार प्रेम से, तो कई बार हठ करके लोगों की जेब से पैसा निकलवा लेते हैं।

आम लोग हमको किन्नर नहीं बल्कि हिजड़ा बुलाते हैं। किन्नर तो बड़ा शालीन नाम है। किसी हिजड़े के लिए इतना शालीन नाम शायद लोगों को अच्छा नहीं लगता होगा। लेकिन ये हिजड़ा नाम हमने नहीं रखा अपना। ये नाम मुगलों ने दिया हमको। वो हमारा इस्तेमाल अपने हरम की औरतों की रखवाली के लिये किया करते थे। इस कारण उस दौरान बहुत व्यापक स्तर पर किन्नर इस्लाम कबूल कर लिया करते थे। लेकिन सदियों बाद हमें पता चलता है कि हम सनातनी हैं।

किन्नरों का कोई वृद्धाश्रम नहीं होता है। हमारे यहां 120 साल के भी किन्नर हैं। उनकी भी सारी सेवा होती है। किन्नरों में सालों से गुरु शिष्य परंपरा चली आ रही है। यहां गद्दी परंपरा होती है। गुरू के जाने के बाद वह अपनी गद्दी सौंप कर जाती है। जहां हम रहते हैं उसे डेरा कहते हैं। अब इतना बड़ा कुनबा चलाना है तो पैसे चाहिए। कमाई के लिए हम कोई अवैध काम नहीं करते। सुबह उठते हैं और तैयार होकर किसी के यहां बच्चा हुआ या शादी-ब्याह है, तो वहां जाकर मांगते हैं। परिवार से जो खुशी से मिल जाता है, वह लेकर आ जाते हैं। कई बार बच्चे के जन्म की खबर पड़ोसियों को भी नहीं होती लेकिन हमें जानकारी मिल जाती है। यह जानकारी हम कहां से हासिल करते हैं, यह हमारा ट्रेड सीक्रेट है।

अब मैं आपको अपने बारे में बताती हूं। मेरी कहानी विदर्भ (महाराष्ट्र) के अमरावती जिले में एक सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार से शुरू होती है, जहां मेरा जन्म हुआ। हम आठ भाई-बहन थे। पांच भाई और तीन बहनें। मैं परिवार में सबसे छोटा था। शुरुआत में सबका प्यार भी मिला, लेकिन जैसे-जैसे बड़ा होने लगा, लड़कियों जैसे हाव भाव दिखने लगे। इसको लेकर मेरे भाई बात-बात पर कहते कि अबे क्या लड़की जैसी बात करता है, लड़की जैसे हाथ हिलाता है। इतना ही नहीं, घर के बाहर भी अब लोग मेरा मजाक उड़ाने लगे। आसपास के लोग घर आकर मां से कहने लगे कि तुम्हारा बेटा तो लड़कियों जैसी हरकत करता है। एक मराठी ब्राह्मण परिवार में किन्नर हो, यह कोई सोच भी नहीं सकता था।

मेरे घर में रहने की वजह से सभी का जीवन प्रभावित हो रहा था। परिवार के लोगों का बाहर आना जाना समाज में मुश्किल हो रहा था। मेरी वजह से हर कोई ताना मारता था। मां ने इज्जत बचाने के नाम पर मुझे मौसी के यहां भेज दिया, लेकिन वहां भी मैं नहीं रहा और कुछ ही महीनों में वापस घर आ गया। घर आने के बाद फिर से सबके गुस्से का शिकार होने लगा। मां को यह सब देखकर तकलीफ जरूर होती, लेकिन वो कुछ कह नहीं पाती। इसी तरह स्कूल में भी टीचर बोलते थे कि तुम लड़कियों के साथ क्यों रहते हो?

दसवीं करने के बाद लगा कि अब बहुत हो गया। मेरा यहां रहना ठीक नहीं है। घर में भजनों की एक कैसेट थी, जिसमें नागपुर के एक मंदिर का एड्रेस लिखा हुआ था। तय किया कि उसी मंदिर में चला जाए। वहां के बाबा को अपनी सारी कहानी बताई और बोला कि अब मैं यहीं रहना चाहता हूं। रहने की अनुमति मिल गई। मंदिर में हर दिन झाड़ू-पोछा करता और भगवान को चढ़ने वाला भोग मुझे खाने को मिलता। इस बीच एक कपड़े की दुकान में 300 रुपए महीने पर सेल्समैन की नौकरी भी की। इस्कॉन मंदिर से भी जुड़ा। बाद में मेरे परिवार की तरफ से इस्कॉन के खिलाफ एफआईआर करवा दिया गया कि उन्होंने हमारे बच्चे का अपहरण कर लिया है। इसके बाद इस्कॉन वालों ने मुझे वहां से चले जाने को कह दिया।

मैंने एक अस्पताल में रात की नौकरी कर ली और नर्सिंग में एडमिशन ले लिया। नर्सिंग करने के बाद मैंने नागपुर के कई अस्पतालों में नौकरी की। जिस अस्पताल में काम करता था, वहां एक ट्रांसजेंडर लड़का भी काम करता था। धीरे-धीरे उससे दोस्ती हो गई। वह दिन मेरी जिन्दगी बदल देने वाला दिन था, जब उसने मुझे नागपुर के कस्तूरचंद पार्क में चलने के लिए कहा। वह पार्क किन्नरों, ट्रांसजेंडर्स कम्युनिटी के लोगों के आने-जाने के लिए मशहूर था।

इस बीच मेरे चार अफेयर भी हुए, लेकिन एक भी सिरे नहीं चढ़ा। सबने मुझे धोखा दिया। मुझे अंदर से लगता था कि मैं गलत रूप में हूं। लड़का तो हूं नहीं और किन्नर के रूप में ये समाज इतनी आसानी से स्वीकार करेगा नहीं। इसके बाद मैंने एक एनजीओ बनाया। धीरे-धीरे किन्नरों और ट्रांसजेंडर कम्युनिटी के लोगों से मिलना और उनके लिए काम करना शुरू कर दिया।

एक सेमिनार में मशहूर किन्नर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी से मुलाकात हुई। वह मुंबई की रहने वाली थीं और सिंबॉयसिस से पढ़ी थी। दिखने में खूबसूरत, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली। बहुत ही प्रभावशाली किन्नर हैं। साल 2007 में मैं उनका चेला बन गया। मैंने और लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने मिलकर किन्नरों और ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए कई सेमिनार करवाए।

मैं एक तरफ किन्नरों के अधिकार के लिए लड़ रही थी, वहीं दूसरी तरफ मुझे अपने परिवार से अपने अधिकार की लड़ाई भी लड़नी पड़ी। परिवार की संपत्ति के बंटवारे में मुझे कुछ नहीं दिया गया था। परिवार ने नहीं सोचा कि मुझे भी भूख लगती है, मुझे भी जीवन जीना है। मैंने अपना हक लेने के लिए कोर्ट में केस कर दिया और अपना हक हासिल किया।

साल 2013 में मैंने खुद से मर्द का झूठा टैग हटा लिया और किन्नर बन गई। यहां से मैं अपने असली रूप में काम करने लगी। साड़ी पहनना, मेकअप करना सब कुछ शुरू कर दिया लेकिन इस सबके बावजूद मैंने कसम खाई कि कभी ताली बजाकर नहीं कमाऊंगी।

साल 2014 में सरकार ने थर्ड जेंडर बिल पास कर दिया जो हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन अभी तो हमें बहुत कुछ हासिल करना था। हमने परिवार, समाज और कानून से तो अपना हक ले लिया, लेकिन हमें अपने हिन्दू धर्म से अपना हक लेना था। मैने देखा कि किन्नर होने का मतलब ही मुसलमान होना था। हिन्दू परिवार के बच्चे यहां आकर मुस्लिम बन जाते थे। दूसरी तरफ धर्म के ठेकेदारों ने हिन्दू किन्नरों को उनकी मान्यता से वंचित कर रखा था। हमें धर्म से गायब कर दिया था जबकि शिवपुराण, महाभारत, रामायण सब जगह किन्नरों का बखान है।

साल 2016 में उज्जैन में कुंभ का आयोजन हुआ तो हमने तय किया कि हम 14वां अखाड़ा यानी किन्नर अखाड़ा बनाएंगे, लेकिन अखाड़ा परिषद में इसका कड़ा विरोध हुआ। हर दिन यह कलह बढ़ती जा रही थी। मैंने बोला कि हम शिव के साथी हैं। अर्धनारीश्वर हैं। साधुओं की जिद्द थी कि किन्नर पेशवाई (जुलूस) नहीं निकाल सकते हैं। मंत्री, संतरी, डीसी सबने हमें मना किया और कहा कि यहां से वापस चले जाओ। हमने ऐलान कर दिया कि हम धर्म का अपना हक लेकर रहेंगे। मैंने लक्ष्मी नारायण से बात की और तय किया कि बिना परमिशन के पेशवाई निकालेंगे। हमने जुलूस निकाला और भीड़ हमारे जुलूस में शामिल हो गई। हम परिवार से लड़े, समाज से लड़े तो अब अपने हिन्दू धर्म के ठेकेदारों से हक के लिए लड़ रहे थे। हमने अपना अखाड़ा बनाया और मैं किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर बनी।

हर कुंभ में हमारे पंडाल में भीड़ बढ़ती जा रही है। लोग हमसे आशीर्वाद लेने आ रहे हैं। महंत हरिगिरी महाराज जूना अखाड़ा वालों ने हमसे विलय के लिए कहा। हमने भी सोचा और तय किया कि हम जूना अखाड़े के साथ विलय करेंगे। साल 2019 में हमारा जूना अखाड़े में विलय हो गया। अब हमारा किन्नर अखाड़ा 14वां अखाड़ा है, लेकिन शाही स्नान और पेशवाई हमारी जूना अखाड़े के साथ ही होती है। अब किन्नर समाज कुंभ में आधिकारिक रूप से शाही स्नान में शामिल होता है, इसके लिए हमें लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी है।

आज परिवार ने भी मुझे अपना लिया है। मेरे मां बाप मुझे मानते हैं। परिवार के बच्चे मुझे समझते हैं। अब वे कहते हैं, तुम जैसे हो, ऐसे ही हमें स्वीकार हो। जब दिल करे घर आओ। यह सब महाकाल के आशीर्वाद से हुआ है। जब वे बुलाते हैं कि घर आओ तो मैं कहती हूं कि मेरे पास टिकट का पैसा नहीं है। फिर वे टिकट का पैसा देकर बुलाते हैं। फिर भी मुझे पड़ोसियों का डर रहता है कि वे कोई ऐसी बात ना कह दें, जिससे मेरे परिवार का दिल दुखे। अभी हमें अधिक पूजा पाठ की जानकारी नहीं है। झूठ नहीं बोलूंगी, हम लोग धीरे-धीरे पूजा पाठ सीख रहे हैं।

आने वाले समय में हमारी सबसे बड़ी चुनौती किन्नरों को आत्मनिर्भर बनाना है। उनके लिए स्वरोजगार की संभावनाएं तलाशना। राजनीति में प्रतिनिधित्व बढ़े और किन्नर सरकारी नौकरियों के लिए तैयार हों। इस दिशा में भी हमें काम करना है।

(पवित्रानंद नीलगीरी ने यह सारा विवरण आशीष कुमार अंशु से बातचीत में बताया है।)

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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